मिड-डे मील में फर्जी लाभार्थियों पर पश्चिम बंगाल सरकार की जांच, प्रधानाध्यापकों को नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना के तहत दर्ज फर्जी लाभार्थियों की पहचान के लिए 7 अगस्त 2026 को राज्यव्यापी औचक जांच अभियान शुरू किया है। नबन्ना स्थित राज्य सचिवालय के निर्देश पर विभिन्न जिलों के प्रशासन ने बिना पूर्व सूचना के स्कूलों में जांच करने का निर्णय लिया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मिड-डे मील पोर्टल पर दर्ज छात्रों की संख्या वास्तविक उपस्थिति से मेल खाती है या नहीं।
जांच का उद्देश्य और कार्यप्रणाली
राज्य सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, जांच का केंद्रीय लक्ष्य यह जाँचना है कि स्कूलों में वास्तव में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या और मिड-डे मील पोर्टल पर दर्ज आँकड़े एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं। अधिकारी ने स्पष्ट किया, 'अगर जांच में पता चलता है कि किसी स्कूल ने पोर्टल पर छात्रों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई है, तो पहले संबंधित स्कूल प्रशासन — जिसमें प्रधानाध्यापक या प्रधानाध्यापिका शामिल हैं — को कारण बताओ नोटिस भेजा जाएगा। संतोषजनक जवाब न मिलने पर कानूनी प्रावधानों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।'
अधिकारी के मुताबिक, लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ स्कूल अधिकारी पोर्टल पर छात्रों की संख्या फुलाकर दिखा रहे हैं। कुछ जिलों के सरकारी स्कूल पहले ही इस मामले में दोषी पाए जा चुके हैं और उनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
पूर्वी मिदनापुर का मामला — 10 गुना फर्जी नामांकन
पूर्वी मिदनापुर जिले के पटाशपुर-1 ब्लॉक का एक सरकारी स्कूल इस घोटाले का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यहाँ मिड-डे मील पोर्टल पर दर्ज छात्रों की संख्या वास्तविक नामांकन से लगभग 10 गुना अधिक पाई गई।
शिकायत मिलने के बाद संबंधित खंड विकास अधिकारी (BDO) ने स्वयं स्कूल में औचक निरीक्षण किया। जांच में वास्तविक और दर्ज संख्या के बीच बड़ा अंतर सामने आने पर स्कूल के प्रधानाध्यापक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
पिछली सरकार पर भी उठे थे सवाल
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना की अनियमितताएँ पहले भी विवाद का विषय रही हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की संयुक्त समीक्षा समिति ने आरोप लगाया था कि अप्रैल से सितंबर 2022 के बीच तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने मिड-डे मील लाभार्थियों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई, जिससे कथित तौर पर ₹100 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता हुई।
गौरतलब है कि पूर्ववर्ती सरकार पर भोजन की गुणवत्ता से समझौते के भी आरोप लगे थे। कुछ सरकारी स्कूलों में बच्चों को केवल चावल और नमक परोसे जाने की शिकायतें सामने आई थीं।
सरकार की प्रतिबद्धता
राज्य सचिवालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि 'नई व्यवस्था इस योजना में ऐसी गड़बड़ियों को खत्म करने के लिए दृढ़ है और इस संबंध में सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।' यह अभियान राज्य के सभी जिलों में चरणबद्ध तरीके से जारी रहेगा।
आम जनता और छात्रों पर असर
मिड-डे मील योजना लाखों गरीब परिवारों के बच्चों के लिए पोषण का एकमात्र भरोसेमंद स्रोत है। फर्जी नामांकन की वजह से वास्तविक लाभार्थियों को मिलने वाले संसाधन कम हो जाते हैं, जिससे सबसे कमज़ोर तबके के बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। इस जांच से उम्मीद है कि योजना का लाभ सही हाथों तक पहुँचेगा और सरकारी धन का दुरुपयोग रुकेगा।