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एथेनॉल मिश्रण (ई20) से कच्चे तेल की निर्भरता घटेगी, किसानों और अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा: आईआईपीई निदेशक

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एथेनॉल मिश्रण (ई20) से कच्चे तेल की निर्भरता घटेगी, किसानों और अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा: आईआईपीई निदेशक

सारांश

आईआईपीई विशाखापत्तनम के निदेशक शालिवाहन श्रीवास्तव के अनुसार, एथेनॉल का हर लीटर एक लीटर आयातित तेल की जगह लेता है। ई20 कार्यक्रम सिर्फ ऊर्जा नीति नहीं — यह किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और विदेशी मुद्रा बचत का एक साथ समाधान है।

मुख्य बातें

आईआईपीई विशाखापत्तनम के निदेशक शालिवाहन श्रीवास्तव ने 28 जुलाई 2026 को एथेनॉल मिश्रण (ई20) के व्यापक लाभों की जानकारी दी।
एथेनॉल का प्रत्येक लीटर, एक लीटर आयातित जीवाश्म ईंधन की जगह लेता है — जिससे विदेशी मुद्रा की बचत और ऊर्जा सुरक्षा दोनों मजबूत होती हैं।
भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम 2001 में पायलट के रूप में शुरू हुआ; 2013-14 तक मिश्रण स्तर मात्र 1.5% था, जो अब ई20 तक पहुँच चुका है।
देश में प्रतिदिन 8 करोड़ वाहन ईंधन भरवाते हैं, जिनमें 80% पेट्रोल चालित हैं; पिछले ढाई वर्षों से ई19-ई20 बड़े पैमाने पर उपयोग में है।
नीति आयोग, एआरएआई और एसआईएएम ने ई20 लागू करने से पहले इंजन टिकाऊपन, उत्सर्जन और ईंधन दक्षता की गहन तकनीकी जाँच की।
एथेनॉल कार्यक्रम से किसानों की आय वृद्धि, ग्रामीण रोजगार और स्वच्छ पर्यावरण जैसे बहुआयामी लाभ सामने आ रहे हैं।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी (आईआईपीई), विशाखापत्तनम के निदेशक शालिवाहन श्रीवास्तव ने 28 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि पेट्रोल में मिलाया गया एथेनॉल का प्रत्येक लीटर, आयातित जीवाश्म ईंधन के एक लीटर की सीधी जगह लेता है। उनके अनुसार यह कदम भारत की कच्चे तेल पर आयात-निर्भरता को कम करने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर उत्पादित नवीकरणीय ईंधन को प्रोत्साहित कर देश की आर्थिक नींव को और मजबूत बनाता है।

किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

श्रीवास्तव ने कहा कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से किसानों के लिए नई आर्थिक संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। एथेनॉल उत्पादन में गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की माँग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर लीटर एथेनॉल भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर अधिक मूल्य बनाए रखता है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और देश की ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है।

ई20 की तकनीकी जाँच और सुरक्षा

आईआईपीई निदेशक ने यह भी स्पष्ट किया कि ई20 ईंधन को बिना पर्याप्त परीक्षण के लागू नहीं किया गया है। इसे लागू करने से पूर्व नीति आयोग, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) और अन्य संबंधित एजेंसियों ने व्यापक तकनीकी मूल्यांकन किया। इस मूल्यांकन में इंजन की टिकाऊ क्षमता, जंग लगने की संभावना, विभिन्न सामग्रियों की अनुकूलता, वाहन की ड्राइवेबिलिटी, उत्सर्जन, ईंधन दक्षता और समग्र प्रदर्शन जैसे सभी महत्वपूर्ण पहलुओं की गहन जाँच की गई।

