सेंसेक्स-निफ्टी लगातार सातवें दिन दबाव में, कच्चे तेल की कीमतें ₹92 डॉलर/बैरल; आईटी शेयरों ने थामा बाज़ार
सारांश
मुख्य बातें
बीएसई सेंसेक्स बुधवार को 77,218.05 पर सपाट खुला — अपने पिछले बंद 77,235.46 से मात्र 17.41 अंक (0.02%) नीचे — और बाद में गिरकर इंट्रा-डे लो 76,991.28 तक पहुँचा। यह लगातार सातवाँ कारोबारी सत्र है जब पश्चिम एशिया के तनावों और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल के कारण प्रमुख बेंचमार्कों पर बिकवाली का दबाव बना रहा, हालाँकि निफ्टी आईटी सूचकांक में 0.82% की बढ़त ने बाज़ार को बड़े नुकसान से बचाए रखा।
मुख्य घटनाक्रम
एनएसई निफ्टी 50 अपने पिछले बंद 24,154.90 से 2.85 अंक (0.01%) की मामूली गिरावट के साथ 24,152.05 पर खुला। बाद के सत्र में यह 0.37% यानी करीब 90 अंक फिसलकर 24,065.10 के दिन के निचले स्तर तक पहुँचा, जबकि दिन का उच्च स्तर 24,172.85 रहा। खबर लिखे जाने तक सेंसेक्स 222.87 अंक (0.29%) की गिरावट के साथ 77,012.59 पर और निफ्टी 74 अंक (0.31%) नीचे 24,080.90 पर कारोबार कर रहा था।
व्यापक बाज़ारों में भी दबाव रहा — निफ्टी मिडकैप 0.39% और निफ्टी स्मॉलकैप 0.37% की गिरावट के साथ कारोबार करते नज़र आए।
क्षेत्रवार प्रदर्शन
क्षेत्रीय तस्वीर मिली-जुली रही। निफ्टी आईटी 0.82% की बढ़त के साथ शीर्ष प्रदर्शनकर्ता रहा। निफ्टी मिडस्मॉल आईटी एंड टेलीकॉम में 0.59% और निफ्टी एफएमसीजी में 0.2% की तेज़ी दर्ज की गई। रियल्टी और रीट्स सूचकांकों में भी लगभग 0.2% तक की बढ़त रही, जबकि ऑयल एंड गैस में 0.08% की मामूली मज़बूती देखी गई।
दूसरी ओर, निफ्टी मेटल 0.35% और निफ्टी ऑटो 0.14% टूटे। हेल्थकेयर, फार्मा और केमिकल्स सूचकांकों में भी हल्की कमज़ोरी रही।
वैश्विक दबाव के कारण
बाज़ार विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा कमज़ोरी की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ब्रेंट क्रूड का $92 प्रति बैरल तक पहुँचना है — जो पिछले तीन सप्ताह का उच्चतम स्तर है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रखने के संकेत तथा अमेरिका द्वारा युद्धविराम अवधि बढ़ाने से इनकार के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएँ और गहरी हो गई हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी 30-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तरों पर पहुँच गई है, जिससे वैश्विक निवेशकों की जोखिम उठाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। एशियाई बाज़ारों में भी सेमीकंडक्टर शेयरों पर दबाव और पश्चिम एशिया की अनिश्चितता के कारण कमज़ोरी देखी गई।
भारतीय बाज़ार की सापेक्षिक मज़बूती
गौरतलब है कि इन वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय बाज़ार अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मज़बूत आर्थिक बुनियाद, GDP वृद्धि की बेहतर संभावनाएँ, वित्त वर्ष 2026-27 में कॉरपोरेट आय में सुधार की उम्मीद और घरेलू निवेशकों की सक्रिय भागीदारी बाज़ार को बड़े नुकसान से बचाए हुए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर इक्विटी बाज़ारों पर व्यापक दबाव है।
आगे की राह
विश्लेषकों का अनुमान है कि जब तक पश्चिम एशिया की स्थिति में ठोस सुधार नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक भारतीय बाज़ारों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालाँकि दीर्घकालिक निवेशकों के लिए मौजूदा गिरावट को गुणवत्तापूर्ण शेयरों में निवेश बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से मिडकैप और स्मॉलकैप खंड में।