ट्रंप की पाकिस्तान समेत 8 देशों को अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर की मांग, ईरान को भी जोड़ने का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किए, मिस्र और जॉर्डन सहित आठ देशों से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने की सार्वजनिक मांग की है। ट्रंप ने यह मांग अपने ट्रूथ सोशल पोस्ट में उठाई, जिसमें उन्होंने शनिवार को इन देशों के शीर्ष नेताओं के साथ हुई बातचीत का हवाला दिया। उनका कहना है कि मध्य पूर्व की इस 'बेहद मुश्किल पहेली' को सुलझाने में अमेरिका की भूमिका के बदले में इन देशों का समझौते पर दस्तखत करना 'जरूरी' होना चाहिए।
ट्रंप ने किन नेताओं से की बात
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में शनिवार को हुई बातचीत में शामिल नेताओं के नाम गिनाए — सऊदी अरब के मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद, यूएई के मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान, कतर के अमीर तमीम बिन हमद बिन खलीफा अल थानी और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम बिन जाबेर अल थानी, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर अहमद शाह, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला II और बहरीन के किंग हमद बिन ईसा अल खलीफा। गौरतलब है कि यूएई और बहरीन पहले से ही अब्राहम समझौते के सदस्य हैं।
ट्रंप की चेतावनी और ईरान का मसला
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में ईरान के साथ चल रही परमाणु वार्ता पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा, 'ईरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है। यह या तो सबके लिए एक अच्छी डील होगी या फिर कोई डील नहीं होगी — वापस पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और मजबूत युद्ध शुरू होगा, लेकिन कोई ऐसा नहीं चाहता।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि अन्य देश अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर कर लें, तो ईरान को भी इसमें शामिल करना 'कुछ खास' होगा।
अब्राहम समझौता क्या है और इसकी पृष्ठभूमि
अब्राहम समझौते की शुरुआत 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुई थी। इसके तहत इजरायल और अरब देशों के बीच पहली बार आधिकारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। समझौते का नाम यहूदी, ईसाई और इस्लाम — तीनों धर्मों के साझा पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया है। यूएई के बाद मोरक्को, बहरीन और सूडान भी इसमें शामिल हुए। इन देशों ने इजरायल में अपने दूतावास खोलने, व्यापार और पर्यटन शुरू करने पर सहमति जताई। हालांकि गाजा में इजरायल के सैन्य अभियान के बाद से इस समझौते की प्रगति लगभग थम गई थी।
पाकिस्तान के लिए यह क्यों जटिल है
पाकिस्तान उन देशों में है जो इजरायल को लेकर ऐतिहासिक रूप से नकारात्मक रुख रखते हैं। गाजापट्टी में इजरायली कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने यहूदी राष्ट्र का पुरजोर विरोध किया है। दूसरी ओर, इजरायली अधिकारियों की ओर से भी कथित तौर पर ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें कहा गया कि इजरायल केवल उन्हीं देशों पर भरोसा करता है जिनके साथ उसके कूटनीतिक संबंध हैं, और पाकिस्तान उस श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए तैयार होगा।
ट्रंप का दावा: समझौते से हुए ठोस फायदे
ट्रंप ने तर्क दिया कि अब्राहम समझौते में पहले से शामिल देशों — यूएई, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान — को यह समझौता आर्थिक, वित्तीय और सामाजिक तौर पर 'बेहद फायदेमंद' साबित हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मौजूदा संघर्ष और युद्ध जैसे हालात के बावजूद किसी भी सदस्य देश ने इससे बाहर निकलने का सुझाव नहीं दिया। समर्थकों का दावा है कि यह पहल मध्य पूर्व में 'वास्तविक ताकत, स्थिरता और शांति' लाने की क्षमता रखती है। ट्रंप ने यह भी कहा कि जो देश हस्ताक्षर नहीं करेंगे, उन्हें इस 'डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह गलत इरादा दिखाता है।' आने वाले समय में इस समझौते के विस्तार की आधिकारिक घोषणा अपेक्षित बताई जा रही है।