उच्च अल्कोहल युक्त दवाओं पर केंद्र सरकार का बड़ा फैसला: लाइसेंस और पर्चा अनिवार्य, दुरुपयोग पर लगेगी लगाम
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने 10 जुलाई 2026 को उच्च मात्रा में एथिल अल्कोहल (इथेनॉल) युक्त औषधीय फॉर्मूलेशनों के नियमन को कड़ा करते हुए इनकी बिक्री के लिए लाइसेंस और पंजीकृत चिकित्सक का पर्चा अनिवार्य कर दिया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र (गजट) अधिसूचना के माध्यम से लागू इस संशोधन का उद्देश्य इन दवाओं के नशे के लिए दुरुपयोग पर रोक लगाना और वास्तविक चिकित्सीय जरूरतमंद मरीजों के लिए इनकी उपलब्धता बनाए रखना है।
क्या बदला है नियमों में
अब तक इलायची, अदरक और अन्य सुगंधित औषधीय फॉर्मूलेशन की टिंचर (अर्क) जैसी कई तैयारियाँ अनुसूची-के (Schedule K) के तहत लाइसेंस संबंधी आवश्यकताओं से मुक्त थीं। सरकार के अनुसार, इनमें से कुछ उत्पादों में 80 से 90 प्रतिशत तक एथाइल अल्कोहल होता है, जिससे इनके नशे के उद्देश्य से दुरुपयोग की गंभीर आशंका बनी रहती थी।
संशोधित नियमों के तहत 12 प्रतिशत से अधिक एथाइल अल्कोहल वाली और 30 मिलीलीटर से अधिक की पैकिंग में उपलब्ध सभी औषधीय तैयारियाँ अब अनुसूची-के के तहत मिलने वाली छूट की पात्र नहीं रहेंगी। इसके परिणामस्वरूप ऐसे उत्पादों के निर्माताओं और विक्रेताओं को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत आवश्यक लाइसेंस प्राप्त करना होगा।
अनुसूची-एच1 में शामिल: क्या होगा असर
इन औषधीय तैयारियों को ड्रग्स रूल्स, 1945 की अनुसूची-एच1 (Schedule H1) में भी शामिल किया गया है, जो देश की सबसे कड़ी नियामकीय श्रेणियों में से एक है। अनुसूची-एच1 में शामिल दवाएँ केवल पंजीकृत चिकित्सा प्रैक्टिशनर के पर्चे पर ही बेची जा सकती हैं और विक्रेताओं को इनके विक्रय का विस्तृत रिकॉर्ड रखना भी अनिवार्य होगा। गौरतलब है कि अनुसूची-एच1 में पहले से ही नशीली और संवेदनशील दवाएँ शामिल हैं।
राज्यों की चिंता से उठा मुद्दा
मंत्रालय ने बताया कि कई राज्य सरकारों ने इन उत्पादों के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताते हुए केंद्र को सुझाव और संदर्भ भेजे थे। यह ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में सस्ती और आसानी से उपलब्ध अल्कोहल युक्त दवाओं के नशे के रूप में इस्तेमाल की खबरें सामने आती रही हैं।
जनस्वास्थ्य पर असर और आगे की राह
मंत्रालय के अनुसार, संशोधित व्यवस्था से अल्कोहल युक्त औषधीय उत्पादों की निगरानी और नियंत्रण मजबूत होगा तथा इनकी आपूर्ति केवल विनियमित दवा वितरण प्रणाली के माध्यम से ही सुनिश्चित की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे दुरुपयोग और गलत इस्तेमाल की आशंका में उल्लेखनीय कमी आएगी, जबकि वास्तविक चिकित्सीय जरूरत वाले मरीजों को इन दवाओं की उपलब्धता बाधित नहीं होगी। यह संशोधन देश की दवा नियामक व्यवस्था को सुदृढ़ करने और जनस्वास्थ्य सुरक्षा के व्यापक सरकारी प्रयासों का हिस्सा बताया जा रहा है।