एम्फैसिस ने कोफोर्ज के खिलाफ अमेरिकी अदालत में दायर की याचिका, एग्जीक्यूटिव भर्ती और डेटा दुरुपयोग के आरोप
सारांश
मुख्य बातें
आईटी सर्विसेज कंपनी एम्फैसिस ने प्रतिद्वंद्वी फर्म कोफोर्ज के खिलाफ अमेरिकी अदालत में याचिका दायर की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कोफोर्ज ने एम्फैसिस के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों की भर्ती कर और ग्राहकों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी हासिल कर संविदात्मक दायित्वों का उल्लंघन किया। मार्च 2025 में दायर किए गए इन कानूनी दस्तावेजों का खुलासा कई रिपोर्ट्स में हुआ है।
मुकदमे की मुख्य माँगें
रिपोर्टों के अनुसार, एम्फैसिस ने अदालत से माँग की है कि कोफोर्ज को उसके दो पूर्व अधिकारियों को साझा ग्राहक चार्ल्स श्वाब से जुड़े प्रोजेक्टों पर नियुक्त करने से रोका जाए। चार्ल्स श्वाब एक ऐसी कंपनी है जिसे दोनों आईटी फर्में अपनी सेवाएँ प्रदान करती हैं।
एम्फैसिस ने यह भी अनुरोध किया है कि उन नियुक्तियों के ज़रिए कथित तौर पर प्राप्त गोपनीय व्यावसायिक जानकारी के किसी भी उपयोग पर तत्काल रोक लगाई जाए। इसके अतिरिक्त, कंपनी ने आर्थिक मुआवजे के साथ-साथ कानूनी लागत और वकील की फीस की भी माँग की है।
पूर्व उपाध्यक्ष बृजेश खेरगमकर पर आरोप
मुकदमे में एम्फैसिस के पूर्व उपाध्यक्ष बृजेश खेरगमकर का नाम विशेष रूप से शामिल किया गया है। एम्फैसिस ने माँग की है कि उन्हें एक वर्ष की अवधि के लिए कोफोर्ज के माध्यम से चार्ल्स श्वाब के आउटसोर्सिंग कार्यों में भाग लेने से प्रतिबंधित किया जाए।
कंपनी का तर्क है कि इस तरह की नियुक्ति उनके पूर्व अनुबंध में निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करती है। एम्फैसिस का आगे आरोप है कि कोफोर्ज ने कई वरिष्ठ कर्मचारियों की भर्ती कर अनुचित व्यावसायिक लाभ उठाया, जिनके पास रणनीतिक और ग्राहक-विशिष्ट जानकारी तक पहुँच थी।
कोफोर्ज का रुख
कोफोर्ज ने सभी आरोपों से इनकार किया है। रिपोर्टों के अनुसार, कंपनी इस मामले में अपना और अपने कर्मचारी का जोरदार बचाव करने का इरादा रखती है और संभावित प्रतिदावों का भी मूल्यांकन कर रही है।
आईटी उद्योग में बढ़ते कानूनी विवाद
गौरतलब है कि हाल के वर्षों में भारतीय आईटी उद्योग में इसी तरह के कानूनी विवाद बढ़े हैं। 2024 में, इंफोसिस ने कॉग्निजेंट के खिलाफ प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण और कार्यकारी भर्ती का आरोप लगाते हुए प्रतिदावा दायर किया था। इससे पहले 2023 में, विप्रो ने पूर्व सीएफओ जतिन दलाल के कॉग्निजेंट में शामिल होने के बाद संविदात्मक प्रतिबद्धताओं के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू की थी।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय आईटी कंपनियाँ वैश्विक बाज़ार में ग्राहकों और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा में हैं। आने वाले महीनों में अदालत का फैसला इस क्षेत्र में नॉन-कम्पीट और गोपनीयता समझौतों की सीमाओं को परिभाषित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।