सिंधु जल संधि: भारत ने 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' का फैसला खारिज किया, MEA बोला — वैधता नहीं मानते
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्रालय (MEA) ने 31 अगस्त को स्पष्ट बयान जारी कर कहा कि भारत तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (COA) के ताज़ा फैसले को पूरी तरह अस्वीकार करता है, क्योंकि वह इस निकाय की कानूनी वैधता को ही मान्यता नहीं देता। सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर यह COA का नवीनतम 'अवार्ड' है, जिसमें अंतरिम उपायों और संधि की स्थिति पर निर्णय सुनाया गया है।
भारत की आधिकारिक स्थिति
MEA के बयान में कहा गया कि यह तथाकथित COA विश्व बैंक की संधि-शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए गठित किया गया था। भारत ने इस संस्था के समक्ष कभी पेश होने से इनकार किया है और पूर्व में सुनाए गए सभी फैसलों को भी उतनी ही दृढ़ता से नकारा है। मंत्रालय ने कहा, 'भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि इस तथाकथित आर्बिट्रल संस्था का गठन ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है।'
संप्रभुता और परियोजनाओं पर असर
MEA ने स्पष्ट किया कि COA को भारत के संप्रभु निर्णयों पर कोई भी आदेश देने का अधिकार नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, इस निकाय के वर्तमान या भविष्य के किसी भी फैसले का भारत में चल रही जल-परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही, सिंधु जल संधि को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित रखने का भारत का निर्णय पूर्ववत लागू रहेगा।
पहलगाम हमले के बाद बदला संदर्भ
अप्रैल 2025 में पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया था। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से ही अत्यंत तनावपूर्ण हैं। गौरतलब है कि भारत ने तभी स्पष्ट कर दिया था कि 'खून और पानी साथ नहीं बह सकते।'
विवाद की पृष्ठभूमि
सिंधु जल संधि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी, जो छह नदियों के जल-बँटवारे को नियंत्रित करती है। पाकिस्तान ने भारत की कुछ जल-परियोजनाओं को लेकर COA में मामला दायर किया था, जिसे भारत ने शुरू से ही अवैध प्रक्रिया करार दिया। यह COA का नवीनतम फैसला उसी विवाद की कड़ी है, जिसे भारत ने एक बार फिर दृढ़ता से नकार दिया है।
आगे क्या
भारत के इस कठोर रुख से स्पष्ट है कि निकट भविष्य में COA की प्रक्रिया में भारत की भागीदारी की कोई संभावना नहीं है। सिंधु जल संधि का निलंबन तब तक जारी रहने की संभावना है, जब तक भारत-पाकिस्तान संबंधों में ठोस सुधार नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अब द्विपक्षीय कूटनीतिक दायरे से बाहर निकलकर जटिल अंतरराष्ट्रीय कानूनी क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है।