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आईएमईसी: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जो बदल सकता है वैश्विक व्यापार का नक्शा

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आईएमईसी: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जो बदल सकता है वैश्विक व्यापार का नक्शा

सारांश

जी20 में घोषित आईएमईसी गलियारा भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने का सबसे बड़ा बुनियादी ढांचा दांव है — परिवहन लागत में ~30% कटौती और डिजिटल क्षमता विस्तार का वादा लिए। लेकिन मध्य पूर्व संघर्ष ने इसकी रफ्तार थाम रखी है।

मुख्य बातें

आईएमईसी की घोषणा सितंबर 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी।
परियोजना के हस्ताक्षरकर्ताओं में भारत, अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब, इजरायल, जॉर्डन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ शामिल हैं।
इस गलियारे से भारत से यूरोप तक परिवहन लागत में लगभग 30 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है।
भारत वैश्विक डेटा का लगभग 20% उत्पन्न करता है, किंतु उसके पास वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता का केवल 3% हिस्सा है — आईएमईसी की फाइबर-ऑप्टिक केबलें इस अंतर को पाटने में सहायक होंगी।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण परियोजना की प्रगति फिलहाल बाधित है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आईएमईसी को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) एक महत्वाकांक्षी बहुराष्ट्रीय बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसका लक्ष्य व्यापार, ऊर्जा और डिजिटल नेटवर्क के एकीकृत तंत्र के ज़रिए भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच संपर्क को नई ताकत देना है। मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, इस परियोजना को आंशिक रूप से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है।

आईएमईसी की पृष्ठभूमि और घोषणा

सितंबर 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान आईएमईसी की औपचारिक घोषणा की गई थी। इस पहल के प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं में भारत, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, इजरायल, जॉर्डन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि कतर, ओमान, तुर्की, इराक और ईरान इस पहल का हिस्सा नहीं हैं।

यह गलियारा वस्तुओं, ऊर्जा और डेटा के परिवहन के लिए विकसित किया जाएगा। प्रस्तावित ढांचे में आधुनिक बंदरगाह, एकीकृत ऊर्जा ग्रिड, रेल नेटवर्क और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली केबलें शामिल होंगी।

वैश्विक व्यापार मार्गों की कमज़ोरी और आईएमईसी की प्रासंगिकता

विश्लेषण के अनुसार, 2021 में स्वेज नहर में जहाज फंसने की घटना और 2023 के अंत से लाल सागर क्षेत्र में हूती विद्रोहियों की गतिविधियों ने वैश्विक व्यापार मार्गों की कमज़ोरियों को उजागर किया है। आईएमईसी बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और स्वेज नहर पर निर्भरता कम कर इन चुनौतियों का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकता है।

इस गलियारे के ज़रिए भारत से यूरोप तक माल पहुंचाने में लगने वाला समय उल्लेखनीय रूप से घट सकता है, और परिवहन लागत में लगभग 30 प्रतिशत तक की कमी आने का अनुमान है।

ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्र में संभावित लाभ

हालांकि यह परियोजना मुख्यतः परिवहन नेटवर्क पर आधारित है, विश्लेषकों का मानना है कि इसके सबसे बड़े लाभ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में दिखेंगे। इस मार्ग पर बिछाई जाने वाली फाइबर-ऑप्टिक केबलें यूरोप, खाड़ी देशों और भारत के बीच अत्यधिक क्षमता, कम विलंबता (लो-लेटेंसी) और तीव्र डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करेंगी।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत डेटा उत्पन्न करता है, किंतु उसके पास दुनिया की कुल डेटा सेंटर क्षमता का केवल लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा है। विश्लेषण के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने तकनीकी और डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार पर विशेष जोर दिया है — ऐसे में आईएमईसी के फाइबर-ऑप्टिक और ऊर्जा नेटवर्क इस परियोजना की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बन सकते हैं।

