यूएन महासचिव पद: 7 उम्मीदवार, कोई स्पष्ट बढ़त नहीं — अमेरिका-चीन की सहमति से तय होगा अगला नाम
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव के चयन की दौड़ निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पाँच वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा, और नए महासचिव का कार्यभार 1 जनवरी 2027 से शुरू होना है। तीन दौर के गुप्त स्ट्रॉ पोल के बाद भी मौजूदा सात उम्मीदवारों में से कोई भी स्पष्ट बढ़त हासिल नहीं कर सका है, जिससे यह संभावना बलवती हो गई है कि अंतिम फैसला अमेरिका और चीन समेत सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के बीच संभावित समझौते पर निर्भर करेगा।
चुनाव प्रक्रिया: कैसे तय होता है महासचिव
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 15 सदस्य हैं, जिनमें पाँच स्थायी सदस्य — अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन — शामिल हैं। किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 9 सदस्यों का समर्थन जरूरी है और किसी भी स्थायी सदस्य को वीटो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा उस नाम को औपचारिक रूप से नियुक्त करती है।
'स्ट्रॉ पोल' वास्तव में औपचारिक चुनाव नहीं होते — ये गोपनीय मतदान होते हैं जिनमें सदस्य किसी उम्मीदवार के सामने 'एंकरेज' (प्रोत्साहित), 'डिस्करेज' (हतोत्साहित) या कोई विकल्प नहीं — में से एक चुनते हैं। चूँकि ये मतदान गोपनीय होते हैं, इसलिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़े पूरी तस्वीर नहीं दर्शाते।
मुख्य उम्मीदवार और दौड़ की स्थिति
इस बार की दौड़ में लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के कई उम्मीदवार शामिल हैं। इनमें प्रमुख हैं — कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति और यूएनसीटीएडी की महासचिव रेबेका ग्रिन्सपैन, गुयाना की राजनयिक कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट, अर्जेंटीना के आईएईए प्रमुख राफेल ग्रॉसी, इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्व अध्यक्ष मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा, इक्वाडोर की पूर्व राजदूत इवोन ए-बाकी, और सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति मैकी साल।
चिली की पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेट भी इस दौड़ में थीं, लेकिन 20 सितंबर 2026 को उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। यह निर्णय स्ट्रॉ पोल में उनके समर्थन में आई गिरावट के बाद आया। शुरुआती दौर में ग्रिन्सपैन को समर्थन मिलने की खबरें थीं, लेकिन बाद के दौरों में तस्वीर जटिल हो गई। द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल करीब तीन उम्मीदवारों को ही आवश्यक समर्थन हासिल करने की वास्तविक दौड़ में माना जा रहा है। अंतिम समय में कुछ नए नाम भी संभावित विकल्प के रूप में चर्चा में आ रहे हैं।
अमेरिका-चीन की भूमिका क्यों निर्णायक है
दोनों महाशक्तियाँ — अमेरिका और चीन — सुरक्षा परिषद में वीटो अधिकार रखती हैं, जिससे उनकी सहमति या असहमति किसी भी उम्मीदवार का भविष्य तय कर सकती है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने जून 2026 में ग्रिन्सपैन और एस्पिनोसा से अलग-अलग मुलाकात की थी। चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों उम्मीदवारों ने बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मज़बूत करने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।
दूसरी ओर, अमेरिका ऐतिहासिक रूप से संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है, लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के तहत फंडिंग में बड़ी कटौती की गई है। अमेरिका 'यूएन80' पहल के तहत संगठन की एजेंसियों के एकीकरण, मुख्यालय खर्चों में कमी और संसाधनों को जमीनी कार्यक्रमों की ओर मोड़ने पर जोर दे रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र गंभीर वित्तीय दबाव में है।
नए महासचिव के सामने वैश्विक चुनौतियाँ
संयुक्त राष्ट्र इस समय एक साथ कई संकटों से जूझ रहा है — रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सुरक्षा परिषद में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा। गौरतलब है कि जब स्थायी सदस्य ही आपस में असहमत हों, तो महासचिव की भूमिका और भी नाजुक हो जाती है।
नए महासचिव को न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ निभानी होंगी, बल्कि अमेरिका की सुधार-संबंधी प्राथमिकताओं और चीन समेत अन्य बड़ी शक्तियों की अपेक्षाओं के बीच नाजुक संतुलन भी बनाना होगा। यह देखना होगा कि 31 दिसंबर 2026 की समयसीमा से पहले सुरक्षा परिषद किसी एक नाम पर सहमति बना पाती है या नहीं।