खरीफ सीजन 2026 में यूरिया उपलब्धता 163.78 लाख मीट्रिक टन, पश्चिम एशिया संकट के बावजूद आपूर्ति सामान्य: जेपी नड्डा
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने 25 जुलाई 2026 को लोकसभा में बताया कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद खरीफ सीजन 2026 के दौरान देश में उर्वरकों की उपलब्धता न केवल पर्याप्त रही, बल्कि माँग से काफी अधिक रही। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से 19 जुलाई 2026 तक यूरिया की उपलब्धता 163.78 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि आवश्यकता केवल 109.40 लाख मीट्रिक टन थी।
मुख्य घटनाक्रम
नड्डा ने लोकसभा को बताया कि सरकार ने उर्वरक आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित रखने के लिए आपूर्ति विविधीकरण, सामूहिक खरीद और मजबूत निगरानी तंत्र जैसे बहुआयामी उपाय अपनाए। भारतीय उर्वरक कंपनियों और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के बीच दीर्घकालिक व्यावसायिक समझौतों को बढ़ावा दिया गया। विभिन्न देशों में स्थित भारतीय मिशनों के माध्यम से वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत चिह्नित किए गए और उद्योग समूहों के जरिए अमोनिया तथा सल्फर जैसे कच्चे माल की सामूहिक खरीद को प्रोत्साहित किया गया, जिससे बेहतर मूल्य और सौदेबाजी की क्षमता सुनिश्चित हुई।
उर्वरक उपलब्धता के आँकड़े
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, इस खरीफ सीजन में प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता माँग से अधिक रही। यूरिया की जरूरत 109.40 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले 163.78 लाख मीट्रिक टन उपलब्ध रहा। डीएपी की माँग 31.57 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 39.54 लाख मीट्रिक टन रही। एमओपी और एनपीकेएस उर्वरकों की स्थिति भी इसी प्रकार संतोषजनक रही।
पश्चिम एशिया संकट का असर और सरकार की प्रतिक्रिया
मंत्रालय ने माना कि पश्चिम एशिया संकट का सबसे अधिक प्रभाव अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर के आयात पर पड़ा। वैश्विक लॉजिस्टिक्स बाधित होने से पोटाश के आयात की लागत भी बढ़ी। इसके साथ ही आइसोप्रोपाइल अल्कोहल (IPA), अमोनिया और मेथनॉल जैसे कच्चे माल की अस्थायी कमी और मूल्यवृद्धि से निपटने के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के साथ समन्वय कर प्रोपिलीन का आवंटन कराया गया। सरकार ने दवा उद्योगों को अतिरिक्त अमोनिया की आपूर्ति भी सुनिश्चित कराई।
निगरानी और समन्वय तंत्र
नड्डा ने बताया कि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्य सरकारों के साथ समन्वय कर राज्यवार और माहवार उर्वरक जरूरतों का आकलन करता है। इसी आधार पर उर्वरक विभाग हर महीने आपूर्ति योजना जारी करता है। इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) के माध्यम से उर्वरकों की आवाजाही पर लगातार नजर रखी जाती है और नियमित साप्ताहिक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उपलब्धता की समीक्षा कर जरूरत पड़ने पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ अभी भी भू-राजनीतिक दबावों से जूझ रही हैं। सरकार ने घरेलू निर्माताओं के सहयोग से मेथनॉल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत भी विकसित किए हैं। गौरतलब है कि भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए आपूर्ति विविधीकरण की यह नीति किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने की दृष्टि से दीर्घकालिक महत्त्व रखती है।