ट्रंप-नेतन्याहू फोन वार्ता: मिडिल ईस्ट के कई मोर्चों पर अमेरिका-इजरायल तालमेल पर सहमति
सारांश
मुख्य बातें
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 10 जुलाई 2026 को फोन पर अहम बातचीत हुई। नेतन्याहू के कार्यालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, दोनों नेताओं ने अपने देशों के बीच अलग-अलग मोर्चों पर रणनीतिक तालमेल बनाए रखने पर सहमति जताई।
वार्ता में क्या हुआ
नेतन्याहू के कार्यालय ने बताया कि इस बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की हालिया गतिविधियों की जानकारी नेतन्याहू को दी। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और उनके सहयोगियों द्वारा इजरायल के बारे में की गई टिप्पणियों की गंभीरता का मुद्दा भी उठाया। हालाँकि, बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि नेतन्याहू किन विशेष टिप्पणियों का उल्लेख कर रहे थे।
एर्दोगन विवाद की पृष्ठभूमि
इजरायली अधिकारियों ने हाल ही में एर्दोगन की कड़ी आलोचना की है। एर्दोगन ने इजरायल पर अमेरिका-ईरान कूटनीति को कमज़ोर करने का आरोप लगाया था और इजरायली सरकार को 'युद्ध की आदी' बताया था। इसके अलावा, इजरायल ने तुर्की को एफ-35 लड़ाकू विमान बेचे जाने की संभावना पर भी गहरी चिंता जताई है।
अमेरिका-ईरान तनाव की पृष्ठभूमि
यह फोन वार्ता ऐसे नाज़ुक समय में हुई जब मंगलवार रात से गुरुवार तक अमेरिका और ईरान के बीच नए सिरे से सैन्य टकराव की खबरें सामने आईं। रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान के हालिया हमलों के जवाब में अमेरिका ने ईरान के भीतर कई ठिकानों पर हमले किए, जिससे जान-माल का नुकसान हुआ और बुनियादी ढाँचे को क्षति पहुँची।
इजरायली सेना की तैयारी
इजरायल के सैन्य प्रमुख एयाल जमीर ने कहा कि ईरान और लेबनान में हो रही गतिविधियों पर इजरायल बारीकी से नज़र रख रहा है और तुरंत कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने भी स्पष्ट किया कि सेना सतर्क है और ज़रूरत पड़ने पर अभियान फिर से शुरू किया जा सकता है।
लेबनान पर इजरायल का कड़ा रुख
रक्षा मंत्री काट्ज ने दो टूक कहा कि इजरायली सेना तब तक लेबनान में बनी रहेगी जब तक हिज्बुल्लाह के हथियार पूरी तरह जब्त नहीं कर लिए जाते। काट्ज के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, 'हमने लेबनान में घुसने के लिए किसी पक्ष से अनुमति नहीं माँगी थी और लेबनान में बने रहने के लिए भी हमें किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं है।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में कूटनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।