वैश्विक अनुभव और भारत का सफर

श्रीवास्तव ने बताया कि ई20 कोई नई अवधारणा नहीं है — ब्राजील जैसे देशों में दशकों से इससे भी अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन का सफलतापूर्वक उपयोग हो रहा है। भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की नींव वर्ष 2001 में एक पायलट परियोजना के रूप में रखी गई थी। 2006 में ई5 लागू किया गया, परंतु 2013-14 तक मिश्रण का स्तर मात्र 1.5 प्रतिशत ही रहा। इसके बाद उत्पादन क्षमता, बुनियादी ढाँचे और नियामकीय व्यवस्था के विकास के साथ सरकार ने चरणबद्ध और संतुलित तरीके से एथेनॉल मिश्रण का प्रतिशत बढ़ाया।

मौजूदा स्थिति: आँकड़े क्या कहते हैं

निदेशक के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 8 करोड़ वाहन पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरवाने पहुँचते हैं, जिनमें करीब 80 प्रतिशत पेट्रोल चालित हैं। पिछले साढ़े तीन वर्षों से ई15 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन का व्यापक उपयोग हो रहा है, जबकि ई19 और ई20 ईंधन भी पिछले ढाई वर्षों से बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में हैं। यह व्यावहारिक अनुभव इस बात का प्रमाण है कि एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग पूरी तरह व्यावहारिक और सुरक्षित है।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे का रास्ता

श्रीवास्तव ने अंत में कहा कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम भारत के ऊर्जा आत्मनिर्भरता अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती और स्वच्छ पर्यावरण — ये सभी इस कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम हैं। आने वाले वर्षों में एथेनॉल आधारित ईंधन भारत के सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों को हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या एथेनॉल उत्पादन की गति खाद्य सुरक्षा के साथ संतुलन बना पाएगी। गन्ने और मक्के का बड़ा हिस्सा ईंधन की ओर मोड़ने से कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका विशेषज्ञों ने पहले भी जताई है। ई20 की तकनीकी सफलता निर्विवाद है, पर 2025 के बाद एथेनॉल आपूर्ति की स्थिरता और किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर सरकार की नीति अभी भी स्पष्ट नहीं है। बिना इन सवालों के जवाब के, यह कार्यक्रम अपनी पूरी क्षमता से कम पर ही रह सकता है।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एथेनॉल मिश्रण (ई20) क्या है और यह कैसे काम करता है?
ई20 वह ईंधन है जिसमें पेट्रोल के साथ 20% एथेनॉल मिलाया जाता है। एथेनॉल का प्रत्येक लीटर एक लीटर आयातित जीवाश्म ईंधन की जगह लेता है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है और घरेलू नवीकरणीय ईंधन को बढ़ावा मिलता है।
भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम कब शुरू हुआ?
भारत में यह कार्यक्रम 2001 में पायलट परियोजना के रूप में शुरू हुआ था। 2006 में ई5 लागू किया गया, लेकिन 2013-14 तक मिश्रण स्तर मात्र 1.5% रहा। इसके बाद बुनियादी ढाँचे और उत्पादन क्षमता के विकास के साथ चरणबद्ध तरीके से इसे बढ़ाया गया और अब ई20 तक पहुँचा है।
ई20 ईंधन क्या वाहनों के लिए सुरक्षित है?
आईआईपीई निदेशक शालिवाहन श्रीवास्तव के अनुसार, ई20 को नीति आयोग, एआरएआई और एसआईएएम द्वारा व्यापक तकनीकी मूल्यांकन के बाद लागू किया गया है। इंजन टिकाऊपन, जंग, उत्सर्जन और ईंधन दक्षता सहित सभी पहलुओं की गहन जाँच हुई है। पिछले ढाई वर्षों के व्यापक उपयोग ने इसकी व्यावहारिकता और सुरक्षा को प्रमाणित किया है।
एथेनॉल मिश्रण से किसानों को क्या फायदा होगा?
एथेनॉल उत्पादन में गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की माँग बढ़ने से किसानों को नई आर्थिक संभावनाएँ मिलती हैं और उनकी आय में वृद्धि होती है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर एथेनॉल कार्यक्रम का क्या प्रभाव पड़ेगा?
एथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटती है और देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता मजबूत होती है। आईआईपीई निदेशक के अनुसार, आने वाले वर्षों में एथेनॉल आधारित ईंधन भारत के सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
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