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मानसून सत्र 2026: अभिषेक बनर्जी को पूर्व सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय के पीछे मिली सीट, टीएमसी सिकुड़कर 8 पर

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मानसून सत्र 2026: अभिषेक बनर्जी को पूर्व सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय के पीछे मिली सीट, टीएमसी सिकुड़कर 8 पर

सारांश

मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा की बैठक व्यवस्था ने टीएमसी की सिकुड़ती ताकत का आईना दिखा दिया। 20 सांसदों के एनसीपीआई में विलय के बाद अभिषेक बनर्जी अपने पूर्व सहयोगी के पीछे बैठे — यह महज़ सीट का बदलाव नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े भूकंप की संसदीय तस्वीर है।

मुख्य बातें

20 जुलाई 2026 को मानसून सत्र के पहले दिन अभिषेक बनर्जी को पूर्व सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय के पीछे सीट आवंटित हुई।
टीएमसी के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय किया; टीएमसी अब केवल 8 सांसदों पर सिमट गई।
लोकसभा अध्यक्ष ने संविधान की दसवीं अनुसूची के आधार पर एनसीपीआई को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता दी।
दो-तिहाई से अधिक सांसदों के विलय के कारण दलबदल कानून के तहत तत्काल अयोग्यता लागू नहीं होती।
टीएमसी ने 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की याचिका लोकसभा अध्यक्ष के पास दाखिल की है।
एनसीपीआई एनडीए की सहयोगी बनी, जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन की संख्या और मज़बूत हुई।

लोकसभा के मानसून सत्र 2026 के पहले दिन 20 जुलाई को सदन में बैठने की व्यवस्था ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की बदली हुई राजनीतिक हैसियत को साफ़ उजागर कर दिया। टीएमसी के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी को सदन के नियमों के अनुसार उनके पूर्व सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय की सीट के पीछे बैठाया गया, जो अब नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के संसदीय नेता हैं। यह बदलाव टीएमसी में हुए बड़े विभाजन का सीधा नतीजा है, जिसमें 20 सांसद पार्टी छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं।

कैसे बदले लोकसभा के समीकरण

तृणमूल कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीती थीं। लेकिन इस साल विधानसभा चुनाव में झटके के बाद पार्टी में अंदरूनी मतभेद गहरे हो गए। एक सांसद के निधन से एक सीट पहले ही रिक्त हो चुकी थी। इसके बाद सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तिदार समेत 20 सांसदों ने अलग संसदीय समूह बना लिया और चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त एनसीपीआई में विलय कर लिया — एक ऐसी पार्टी जिसने इससे पहले कभी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। इस विलय के बाद एनसीपीआई अचानक लोकसभा के प्रमुख संसदीय समूहों में शामिल हो गई और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की महत्वपूर्ण सहयोगी बन गई।

दलबदल कानून और संवैधानिक प्रावधान

संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत बने दलबदल विरोधी कानून के अनुसार, यदि किसी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। टीएमसी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक ने एनसीपीआई में विलय का फ़ैसला किया, इसलिए उन्हें तत्काल अयोग्यता से संरक्षण मिला। लोकसभा अध्यक्ष ने इसी आधार पर नए समूह को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता देते हुए उन्हें अलग बैठने की अनुमति दी।

टीएमसी की याचिका और विपक्ष की आपत्ति

अभिषेक बनर्जी समेत टीएमसी नेतृत्व ने इन 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष के पास याचिका दायर की है। विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक और नैतिक वैधता पर सवाल उठा रहा है। हालाँकि संसदीय प्रक्रिया और संविधान के प्रावधानों के अनुसार अब तक उठाए गए कदम नियमों के दायरे में माने जा रहे हैं। संसदीय दलों को मान्यता देना और सदन में बैठने की व्यवस्था तय करना लोकसभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार है।

एनडीए की मज़बूत होती स्थिति

यह ऐसे समय में आया है जब एनडीए लोकसभा में अपनी संख्या और मज़बूत करने में लगा है। एनसीपीआई के 20 सांसदों के एनडीए के पाले में आने से सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति पहले से अधिक सुदृढ़ हो गई है, जबकि टीएमसी सिकुड़कर केवल 8 सांसदों पर आ गई है। गौरतलब है कि 2009 से 2014 के बीच जब टीएमसी की संसदीय ताकत बढ़ रही थी, उसी दौर में माकपा (सीपीआई-एम) का प्रभाव घट रहा था — आज इतिहास एक नए रूप में दोहराता दिख रहा है।

आगे क्या होगा

टीएमसी की अयोग्यता याचिका पर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अभी बाकी है। कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि दसवीं अनुसूची के तहत दो-तिहाई विलय की शर्त पूरी होने के बाद अयोग्यता की संभावना सीमित है। मानसून सत्र में यह मुद्दा सदन के भीतर और बाहर गरमाया रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

दलबदल कानून की उस खामी को उजागर करता है जिसे संसद ने दशकों से दूर नहीं किया। असली सवाल यह है कि क्या यह 'विलय' वास्तव में वैचारिक पुनर्मिलन था या एनडीए के संख्याबल को मज़बूत करने की सुनियोजित रणनीति — और इस प्रश्न का उत्तर लोकसभा अध्यक्ष की अयोग्यता याचिका पर सुनवाई से अधिक, मतदाता देंगे।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अभिषेक बनर्जी को मानसून सत्र में पूर्व सहयोगी के पीछे सीट क्यों मिली?
लोकसभा में सीट आवंटन संसदीय दल के आकार के आधार पर होता है। टीएमसी के 20 सांसदों के एनसीपीआई में विलय के बाद टीएमसी केवल 8 सांसदों पर सिमट गई, जबकि एनसीपीआई के पास 20 सांसद हैं। इसलिए सदन के नियमों के अनुसार अभिषेक बनर्जी को सुदीप बंद्योपाध्याय की सीट के पीछे बैठाया गया।
नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) क्या है और इसे लोकसभा में मान्यता कैसे मिली?
एनसीपीआई चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त एक पार्टी है जिसने इससे पहले कभी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। टीएमसी के 20 सांसदों के इसमें विलय के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने संविधान की दसवीं अनुसूची और संसदीय परंपराओं के आधार पर इसे अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता दी।
क्या टीएमसी से गए 20 सांसद दलबदल कानून के तहत अयोग्य हो सकते हैं?
संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार यदि किसी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाता। टीएमसी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक ने विलय किया, इसलिए तत्काल अयोग्यता लागू नहीं होती। हालाँकि टीएमसी ने अयोग्यता याचिका दाखिल की है, जिस पर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अभी बाकी है।
टीएमसी में यह विभाजन क्यों हुआ?
2024 के लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीतने के बाद विधानसभा चुनाव में झटके और पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों के चलते टीएमसी में दरार आई। एक सांसद के निधन के बाद 20 सांसदों ने अलग संसदीय समूह बनाकर एनसीपीआई में विलय का फ़ैसला किया।
इस विभाजन से एनडीए को क्या फायदा हुआ?
एनसीपीआई के 20 सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी बन गए हैं। इससे लोकसभा में एनडीए की संख्या और मज़बूत हो गई है, जबकि विपक्षी खेमे में टीएमसी का प्रभाव उल्लेखनीय रूप से कम हो गया है।
राष्ट्र प्रेस
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