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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: चीन की 'मलक्का डिलेमा' को गहरा करेगा भारत का यह रणनीतिक दांव

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: चीन की 'मलक्का डिलेमा' को गहरा करेगा भारत का यह रणनीतिक दांव

सारांश

ग्रेट निकोबार सिर्फ एक बंदरगाह परियोजना नहीं है — यह हिंद महासागर में भारत का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक दांव है। मलक्का स्ट्रेट के किनारे यह उपस्थिति चीन की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे बड़ी कमज़ोरी को सीधे निशाने पर लेती है, और दशकों की समुद्री निष्क्रियता के बाद भारत को एक सक्रिय द्वीपीय शक्ति में बदलने की क्षमता रखती है।

मुख्य बातें

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्ग से मात्र लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है और इसकी प्राकृतिक जल गहराई 20 मीटर से अधिक है।
ब्रिगेडियर संजय अय्यर (सेवानिवृत्त) ने इसे 'हाल के दशकों में भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक दांवों में से एक' बताया।
चीन के समुद्री व्यापार का दो-तिहाई और तेल आयात का 70-80 प्रतिशत मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है — जिसे यह परियोजना और संवेदनशील बनाती है।
गलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट ( ICTP ) के साथ हवाई अड्डा, टाउनशिप और बिजली संयंत्र भी विकसित किए जा रहे हैं।
परियोजना कोलंबो , सिंगापुर और क्लैंग पर भारत की ट्रांसशिपमेंट निर्भरता कम करेगी और राजस्व हानि रोकेगी।
चीन श्रीलंका , पाकिस्तान और जिबूती में नौसैनिक और वाणिज्यिक नेटवर्क बनाकर हिंद महासागर में अपनी पहुँच पहले से बढ़ा रहा है।

भारत सरकार का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश को पूर्वी हिंद महासागर में एक निर्णायक समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, यह परियोजना वैश्विक पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्ग के निकट भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मज़बूत करेगी और कोलंबो, सिंगापुर तथा क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता को कम करेगी। 24 मई को सामने आई इस रिपोर्ट में सैन्य विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने परियोजना के भू-राजनीतिक महत्व को रेखांकित किया है।

परियोजना की रणनीतिक स्थिति

ग्रेट निकोबार द्वीप पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्ग से मात्र लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है। इस द्वीप की प्राकृतिक जल गहराई 20 मीटर से अधिक है, जो इसे बड़े मालवाहक जहाजों के लिए उपयुक्त बनाती है। यह स्थिति इसे प्रवेश द्वार और पारगमन — दोनों प्रकार के माल को आकर्षित करने में सक्षम बनाती है।

गौरतलब है कि भारत के अधिकांश बंदरगाहों में गहरे पानी के बर्थ की कमी के कारण माल को अभी कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते भेजा जाता है, जिससे देश को भारी राजस्व हानि होती है। म्यांमार, चीन और श्रीलंका इस व्यापार को हासिल करने के लिए पहले से ही गहरे पानी की सुविधाएँ विकसित कर रहे हैं।

चीन की 'मलक्का डिलेमा' पर असर

भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और सैन्य राजनयिक ब्रिगेडियर संजय अय्यर (सेवानिवृत्त) के अनुसार, ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट के किनारे पर स्थित है, जो विश्व के समुद्री व्यापार का एक चौथाई से एक तिहाई हिस्सा संभालता है। चीन के समुद्री व्यापार का दो-तिहाई और तेल आयात का लगभग 70-80 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

अय्यर ने कहा, 'बीजिंग ने मलक्का डिलेमा को लेकर खुलकर चिंता जताई है — ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा एक संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है जिस पर उसका नियंत्रण नहीं है। ग्रेट निकोबार जलडमरूमध्य इस दुविधा को और भी गंभीर बना देता है।' उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से मलक्का का एक संभावित चोकपॉइंट के रूप में महत्व और बढ़ गया है, क्योंकि इस संघर्ष ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजरानी और ऊर्जा निर्यात को बाधित किया है।

निगरानी और सैन्य क्षमता में बढ़ोतरी

अय्यर के अनुसार, यह परियोजना भारत को पूर्वी हिंद महासागर में निरंतर उपस्थिति, क्षेत्र से गुजरने वाली गतिविधियों की बेहतर जानकारी और 'पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभाव' प्रदान करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि भारत शांति काल में स्ट्रेट की नाकाबंदी नहीं करेगा, लेकिन यहाँ विकसित बुनियादी ढाँचा चीनी नौसेना, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र और हिंद महासागर की गतिविधियों पर नज़र रखने की भारत की क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा।

