ई-20 एथेनॉल ब्लेंडिंग वैज्ञानिक रूप से सही: ICT कुलपति प्रो. पंडित, किसान-अर्थव्यवस्था-पर्यावरण तीनों को लाभ
सारांश
मुख्य बातें
इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (ICT), मुंबई के कुलपति और वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर अनिरुद्ध भालचंद्र पंडित ने 28 जुलाई को स्पष्ट किया कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (ई-20) मिलाने की नीति पूरी तरह ठोस वैज्ञानिक आधार पर आधारित है और इससे भारतीय किसानों की आय, देश की ऊर्जा सुरक्षा तथा पर्यावरण — तीनों को एक साथ लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ई-20 से इंजन को नुकसान होने की धारणा तकनीकी रूप से निराधार है।
इंजन पर प्रभाव: भ्रांति और वास्तविकता
प्रोफेसर पंडित ने बताया कि एथेनॉल का ऊष्मीय मान पेट्रोल से थोड़ा कम होता है। उनके अनुसार, 'यदि पुराने इंजन में इग्निशन टाइमिंग और फायरिंग सिस्टम में आवश्यक बदलाव नहीं किए जाएं तो माइलेज और एक्सेलेरेशन में मामूली अंतर महसूस हो सकता है। हालांकि, आधुनिक तकनीक वाले इंजन में यह समस्या लगभग नहीं के बराबर है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 1940 और 1950 के दशक में भारत में 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने वाले वाहन सड़कों पर उतर चुके हैं, इसलिए 20 प्रतिशत मिश्रण पर सवाल उठाने का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पुराने वाहनों में लगे रबर और पॉलिमर के पुर्जे एथेनॉल के संपर्क में आने पर प्रभावित हो सकते हैं, परंतु आधुनिक ग्रेड के पॉलिमर और रबर सामग्री से यह समस्या आसानी से दूर की जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कुछ मामलों में इंजन की समस्याओं की असली वजह ई-20 नहीं, बल्कि ईंधन का गलत भंडारण है — एथेनॉल में नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है, इसलिए ईंधन के सुरक्षित परिवहन और स्टोरेज पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
वैश्विक अनुभव: ब्राजील से सबक
प्रोफेसर पंडित ने बताया कि ब्राजील में कई वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल का अनुपात भारत से कहीं अधिक रखा जाता है और वहाँ 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने वाले वाहन भी सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। उनके अनुसार, यह वैश्विक अनुभव इस बात का प्रमाण है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग तकनीकी रूप से पूरी तरह व्यावहारिक है। गौरतलब है कि भारत एथेनॉल सम्मिश्रण के मामले में अभी भी ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में शुरुआती चरण में है।
किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर
प्रोफेसर पंडित के अनुसार, एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति से सबसे बड़ा फायदा भारतीय किसानों को होगा। पहले एथेनॉल मुख्यतः शीरे से बनाया जाता था, लेकिन अब गन्ने के रस, बायोमास और अन्य कृषि स्रोतों से भी इसका उत्पादन हो रहा है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत मिल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में एथेनॉल उत्पादन और उपयोग बढ़ने से पेट्रोलियम आयात में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारत ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा।
भविष्य की संभावनाएँ
प्रोफेसर पंडित ने कहा कि यदि आंतरिक दहन इंजन पर वैज्ञानिक अनुसंधान इसी गति से आगे बढ़ता रहा, तो भविष्य में पेट्रोल में 50 से 60 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाना भी संभव होगा। उन्होंने कहा कि जैसे वाहन उद्योग ने बेहतर माइलेज के लिए इंजन का वजन घटाया, उसी तरह एथेनॉल मिश्रित ईंधन के अनुरूप भी तकनीकी अनुकूलन किए जा रहे हैं। उन्होंने भारत को एथेनॉल और ब्यूटेनॉल जैसे जैव-ईंधनों का उत्पादन और बढ़ाने की सलाह दी, ताकि देश वैश्विक स्तर पर स्वच्छ और टिकाऊ ईंधन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सके।
विशेषज्ञ का निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को प्रोफेसर पंडित ने 'सही दिशा में उठाया गया कदम' बताया। उनका मानना है कि आने वाले समय में दुनिया को नवीकरणीय ईंधनों पर अधिक निर्भर होना ही पड़ेगा और एथेनॉल इस दिशा में सबसे प्रभावी विकल्पों में से एक है। सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रांतियों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि इंजन तकनीक में समय के साथ जरूरी सुधार किए जाते हैं और ई-20 इस स्वाभाविक विकास का हिस्सा है।