गिरिराज सिंह का कांग्रेस पर हमला: 'वंदे मातरम' विवाद में मुस्लिम लीग के दबाव का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने 20 अगस्त 2026 को कांग्रेस के उस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी, जिसमें पार्टी ने 'वंदे मातरम' के केवल दो पद गाने की परंपरा अपनाई। उन्होंने कांग्रेस पर भारत-विरोधी रवैये और मुस्लिम लीग के दबाव में काम करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर सीधा निशाना साधा।
मुख्य घटनाक्रम
15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में 'वंदे मातरम' गायन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें पार्टी के शीर्ष नेताओं के भाव-भंगिमाओं को लेकर विवाद खड़ा हो गया। गिरिराज सिंह ने उस वीडियो का हवाला देते हुए कहा, '15 अगस्त को कांग्रेस दफ्तर में 'वंदे मातरम' के पूरे गायन के दौरान सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के चेहरे देखिए। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उन्हें ज़हर पिला रहा हो।'
भाजपा नेता के आरोप
गिरिराज सिंह ने कहा कि कांग्रेस अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है। उनके अनुसार, 'यह गांधी की कांग्रेस नहीं है — यह सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस है।' उन्होंने यह भी कहा कि 'वंदे मातरम' का विरोध केवल एक गीत तक सीमित नहीं, बल्कि यह देश के क्रांतिकारियों की विरासत के प्रति भी अनादर है। उनका आरोप था, 'पिछले 12 सालों में राहुल गांधी के बयानों पर नज़र डालें — उनमें से कोई भी भारत के पक्ष में नहीं है।'
नागरिकता और निष्ठा पर सवाल
गिरिराज सिंह ने सोनिया गांधी की नागरिकता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा, 'सोनिया गांधी ने शादी के 15 साल तक भारतीय नागरिकता नहीं ली, तो उनको भारत से प्यार कैसे हो सकता है?' साथ ही उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी अभी भी दोहरी नागरिकता के मामले में अदालत में उलझे हुए हैं। ये आरोप भाजपा की ओर से पहले भी उठाए जाते रहे हैं और कांग्रेस इन्हें राजनीति से प्रेरित बताती आई है।
मणिशंकर अय्यर के बयान पर पलटवार
कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कथित तौर पर कहा था कि सरकार ने मुसलमानों के प्रति नफरत के चलते 'वंदे मातरम' का पूरा पाठ अनिवार्य किया। इस पर गिरिराज सिंह ने पलटवार करते हुए कहा, 'वह एक कठपुतली हैं। वह राहुल के बड़े तोते हैं। राहुल गांधी उन्हें जो सिखाते हैं, वह वही कहते हैं।'
राजनीतिक संदर्भ और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब 'वंदे मातरम' को लेकर राष्ट्रीय बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। गौरतलब है कि यह गीत 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया था, और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी केंद्रीय भूमिका रही है। आलोचकों का कहना है कि इस मुद्दे को चुनावी ध्रुवीकरण के लिए उठाया जा रहा है, जबकि भाजपा इसे देशभक्ति की कसौटी बता रही है। कांग्रेस की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।