11 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

वंदे मातरम विवाद: जमीयत के मौलाना एजाज कश्मीरी बोले — 'मुसलमानों पर न थोपें, सजा मंजूर पर मजहब से समझौता नहीं'

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
वंदे मातरम विवाद: जमीयत के मौलाना एजाज कश्मीरी बोले — 'मुसलमानों पर न थोपें, सजा मंजूर पर मजहब से समझौता नहीं'

सारांश

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना एजाज कश्मीरी ने लाल किले पर वंदे मातरम के मुद्दे पर दो-टूक कहा — पढ़ना है तो पढ़ें, लेकिन मुसलमानों पर जबरदस्ती नहीं। सजा मंजूर है, पर मजहब से समझौता नहीं। तिरंगे पर उनका रुख बिल्कुल अलग रहा।

मुख्य बातें

मौलाना एजाज कश्मीरी (जमीयत उलेमा-ए-हिंद) ने 11 अगस्त 2026 को कहा कि वंदे मातरम मुसलमानों पर थोपा न जाए।
उनके अनुसार वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लामी आस्था की बुनियाद से टकराती हैं।
मौलाना ने कहा — 'सजा एक पल को मंजूर है, लेकिन मजहब से गद्दारी नहीं।' भारतीय संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया; सरकार की जबरदस्ती को 'तानाशाही' बताया।
तिरंगे पर उनका रुख सकारात्मक — मदरसे और घर पर लगाने पर कोई ऐतराज नहीं।
मुस्लिम युवाओं से अपील — साल के 365 दिन वतन से मोहब्बत करें, केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित न रहें।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदस्य मौलाना एजाज कश्मीरी ने 11 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट किया कि लाल किले पर वंदे मातरम गाए जाने के मुद्दे पर मुसलमानों के साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि जो इसे पढ़ना चाहे, पढ़े — लेकिन जिनके मजहब की बुनियाद इससे टकराती है, उन पर यह थोपा न जाए।

मौलाना का मुख्य वक्तव्य

मौलाना एजाज कश्मीरी ने कहा, 'यह मुल्क ऐसा है जहाँ हर मजहब के लोग रहते हैं। जिनको वंदे मातरम पढ़ना दुरुस्त है, हमें उनसे कोई ऐतराज नहीं। लाल किले पर पढ़ें, संसद में पढ़ें — लेकिन खासतौर पर मुसलमानों के साथ जबरदस्ती न की जाए।' उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लामी आस्था की बुनियाद से टकराती हैं, इसलिए वे इसे नहीं पढ़ सकते।

संवैधानिक अधिकार का हवाला

मौलाना ने तर्क दिया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने मजहब पर अमल करने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा, 'अगर सरकार अपनी मर्जी से मुल्क चला रही है, संविधान की मर्जी से नहीं, तो यह तानाशाही है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुसलमान यह नहीं कह रहे कि दूसरे भी न पढ़ें — यह माँग केवल अपने लिए है।

सजा की बात, समझौते से इनकार

मौलाना एजाज कश्मीरी ने दृढ़ता से कहा, 'अगर सरकार सख्ती बरतेगी, जेल में डालेगी, सजा देगी — तो भी हम नहीं पढ़ेंगे। हमें एक पल की सजा मंजूर है, लेकिन न अपने मजहब से गद्दारी करेंगे, न अपने मुल्क से।' उन्होंने कहा कि इसे पढ़ने से उनका ईमान चला जाएगा — यह उनके लिए आस्था का प्रश्न है।

तिरंगे पर अलग रुख

हर घर तिरंगा अभियान पर मौलाना का रुख स्पष्ट रूप से अलग रहा। उन्होंने कहा, 'तिरंगा हमारे मुल्क का झंडा है, हमारा फक्र है — मदरसे पर लगाओ, घर पर लगाओ, हमें कोई ऐतराज नहीं।' उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा जो '50 सालों से तिरंगा नहीं लगाए थे' और जिन्हें 'आज भी तिरंगा लगाने में शर्म आती है।'

मुस्लिम युवाओं से अपील

मौलाना ने मुस्लिम युवाओं और मदरसों से आह्वान किया कि वे केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को नहीं, बल्कि साल के 365 दिन अपने वतन से मोहब्बत करें। उन्होंने कहा कि उनके बाप-दादाओं ने इस मुल्क की आजादी के लिए कुर्बानी दी है और वे दिल से अपने देश से प्रेम करते हैं। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर देशभर में बहस तेज हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर दब जाता है। बहस को केवल 'वंदे मातरम हाँ या ना' तक सीमित रखना उस व्यापक संवैधानिक प्रश्न को नजरअंदाज करता है जो इस पूरे विवाद की जड़ में है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना एजाज कश्मीरी ने वंदे मातरम पर क्या कहा?
मौलाना एजाज कश्मीरी ने कहा कि जो चाहे वंदे मातरम पढ़े, लेकिन मुसलमानों पर इसे थोपा न जाए क्योंकि इसकी कुछ पंक्तियाँ इस्लामी आस्था से टकराती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सजा मंजूर है, पर मजहब से समझौता नहीं।
वंदे मातरम को लेकर मुसलमानों की आपत्ति क्या है?
मौलाना के अनुसार वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लाम में एकेश्वरवाद (तौहीद) की बुनियाद से टकराती हैं, क्योंकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की इबादत वर्जित है। यह आपत्ति नई नहीं है — ऐतिहासिक रूप से भी इसी आधार पर वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बजाय राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया था।
क्या मुसलमानों को वंदे मातरम गाना कानूनी रूप से अनिवार्य है?
नहीं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। मौलाना ने इसी संवैधानिक प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि जबरदस्ती करना तानाशाही होगी।
मौलाना का तिरंगे और देशप्रेम पर क्या रुख है?
मौलाना एजाज कश्मीरी ने तिरंगे को 'हमारे मुल्क का झंडा और हमारा फक्र' बताया और मदरसों व घरों पर लगाने पर कोई ऐतराज नहीं जताया। उन्होंने मुस्लिम युवाओं से अपील की कि साल के 365 दिन वतन से मोहब्बत करें।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की वंदे मातरम पर ऐतिहासिक स्थिति क्या रही है?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने ऐतिहासिक रूप से यह स्थिति बनाए रखी है कि वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लामी मान्यताओं से असंगत हैं। मौलाना ने स्वयं कहा कि पहले भी इसी बुनियाद पर इसे राष्ट्रीय गीत की पूर्ण मान्यता नहीं दी गई थी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 8 महीने पहले
  6. 8 महीने पहले
  7. 8 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले