नेतन्याहू की कसम: ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दूंगा, ट्रंप से पूरी सहमति
सारांश
मुख्य बातें
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 12 जून 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक वह इजरायल के प्रधानमंत्री पद पर हैं, ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राय पूरी तरह एकसमान है।
नेतन्याहू का एक्स पर बयान
नेतन्याहू ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'जब तक मैं इजरायल का प्रधानमंत्री हूं, ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होंगे। इस मुद्दे पर मेरे और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच पूरी सहमति है। 30 से ज़्यादा सालों से, मैं ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान में सबसे आगे रहा हूं।' उन्होंने आगे जोड़ा कि यदि यह अभियान न होता, तो ईरान के पास इजरायल को खत्म करने के लिए बहुत पहले ही परमाणु बम होते।
नेतन्याहू ने कहा, 'ईरान यहूदी देश को खत्म करने की कोशिश कर रहा है और मैं उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए अपनी जिंदगी लगा रहा हूं। जब तक मैं इजरायल का प्रधानमंत्री हूं, ऐसा नहीं होगा।'
ट्रंप की घोषणा: ऐतिहासिक समझौते की दहलीज़ पर
नेतन्याहू का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के एक दिन बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान ने एक फ्रेमवर्क समझौते को मंजूरी दी है जो तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से हमेशा के लिए रोक देगा। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने कहा कि बातचीत अंतिम चरण में है और दस्तावेज़ तैयार किए जा रहे हैं।
ट्रंप ने कहा, 'हमने अभी-अभी ईरान के साथ एक बड़ा समझौता किया है, और हम दस्तावेज़ों को अंतिम रूप देने वाले हैं, जो अगले कुछ दिनों में हो जाना चाहिए। हमारे बीच एक समझौता हुआ है कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं होगा।' उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समझौते पर हस्ताक्षर संभवतः यूरोप में हफ्ते के अंत तक हो सकते हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर की सहमति पर ट्रंप का जवाब
जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या ईरान के सुप्रीम लीडर ने इस व्यवस्था को मंजूरी दी है, तो ट्रंप ने कहा, 'मैं समझता हूं कि जवाब हां है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित समझौता ईरान को किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार खरीदने, विकसित करने या हासिल करने से रोकेगा।
ट्रंप ने बताया कि यह एक विस्तृत एमओयू (MOU) है, जिस पर कई अन्य देशों ने भी सहमति जताई है। इस कामयाबी के बाद उन्होंने इजरायल, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत के नेताओं से बातचीत की। रिपोर्टों के अनुसार, हाल के सैन्य दबाव ने तेहरान को यह समझौता स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया।
क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब मध्य-पूर्व में तनाव अपने चरम पर है और वैश्विक कूटनीतिक बिरादरी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरी चिंता में है। गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के कई अंतरराष्ट्रीय प्रयास — जिनमें 2015 का JCPOA समझौता भी शामिल है — आंशिक रूप से ही सफल रहे हैं। यदि यह नया समझौता औपचारिक रूप ले लेता है, तो यह मध्य-पूर्व की भू-राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
आने वाले दिनों में समझौते के दस्तावेज़ीकरण और हस्ताक्षर की प्रक्रिया पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।