रणनीतिक और भू-राजनीतिक आयाम

आईएमईसी क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने के साथ-साथ अमेरिका के रणनीतिक हितों को भी बढ़ावा देगा। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि यह परियोजना अब्राहम समझौते के तहत शुरू हुई सामान्यीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

भारत की बड़ी औद्योगिक कंपनियां पहले से ही खाड़ी देशों के साथ बंदरगाह, रेलवे और दूरसंचार बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग करती रही हैं। वर्तमान में प्रौद्योगिकी और सेमीकंडक्टर उद्योग भारत-खाड़ी संबंधों का प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं।

मौजूदा बाधाएं और आगे की राह

विश्लेषण के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी सशस्त्र संघर्ष के कारण फिलहाल आईएमईसी परियोजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है। घोषणा के करीब ढाई साल बाद भी परियोजना की प्रगति सीमित रही है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि चाहे आईएमईसी हो या कोई अन्य प्रतिस्पर्धी पहल, क्षेत्रीय देश अधिक जुड़े हुए और समृद्ध आर्थिक ढांचे के निर्माण के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर काम जारी रखेंगे। डेटा की बढ़ती वैश्विक मांग और व्यापार मार्गों की अनिश्चितता को देखते हुए, आईएमईसी जैसी परियोजनाओं की रणनीतिक आवश्यकता पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन घोषणा और क्रियान्वयन के बीच की खाई अब भी चिंताजनक है — ढाई साल बाद भी ठोस प्रगति सीमित है। मध्य पूर्व संघर्ष एक वास्तविक बाधा है, पर असली परीक्षा यह है कि क्या हस्ताक्षरकर्ता देश राजनीतिक इच्छाशक्ति को वित्तीय प्रतिबद्धता में बदल पाएंगे। भारत के लिए डिजिटल और ऊर्जा आयाम परिवहन से कहीं अधिक रणनीतिक हैं — 20% डेटा उत्पादन और 3% क्षमता का असंतुलन एक संरचनात्मक कमज़ोरी है जिसे बीआरआई-विकल्प की बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि वास्तविक केबल और डेटा सेंटर निवेश से ही दूर किया जा सकता है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईएमईसी क्या है और इसकी घोषणा कब हुई?
आईएमईसी (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) एक प्रस्तावित बहुराष्ट्रीय बुनियादी ढांचा पहल है, जिसकी घोषणा सितंबर 2023 में नई दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य व्यापार, ऊर्जा और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ना है।
आईएमईसी से भारत को क्या फायदा होगा?
आईएमईसी से भारत से यूरोप तक परिवहन लागत में लगभग 30 प्रतिशत की कमी आ सकती है। इसके अलावा, फाइबर-ऑप्टिक केबलें भारत के डिजिटल क्षेत्र को अतिरिक्त क्षमता देंगी और देश के 20% वैश्विक डेटा उत्पादन बनाम 3% डेटा सेंटर क्षमता के असंतुलन को कम करने में मदद करेंगी।
आईएमईसी परियोजना में कौन-कौन से देश शामिल हैं?
आईएमईसी के प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं में भारत, अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब, इजरायल, जॉर्डन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ शामिल हैं। कतर, ओमान, तुर्की, इराक और ईरान इस पहल का हिस्सा नहीं हैं।
आईएमईसी की प्रगति क्यों धीमी है?
मध्य पूर्व में जारी सशस्त्र संघर्ष के कारण आईएमईसी परियोजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है। घोषणा के करीब ढाई साल बाद भी परियोजना की व्यावहारिक प्रगति सीमित रही है।
आईएमईसी को बीआरआई का विकल्प क्यों माना जा रहा है?
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार, आईएमईसी को आंशिक रूप से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यह परियोजना अमेरिका के रणनीतिक हितों को बढ़ावा देने के साथ-साथ क्षेत्रीय देशों को चीन-केंद्रित बुनियादी ढांचे पर निर्भरता कम करने का अवसर देती है।
राष्ट्र प्रेस
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