स्पेन में 24 घंटे में 60,000 प्रवासी: ऐलन कुर्दी से यूक्रेन तक, 21वीं सदी के प्रवासी संकट की पूरी कहानी
सारांश
मुख्य बातें
स्पेन के स्वायत्त क्षेत्र स्यूटा में मात्र 24 घंटों के भीतर 60,000 से अधिक प्रवासियों का प्रवेश एक बार फिर यह सवाल सामने ला खड़ा करता है कि क्या दुनिया 21वीं सदी के प्रवासी संकट का कोई स्थायी समाधान खोज पाई है। भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर के रास्ते उत्तरी अफ्रीका से आती छोटी नौकाओं ने सीमा सुरक्षा, शरणार्थी नीति, आवास, रोज़गार और कानून-व्यवस्था को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। यह संकट अचानक नहीं उभरा — इसकी जड़ें 2000 के दशक की शुरुआत में ही दिखने लगी थीं।
जिब्राल्टर स्ट्रेट: अफ्रीका और यूरोप के बीच का खतरनाक रास्ता
जिब्राल्टर स्ट्रेट — मोरक्को और स्पेन के बीच का यह जलडमरूमध्य — लंबे समय से अफ्रीकी प्रवासियों के लिए यूरोप का प्रवेशद्वार बना हुआ है। मोरक्को, अल्जीरिया, माली, सेनेगल और मॉरिटानिया समेत कई अफ्रीकी देशों के हज़ारों लोग बेहतर जीवन, रोज़गार और सुरक्षा की आस में इस खतरनाक मार्ग को चुनते रहे हैं।
2006 में स्थिति तब गंभीर हुई जब हज़ारों अफ्रीकी प्रवासी कैनरी द्वीप समूह तक पहुँच गए। छोटी नौकाओं में समुद्र पार करने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की जानें गईं। इस घटनाक्रम को 'कायुकॉस संकट' के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय परिषद की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसके बाद स्पेन ने सीमा सुरक्षा मज़बूत की, अफ्रीकी देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते किए और समुद्री निगरानी का दायरा बढ़ाया — फिर भी प्रवास का दबाव पूरी तरह थमा नहीं।
ऐलन कुर्दी और 2015 का यूरोपीय शरणार्थी संकट
21वीं सदी का सबसे चर्चित प्रवासी संकट 2015 में सामने आया। 3 साल के ऐलन कुर्दी की समुद्र तट पर औंधे मुँह पड़ी तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया — यह तस्वीर उस मानवीय त्रासदी का प्रतीक बन गई जो लाखों परिवार झेल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के अनुसार, सीरिया में गृहयुद्ध, इराक में हिंसा और अफगानिस्तान में अस्थिरता के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़कर यूरोप की ओर निकल पड़े।
तुर्की से ग्रीस और फिर बाल्कन मार्ग के ज़रिए जर्मनी, स्वीडन और ऑस्ट्रिया तक शरणार्थियों का विशाल प्रवाह पहुँचा। उस दौर में जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया, जबकि कई अन्य यूरोपीय देशों ने सीमाएँ कड़ी कर दीं। इसी संकट ने यूरोप में आव्रजन नीति को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
सीरिया, रोहिंग्या और वेनेजुएला: एक के बाद एक संकट
2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध ने आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक को जन्म दिया। 60 लाख से अधिक सीरियाई नागरिकों ने तुर्की, लेबनान, जॉर्डन और यूरोप में शरण ली। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह संकट आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और लाखों लोग अब भी राहत शिविरों में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
2017 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा के बाद 7 लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार कर बांग्लादेश पहुँचे। कॉक्स बाज़ार दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर बन गया। वर्षों बाद भी अधिकांश रोहिंग्या अपने घर नहीं लौट सके हैं।
दक्षिण अमेरिका में वेनेजुएला की आर्थिक बदहाली ने भी अभूतपूर्व पलायन को जन्म दिया। महँगाई, बेरोज़गारी और खाद्य संकट के कारण 70 लाख से अधिक लोग देश छोड़कर कोलंबिया, ब्राज़ील, पेरू और इक्वाडोर में जा बसे — इसे लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रवासी संकट माना जाता है।
अफगानिस्तान और यूक्रेन: 21वीं सदी के नवीनतम अध्याय
2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद हज़ारों अफगान नागरिकों ने देश छोड़ने की कोशिश की। काबुल हवाई अड्डे की तस्वीरें — जहाँ लोग किसी भी तरह विमान में सवार होकर सुरक्षित देश पहुँचना चाहते थे — पूरी दुनिया ने देखीं। इसके बाद लाखों अफगान पाकिस्तान, ईरान और अन्य देशों में शरण लेने पहुँचे।
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कुछ ही महीनों में लाखों यूक्रेनी नागरिक पड़ोसी देशों में पहुँच गए। पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया और जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को अस्थायी संरक्षण दिया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में सबसे तेज़ गति से हुआ जन-पलायन माना गया।
संकट के कारण और आगे की राह
21वीं सदी के प्रवासी संकट केवल युद्ध तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे एक साथ कई कारण काम कर रहे हैं — गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद और हिंसा, आर्थिक संकट और बेरोज़गारी, और जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे व बाढ़ से उपजी खाद्य असुरक्षा। गौरतलब है कि हर नए संकट के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया तात्कालिक रही है, दीर्घकालिक नहीं। स्पेन में ताज़ा घटनाक्रम यह याद दिलाता है कि बिना समन्वित वैश्विक नीति के, यह संकट बार-बार नए रूप में सामने आता रहेगा।