10 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम में डाले ₹1.41 लाख करोड़, जीएसटी भुगतान से बढ़े तरलता दबाव को किया कम

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम में डाले ₹1.41 लाख करोड़, जीएसटी भुगतान से बढ़े तरलता दबाव को किया कम

सारांश

जीएसटी भुगतान की वजह से बैंकिंग सिस्टम एक दिन में ₹30,685 करोड़ के अधिशेष से ₹19,971 करोड़ के घाटे में आ गया। आरबीआई ने तुरंत ₹1.41 लाख करोड़ की VRR नीलामी कर मनी मार्केट दरों पर दबाव कम किया और वित्तीय प्रणाली में साख प्रवाह सुनिश्चित किया।

मुख्य बातें

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 23 जून 2026 को 7-दिन की VRR नीलामी के ज़रिए बैंकिंग सिस्टम में ₹1.41 लाख करोड़ से अधिक की तरलता डाली।
बैंकिंग सिस्टम की तरलता 21 जून के ₹30,685.11 करोड़ अधिशेष से 22 जून को ₹19,971.89 करोड़ घाटे में बदल गई।
फंड 5.26% की कट-ऑफ दर पर डाले गए; वेटेड एवरेज कॉल मनी रेट 5.43% पर — रेपो रेट से 0.18% अधिक।
जीएसटी भुगतान को तरलता में अचानक गिरावट का प्रमुख कारण बताया गया है।
आरबीआई नियमित रूप से VRR नीलामी, सरकारी प्रतिभूति खरीद और प्रत्यक्ष उधारी सुविधाओं के ज़रिए तरलता प्रबंधन करता है।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 23 जून 2026 (मंगलवार) को सात दिन की वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी के माध्यम से बैंकिंग सिस्टम में ₹1.41 लाख करोड़ से अधिक की अस्थायी तरलता प्रवाहित की। यह कदम तब उठाया गया जब सिस्टम में नकदी का संतुलन अधिशेष से घाटे में बदल गया, जिससे अल्पकालिक मनी मार्केट दरों पर दबाव बढ़ने लगा था।

तरलता संकट की पृष्ठभूमि

केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, बैंकिंग सिस्टम की तरलता 21 जून को ₹30,685.11 करोड़ के अधिशेष में थी, जो महज एक दिन बाद 22 जून को ₹19,971.89 करोड़ के घाटे में तब्दील हो गई। यह ऐसे समय में आया जब वस्तु एवं सेवा कर (GST) भुगतान की समयसीमा के कारण बड़ी मात्रा में नकदी बैंकिंग सिस्टम से बाहर चली गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, जीएसटी भुगतान, अग्रिम कर भुगतान और मौसमी ऋण माँग जैसे कारक नियमित रूप से अल्पकालिक तरलता में उतार-चढ़ाव पैदा करते हैं। यह पहली बार नहीं है — आरबीआई इस तरह की स्थितियों में वीआरआर नीलामी का सहारा लेता रहा है।

नीलामी की शर्तें और दरें

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, यह फंड 5.26 प्रतिशत की कट-ऑफ दर और भारित औसत दर (Weighted Average Rate) पर बैंकिंग सिस्टम में डाले गए। इस बीच, वेटेड एवरेज कॉल मनी रेट 5.43 प्रतिशत पर कारोबार कर रहा था — जो आरबीआई की मौजूदा रेपो दर से 0.18 प्रतिशत अधिक है। यह अंतर दर्शाता है कि तरलता की कमी ने रातोंरात उधारी को कितना महंगा कर दिया था।

आरबीआई के तरलता प्रबंधन का तंत्र

केंद्रीय बैंक अल्पकालिक तरलता कमी को दूर करने के लिए मुख्यतः तीन उपकरण अपनाता है। पहला, वीआरआर नीलामी — जिसमें सामान्यतः 3 दिन या 7 दिन की अवधि होती है। दूसरा, बैंक सरकारी प्रतिभूतियाँ गिरवी रखकर आरबीआई से सीधे अल्पकालिक ऋण ले सकते हैं। तीसरा, दीर्घकालिक तरलता के लिए आरबीआई द्वितीयक बाज़ार से सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है, जिससे बैंकिंग सिस्टम में स्थायी नकदी आती है और बैंक अपनी नकद आरक्षित अनुपात (CRR) की ज़रूरतें आसानी से पूरी कर पाते हैं।

