भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹3.56 बिलियन यूरो पर, आर्मेनिया के साथ MoU पर हस्ताक्षर
सारांश
मुख्य बातें
भारत का हथियार निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक के सर्वोच्च स्तर 3.56 बिलियन यूरो पर पहुँच गया है — वर्ष 2024-25 के 2.39 बिलियन यूरो के मुकाबले यह 63 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि है। इसी अवधि में भारत और आर्मेनिया ने अपनी रक्षा साझेदारी को नई ऊँचाई पर ले जाते हुए रक्षा अनुसंधान, विकास, नवाचार और संयुक्त उत्पादन में सहयोग पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
रिकॉर्ड निर्यात: प्रमुख आँकड़े और बाज़ार
केंद्र सरकार के अनुसार, 145 भारतीय निर्यातक अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण आपूर्ति कर रहे हैं। प्रमुख बाज़ारों में अमेरिका, फ्रांस, मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स और आर्मेनिया शामिल हैं। ऑस्ट्रिया स्थित सैन्य पत्रिका 'मिलिटार एक्चुएल' ने स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत ने कम से कम 23 देशों को प्रमुख पारंपरिक हथियारों की आपूर्ति की है।
ब्रह्मोस मिसाइल: निर्यात अभियान का अग्रणी उत्पाद
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत के रक्षा निर्यात अभियान का सबसे ज़्यादा बिकने वाला उत्पाद बनकर उभरी है। 2025 में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन मिसाइलों की कथित तौर पर 'शानदार सफलता' ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इनकी माँग को और बढ़ा दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रह्मोस मिसाइल की कई बैटरियाँ फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया को डिलीवर की जा चुकी हैं और अकेले इन तीन ऑर्डर का मूल्य एक बिलियन यूरो से अधिक आँका गया है। यह ऐसे समय में आया है जब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रक्षा खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
अन्य प्रमुख निर्यात उत्पाद
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के अन्य महत्वपूर्ण रक्षा निर्यातों में आर्टिलरी सिस्टम और मोर्टार, रडार, फास्ट पेट्रोल बोट और गार्ड शिप, ध्रुव लाइट मल्टीपर्पज हेलीकॉप्टर, मोरक्को के लिए बख्तरबंद गाड़ियाँ, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और बॉडी आर्मर शामिल हैं। गौरतलब है कि फ्रांस को पिनाका मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर बेचने का प्रयास यह दर्शाता है कि भारत अब अत्यधिक प्रतिस्पर्धी पश्चिमी बाज़ारों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य रखता है।
भारत-आर्मेनिया रक्षा साझेदारी की पृष्ठभूमि
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की 16 और 17 अगस्त को येरेवान की दो दिवसीय यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा सहयोग MoU पर हस्ताक्षर किए। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग की शुरुआत मार्च 2020 में 35 मिलियन यूरो के चार स्वाति आर्टिलरी टोही रडार अनुबंध के साथ हुई थी — इस तरह आर्मेनिया इस भारतीय प्रणाली का पहला विदेशी ग्राहक बना, जिसमें भारत ने रूसी और पोलिश आपूर्तिकर्ताओं को पछाड़ दिया।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि इस साझेदारी के विस्तार का असली उत्प्रेरक 2020 में 44 दिनों तक चला नागोर्नो-कराबाख युद्ध और उसके बाद रूस से आर्मेनिया का अलगाव रहा। पिछले हफ्ते, मेजर जनरल अलेक्जेंडर त्साकान्यन के नेतृत्व में आर्मेनियाई सशस्त्र बलों के पाँच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिमी वायु कमान के तहत भारतीय वायु सेना के एक स्टेशन का दौरा किया और परिचालन व रखरखाव सुविधाओं का जायज़ा लिया।
आगे की राह
भारत के रक्षा निर्यात की यह तेज़ रफ़्तार 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' की नीतियों की परिणति के रूप में देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस की वैश्विक माँग, नई भागीदारियाँ और पश्चिमी बाज़ारों में प्रवेश की कोशिशें आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख भूमिका दिला सकती हैं।