अय्यर ने इस परियोजना को 'हाल के दशकों में भारत द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक दांवों में से एक' बताया।

भारत की समुद्री क्षमता और चीन की प्रतिस्पर्धा

विश्लेषकों के अनुसार, भारत हिंद महासागर की क्षमता का अब तक पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाया है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाली वाणिज्य और ऊर्जा आपूर्ति की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके विपरीत, बीजिंग हिंद महासागर तक अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और जिबूती में विदेशी वाणिज्यिक और सैन्य बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा पाइपलाइनों और नौसैनिक सुविधाओं का एक व्यापक नेटवर्क तैयार कर रहा है।

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय चंद्र ने कहा, 'ग्रेट निकोबार भारत को एक समुद्री शक्ति, या विशेष रूप से एक द्वीपीय शक्ति के रूप में सोचने के लिए प्रेरित करता है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह वह स्थान है जहाँ भारत दक्षिणपूर्व एशिया से जुड़ता है।'

गलाथिया खाड़ी: परियोजना का केंद्रीय अवसंरचनात्मक घटक

द्वीप विकास कार्यक्रम के तहत गलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP) विकसित किया जा रहा है। प्रस्तावित हवाई अड्डे, टाउनशिप और बिजली संयंत्र के साथ, यह ट्रांसशिपमेंट पोर्ट समग्र ग्रेट निकोबार परियोजना का प्रमुख अवसंरचनात्मक स्तंभ है। यह परियोजना अंडमान सागर और दक्षिणपूर्व एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मज़बूत करने के साथ-साथ बंदरगाह-आधारित आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का भी प्रयास करती है।

यह ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है और भारत अपनी समुद्री रणनीति को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि क्रियान्वयन की गति में होगी — भारत के पास दशकों से द्वीपीय क्षमता थी, पर उसका उपयोग नहीं हुआ। यह विडंबना है कि जब भारत गलाथिया खाड़ी बना रहा है, चीन श्रीलंका और पाकिस्तान में पहले से मौजूद है। पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने पर परियोजना कानूनी और सामाजिक अवरोधों में फँस सकती है, जैसा अन्य बड़े अवसंरचनात्मक प्रकल्पों में हुआ है। असली सवाल यह है कि क्या भारत इस बार रणनीतिक दृष्टि को दीर्घकालिक राजनीतिक इच्छाशक्ति और बजटीय निरंतरता से जोड़ पाएगा।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की एक बड़ी अवसंरचनात्मक और रणनीतिक पहल है, जिसका लक्ष्य इस द्वीप को एक समुद्री और आर्थिक केंद्र में बदलना है। इसके तहत गलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, टाउनशिप और बिजली संयंत्र विकसित किए जा रहे हैं।
यह परियोजना चीन के लिए रणनीतिक चुनौती क्यों है?
ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट के निकट स्थित है, जिससे चीन का दो-तिहाई समुद्री व्यापार और 70-80 प्रतिशत तेल आयात गुजरता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यहाँ भारत की उपस्थिति चीन की 'मलक्का डिलेमा' को और गहरा करती है और हिंद महासागर में उसकी गतिविधियों पर नज़र रखने की भारत की क्षमता बढ़ाती है।
गलाथिया खाड़ी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के लिए आर्थिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के बंदरगाहों में गहरे पानी के बर्थ की कमी के कारण फिलहाल माल कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते भेजा जाता है, जिससे भारत को भारी राजस्व हानि होती है। गलाथिया खाड़ी पोर्ट इस निर्भरता को समाप्त कर भारत को ट्रांसशिपमेंट राजस्व का बड़ा हिस्सा दिला सकता है।
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह भारत की समुद्री रणनीति में कैसे फिट होता है?
अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय चंद्र के अनुसार, यह द्वीपसमूह वह स्थान है जहाँ भारत दक्षिणपूर्व एशिया से जुड़ता है। यह परियोजना भारत को एक द्वीपीय शक्ति के रूप में सोचने और हिंद महासागर की पूर्ण क्षमता का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है।
चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति कैसे बढ़ा रहा है?
चीन श्रीलंका, पाकिस्तान और जिबूती में वाणिज्यिक बंदरगाहों, नौसैनिक सुविधाओं और ऊर्जा पाइपलाइनों का एक व्यापक नेटवर्क तैयार कर रहा है। यह नेटवर्क उसे हिंद महासागर तक सीधी पहुँच देता है, जो भारत के लिए एक दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौती है।
राष्ट्र प्रेस
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