वित्तीय स्थिरता पर असर

गौरतलब है कि यदि तरलता की कमी को समय पर नहीं संभाला जाए, तो अल्पकालिक मनी मार्केट दरें आरबीआई की मानक रेपो दर से ऊपर जा सकती हैं, जिससे ऋण की लागत बढ़ती है और अर्थव्यवस्था में साख प्रवाह (Credit Flow) बाधित होता है। इस नीलामी के ज़रिए आरबीआई ने सुनिश्चित किया कि वित्तीय प्रणाली में ऋण का प्रवाह बिना किसी व्यवधान के जारी रहे।

आने वाले हफ्तों में अग्रिम कर भुगतान की अगली किस्त और तिमाही के अंत से जुड़ी मौसमी नकदी माँग के मद्देनज़र, विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई को इसी तरह के और तरलता प्रबंधन कदम उठाने पड़ सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि जीएसटी भुगतान चक्र और अग्रिम कर की समयसीमाएँ हर तिमाही इसी तरह का दबाव क्यों पैदा करती हैं। तरलता प्रबंधन की यह प्रतिक्रियात्मक प्रकृति — संकट आने के बाद हस्तक्षेप — केंद्रीय बैंक की पूर्वानुमानित योजना पर सवाल उठाती है। कॉल मनी रेट का रेपो रेट से ऊपर जाना मौद्रिक नीति संचरण की कमज़ोरी को उजागर करता है। दीर्घकालिक समाधान के लिए आरबीआई को तरलता पूर्वानुमान को और अधिक सटीक बनाना होगा ताकि बाज़ार को हर बार आश्चर्य का सामना न करना पड़े।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरबीआई ने 23 जून को ₹1.41 लाख करोड़ क्यों डाले?
जीएसटी भुगतान की समयसीमा के कारण बैंकिंग सिस्टम से बड़ी मात्रा में नकदी बाहर चली गई, जिससे तरलता एक दिन में अधिशेष से घाटे में बदल गई। इस दबाव को कम करने और अल्पकालिक मनी मार्केट दरों को स्थिर रखने के लिए आरबीआई ने 7-दिन की VRR नीलामी के ज़रिए यह राशि प्रवाहित की।
वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी क्या होती है?
VRR नीलामी आरबीआई का एक मौद्रिक उपकरण है जिसके ज़रिए वह बैंकों को एक निश्चित अवधि (जैसे 3 या 7 दिन) के लिए अल्पकालिक फंड उपलब्ध कराता है। बैंक सरकारी प्रतिभूतियाँ गिरवी रखकर यह फंड लेते हैं, और दर बाज़ार की प्रतिस्पर्धी बोली से तय होती है।
बैंकिंग सिस्टम में तरलता घाटे का आम जनता पर क्या असर होता है?
जब बैंकिंग सिस्टम में तरलता कम होती है, तो अल्पकालिक उधारी महंगी हो जाती है, जिससे बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो इसका असर होम लोन, कार लोन और कारोबारी ऋण की दरों पर भी पड़ सकता है।
कॉल मनी रेट का रेपो रेट से ऊपर जाना क्यों चिंताजनक है?
कॉल मनी रेट का रेपो रेट से ऊपर जाना संकेत देता है कि बाज़ार में अल्पकालिक नकदी की माँग आपूर्ति से अधिक है। 23 जून को यह दर 5.43% पर थी, जो आरबीआई की रेपो दर से 0.18% अधिक है — यह मौद्रिक नीति संचरण में व्यवधान का सूचक है।
आरबीआई दीर्घकालिक तरलता कैसे सुनिश्चित करता है?
दीर्घकालिक तरलता के लिए आरबीआई द्वितीयक बाज़ार से सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है, जिससे बैंकिंग सिस्टम में स्थायी नकदी आती है। इससे बैंक अपनी नकद आरक्षित अनुपात (CRR) की ज़रूरतें पूरी कर पाते हैं और ऋण प्रवाह सुचारू रहता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 4 दिन पहले
  2. 6 दिन पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 2 महीने पहले
  6. 2 महीने पहले
  7. 8 महीने पहले
  8. 1 साल पहले