भारत के डीप वाटर पोर्ट अभियान में तेजी, कोलंबो-सिंगापुर पर निर्भरता खत्म करने की रणनीति
सारांश
मुख्य बातें
भारत अपने प्रमुख बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और नए गहरे समुद्री टर्मिनलों के निर्माण में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, ताकि वर्तमान में कोलंबो और सिंगापुर के ज़रिए होने वाले ट्रांसशिपमेंट यातायात को सीधे भारतीय बंदरगाहों पर आकर्षित किया जा सके। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार चेन्नई के निकट एन्नोर स्थित कामराजर बंदरगाह, ओडिशा के पारादीप बंदरगाह और कच्छ के दीनदयाल बंदरगाह सहित कई प्रमुख बंदरगाहों की ड्राफ्ट गहराई 14 मीटर से बढ़ाकर 18 मीटर कर रही है। यह बदलाव इसलिए ज़रूरी है ताकि ये बंदरगाह 14,000 से 24,000 टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट) क्षमता वाले बड़े 'मदर वेसल' को संभाल सकें।
इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर 7 जुलाई को तब देखने को मिला जब दुनिया का सबसे बड़ा कंटेनर जहाज एमएससी इरिना केरल के विझिंजम बंदरगाह पर पहुँचा। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा इस कमी को दूर करने का संकल्प जताने के एक वर्ष के भीतर ही यह उपलब्धि हासिल हुई।
दशकों की अनदेखी का संदर्भ
रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत की 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री तटरेखा और देश के दक्षिणी छोर से गुज़रने वाले दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों के बावजूद, पिछली सरकारों ने भारतीय बंदरगाहों को अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने की अनदेखी की। रिपोर्ट के शब्दों में, "दशकों तक भारत के समुद्री व्यापार में एक विडंबना रही — इतनी विशाल तटरेखा और व्यस्त समुद्री मार्गों के बावजूद भारत के पास ऐसे बंदरगाह नहीं थे, जहाँ मदर वेसल आ सकें।"
वधावन और मुंद्रा: भविष्य के स्तंभ
महाराष्ट्र में विकसित किया जा रहा वधावन बंदरगाह लगभग 20 मीटर की प्राकृतिक ड्राफ्ट गहराई के साथ तैयार किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके पूर्ण होने पर यह दुनिया के शीर्ष 10 कंटेनर ट्रांसशिपमेंट हब में शामिल हो सकता है।
निजी क्षेत्र में गुजरात का मुंद्रा बंदरगाह, जिसकी ड्राफ्ट गहराई 17.5 मीटर है, पहले ही इस क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है। यह भारत का एकमात्र बंदरगाह है जहाँ से 14,000 टीईयू से अधिक क्षमता वाले कंटेनर जहाज सीधे अमेरिका के लिए रवाना होते हैं, जिससे बीच के ट्रांसशिपमेंट हब की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
आम जनता और व्यापार पर असर
सरकार की मौजूदा योजना के तहत बंदरगाहों की ड्राफ्ट गहराई बढ़ाई जा रही है ताकि वे लगभग 2 लाख टन डेडवेट कार्गो ले जाने वाले केप-साइज ड्राई बल्क जहाजों को भी संभाल सकें। यदि यह अभियान सफल रहा, तो भारतीय निर्यातकों की लागत में कमी आ सकती है और देश की समुद्री व्यापार में वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ सकती है।
क्या होगा आगे
रिपोर्ट के अनुसार, वर्षों की अनदेखी को अब समस्या के आकार के अनुरूप बड़े पैमाने और तात्कालिकता के साथ दूर किया जा रहा है। विझिंजम में एमएससी इरिना की सफल डॉकिंग को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भारत के बंदरगाह अब वैश्विक शिपिंग मार्गों पर एक विश्वसनीय विकल्प बनने की दिशा में अग्रसर हैं।