वंदे मातरम विवाद: जमीयत के मौलाना एजाज कश्मीरी बोले — 'मुसलमानों पर न थोपें, सजा मंजूर पर मजहब से समझौता नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदस्य मौलाना एजाज कश्मीरी ने 11 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट किया कि लाल किले पर वंदे मातरम गाए जाने के मुद्दे पर मुसलमानों के साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि जो इसे पढ़ना चाहे, पढ़े — लेकिन जिनके मजहब की बुनियाद इससे टकराती है, उन पर यह थोपा न जाए।
मौलाना का मुख्य वक्तव्य
मौलाना एजाज कश्मीरी ने कहा, 'यह मुल्क ऐसा है जहाँ हर मजहब के लोग रहते हैं। जिनको वंदे मातरम पढ़ना दुरुस्त है, हमें उनसे कोई ऐतराज नहीं। लाल किले पर पढ़ें, संसद में पढ़ें — लेकिन खासतौर पर मुसलमानों के साथ जबरदस्ती न की जाए।' उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लामी आस्था की बुनियाद से टकराती हैं, इसलिए वे इसे नहीं पढ़ सकते।
संवैधानिक अधिकार का हवाला
मौलाना ने तर्क दिया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने मजहब पर अमल करने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा, 'अगर सरकार अपनी मर्जी से मुल्क चला रही है, संविधान की मर्जी से नहीं, तो यह तानाशाही है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुसलमान यह नहीं कह रहे कि दूसरे भी न पढ़ें — यह माँग केवल अपने लिए है।
सजा की बात, समझौते से इनकार
मौलाना एजाज कश्मीरी ने दृढ़ता से कहा, 'अगर सरकार सख्ती बरतेगी, जेल में डालेगी, सजा देगी — तो भी हम नहीं पढ़ेंगे। हमें एक पल की सजा मंजूर है, लेकिन न अपने मजहब से गद्दारी करेंगे, न अपने मुल्क से।' उन्होंने कहा कि इसे पढ़ने से उनका ईमान चला जाएगा — यह उनके लिए आस्था का प्रश्न है।
तिरंगे पर अलग रुख
हर घर तिरंगा अभियान पर मौलाना का रुख स्पष्ट रूप से अलग रहा। उन्होंने कहा, 'तिरंगा हमारे मुल्क का झंडा है, हमारा फक्र है — मदरसे पर लगाओ, घर पर लगाओ, हमें कोई ऐतराज नहीं।' उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा जो '50 सालों से तिरंगा नहीं लगाए थे' और जिन्हें 'आज भी तिरंगा लगाने में शर्म आती है।'
मुस्लिम युवाओं से अपील
मौलाना ने मुस्लिम युवाओं और मदरसों से आह्वान किया कि वे केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को नहीं, बल्कि साल के 365 दिन अपने वतन से मोहब्बत करें। उन्होंने कहा कि उनके बाप-दादाओं ने इस मुल्क की आजादी के लिए कुर्बानी दी है और वे दिल से अपने देश से प्रेम करते हैं। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर देशभर में बहस तेज हो रही है।