कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारतीय तेल कंपनियों के शेयरों में 9 प्रतिशत तक की गिरावट
सारांश
Key Takeaways
- कच्चे तेल की कीमतें चार साल के उच्च स्तर पर पहुँचीं।
- भारतीय तेल कंपनियों के शेयरों में 9 प्रतिशत तक की गिरावट।
- संघर्ष का वैश्विक व्यापार पर प्रभाव।
- विशेषज्ञों की भविष्यवाणी: तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
- निवेशकों के लिए सतर्क रहने की सलाह।
मुंबई, 9 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के चलते कच्चे तेल की कीमतें चार वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई हैं। इस स्थिति का प्रभाव सोमवार को भारतीय तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के शेयरों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
शुरुआत में कारोबार के दौरान हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) के शेयरों में 7 से 9 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई।
इस महीने के आरंभ से अब तक, इन तीन सरकारी तेल कंपनियों के शेयरों में लगभग 14-15 प्रतिशत की कमी आई है। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि इन कंपनियों की लागत को बढ़ा देती है, जिससे उनकी आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
व्यापार के दौरान एचपीसीएल के शेयरों में सबसे अधिक गिरावट देखी गई, जो लगभग 8.7 प्रतिशत तक टूटी। इसके बाद बीपीसीएल के शेयर लगभग 7.99 प्रतिशत और आईओसीएल के शेयर करीब 7.2 प्रतिशत तक गिर गए।
जब खबर लिखी जा रही थी (दोपहर करीब 12:36 बजे), एनएसई पर एचपीसीएल का शेयर 6.32 प्रतिशत की कमी के साथ 379.20 रुपए पर ट्रेड हो रहा था। वहीं, बीपीसीएल का शेयर 5.50 प्रतिशत गिरकर लगभग 333.55 रुपए पर और आईओसीएल का शेयर 8.64 प्रतिशत गिरकर 160 रुपए के आसपास कारोबार कर रहा था।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गईं, क्योंकि मध्य पूर्व के बड़े तेल उत्पादकों ने उत्पादन में कटौती की है और होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति लगभग बंद हो गई है।
पिछले सप्ताह भी तेल की कीमतों में लगभग 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, क्योंकि संघर्ष के कारण तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। यह स्थिति 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के समय देखी गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-ईरान संघर्ष लम्बा चलता है, तो तेल की कीमतें ऊँची बनी रह सकती हैं। इससे तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था और तेल कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों की निगाहें मध्य-पूर्व की स्थिति और वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा पर टिकी हुई हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह संघर्ष लम्बा खिंचता है, तो तेल की कीमतें और भी बढ़ सकती हैं। कुछ बाजार अनुमानों के अनुसार, इस वर्ष के अंत तक कच्चा तेल 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकता है।
ऊर्जा इतिहासकार डेनियल येर्गिन ने कहा कि यह स्थिति रोजाना तेल उत्पादन के लिहाज से दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ा व्यवधान बन सकती है।
इस संघर्ष का असर वैश्विक व्यापार मार्गों पर भी पड़ रहा है। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापारिक जहाजों की आवाजाही धीमी हो गई है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव एशिया और यूरोप पर पड़ सकता है, क्योंकि ये क्षेत्र ऊर्जा के लिए फारस की खाड़ी से आने वाले आयात पर अधिक निर्भर हैं।