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ब्रह्मोस मिसाइल में मलेशिया की दिलचस्पी: PM मोदी से मुलाकात के बाद रणनीतिक बदलाव, चीन की बढ़ेगी चिंता

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ब्रह्मोस मिसाइल में मलेशिया की दिलचस्पी: PM मोदी से मुलाकात के बाद रणनीतिक बदलाव, चीन की बढ़ेगी चिंता

सारांश

PM मोदी से मुलाकात के बाद मलेशिया का ब्रह्मोस मिसाइल में रुचि जताना महज रक्षा खरीद नहीं — यह दक्षिण-पूर्व एशिया में रणनीतिक पुनर्संरेखण का संकेत है। दक्षिण चीन सागर पर दावों के बीच यह कदम चीन की चिंता बढ़ा सकता है और भारत के रक्षा निर्यात को नई ऊँचाई दे सकता है।

मुख्य बातें

मलेशियाई PM अनवर इब्राहिम ने नई दिल्ली में PM नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद ब्रह्मोस एयर-टू-सर्फेस मिसाइल प्रणाली में रुचि जताई।
मलेशिया 12-13 सितंबर को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में साझेदार देश के रूप में शामिल हुआ था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम दक्षिण चीन सागर में मलेशिया की प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित कर सकता है और चीन की चिंता बढ़ा सकता है।
2025 में भारत-मलेशिया द्विपक्षीय व्यापार 79.3 अरब रिंगिट रहा, जो अमेरिका-चीन के साथ मलेशिया के 900 अरब रिंगिट से अधिक व्यापार से काफी कम है।
दोनों देशों ने 2024 में व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद भारत-रूस संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस एयर-टू-सर्फेस मिसाइल प्रणाली में रुचि जताई है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम मलेशिया की रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका और अमेरिका-समर्थक देशों पर उसकी निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि दक्षिण चीन सागर पर अपने दावों को लेकर चीन इस घटनाक्रम को सतर्क नज़रों से देखेगा।

मुलाकात की पृष्ठभूमि

मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम 12-13 सितंबर को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नई दिल्ली आए थे, जिसमें मलेशिया ने एक साझेदार देश के रूप में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने अपना भारत दौरा जारी रखते हुए दोनों देशों के बीच निवेश और पूंजी प्रवाह बढ़ाने की वकालत की। यह ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों ने 2024 में एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

रणनीतिक स्वायत्तता का उद्देश्य

रणनीतिक परामर्श कंपनी एशिया ग्रुप एडवाइजर्स में मलेशिया के एसोसिएट डायरेक्टर कमलेश कुमार के अनुसार, भारत के साथ करीबी सहयोग मलेशिया को बिना किसी एक खेमे में स्पष्ट रूप से शामिल हुए एक महत्वपूर्ण आर्थिक और सुरक्षा साझेदार प्रदान करता है। उनका कहना है कि रक्षा साझेदारियों में विविधता लाने का मूल उद्देश्य रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है।

कमलेश कुमार ने आगाह किया कि यह कदम चीन की चिंता बढ़ा सकता है। उनके अनुसार, ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता और बहुउद्देश्यीय उपयोगिता को देखते हुए दक्षिण चीन सागर में मलेशिया की प्रतिरोधक क्षमता (डिटरेंस) को लेकर धारणा प्रभावित हो सकती है — वह क्षेत्र जहाँ चीन और मलेशिया दोनों अपने-अपने दावे करते हैं।

चीन की संभावित प्रतिक्रिया

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मलेशिया ब्रह्मोस प्रणाली का अधिग्रहण करता है, तो उसे स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है, न कि किसी विशेष देश को निशाना बनाना। गौरतलब है कि दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख के बीच मलेशिया के लिए यह कूटनीतिक संतुलन साधना आसान नहीं होगा।

आर्थिक संबंधों की स्थिति

सनवे यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर याह किम लेंग के अनुसार, भारत और मलेशिया के बीच आर्थिक संबंध अभी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँचे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2025 में मलेशिया और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 79.3 अरब रिंगिट का रहा — जो अमेरिका और चीन के साथ मलेशिया के 900 अरब रिंगिट से अधिक के संयुक्त व्यापार की तुलना में काफी कम है।

कुआलालंपुर स्थित रणनीतिक सलाहकार फर्म डेंसुई के साझेदार एरिक लो का कहना है कि भारत के साथ संबंध मजबूत करने का अर्थ चीन या अमेरिका से दूरी बनाना नहीं है, बल्कि यह मलेशिया के आर्थिक और रणनीतिक विकल्पों का विस्तार है। उनके अनुसार, दीर्घकालिक दृष्टि से यह कदम मलेशिया की स्थिति को और मजबूत कर सकता है।

आगे क्या

भारत-मलेशिया रक्षा सहयोग की यह नई दिशा इंडो-पैसिफिक में भारत के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव का संकेत है। यदि ब्रह्मोस सौदा आगे बढ़ता है, तो यह फिलीपींस के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया में दूसरी बड़ी ब्रह्मोस तैनाती होगी — और भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह रुचि ठोस सौदे में बदलेगी। फिलीपींस के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया में यह दूसरा संभावित ब्रह्मोस ग्राहक होगा — और यह संयोग नहीं कि दोनों देशों का दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ विवाद है। मलेशिया की 'हेजिंग' रणनीति — न पूरी तरह अमेरिकी खेमे में, न चीन की गोद में — भारत को एक अनूठा अवसर देती है। पर 79.3 अरब रिंगिट बनाम 900 अरब रिंगिट का व्यापार अंतर दर्शाता है कि रणनीतिक घोषणाएँ आर्थिक गहराई के बिना टिकाऊ नहीं होतीं।
RashtraPress
20 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली क्या है और मलेशिया इसे क्यों खरीदना चाहता है?
ब्रह्मोस भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल प्रणाली है, जिसका एयर-टू-सर्फेस संस्करण अत्यधिक मारक क्षमता और बहुउद्देश्यीय उपयोगिता के लिए जाना जाता है। दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते दबाव के बीच मलेशिया इसे अपनी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के लिए उपयोगी मानता है।
मलेशियाई PM अनवर इब्राहिम की भारत यात्रा किस संदर्भ में हुई?
अनवर इब्राहिम 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में साझेदार देश के रूप में शामिल हुए थे। इसके बाद उन्होंने PM नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय बैठक की, जिसमें रक्षा सहयोग और आर्थिक संबंधों पर चर्चा हुई।
इस कदम से चीन की चिंता क्यों बढ़ सकती है?
दक्षिण चीन सागर पर चीन और मलेशिया दोनों अपने-अपने दावे करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली की तैनाती इस क्षेत्र में मलेशिया की प्रतिरोधक क्षमता की धारणा को प्रभावित कर सकती है, जो चीन के लिए कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति होगी।
भारत और मलेशिया के बीच आर्थिक संबंध कैसे हैं?
वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 79.3 अरब रिंगिट रहा, जो मलेशिया के अमेरिका और चीन के साथ 900 अरब रिंगिट से अधिक के व्यापार की तुलना में काफी कम है। 2024 में हुए व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते के बावजूद आर्थिक संबंध अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँचे हैं।
क्या मलेशिया में ब्रह्मोस की तैनाती दक्षिण-पूर्व एशिया में पहली होगी?
नहीं। फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीद चुका है। यदि मलेशिया यह सौदा करता है, तो वह दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रह्मोस का दूसरा संचालक देश बनेगा, जो भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
राष्ट्र प्रेस
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