अधिकमास द्वादशी पर महाकालेश्वर में भस्म आरती, देश-विदेश से उमड़े श्रद्धालु
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 28 मई 2025 को ज्येष्ठ अधिकमास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर बाबा महाकाल की अलौकिक भस्म आरती का आयोजन हुआ, जिसमें देश-विदेश से आए हज़ारों श्रद्धालु सम्मिलित हुए। भोर से ही मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'जय महाकाल' के जयकारों से गुंजायमान रहा।
रातभर कतारों में खड़े रहे भक्त
बाबा महाकाल के दर्शन की ललक में श्रद्धालुओं ने बुधवार देर रात से ही कतारों में लगना शुरू कर दिया था। रातभर प्रतीक्षा करने के बाद भी भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं देखी गई — हर कोई अपने आराध्य की एक झलक पाने को आतुर था। अधिकमास की इस विशेष तिथि पर भीड़ सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक रही।
परंपरानुसार खुले मंदिर के पट
परंपरा के अनुसार भोर में भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंदिर के पट खोले गए। पट खुलते ही उपस्थित भक्तगण उत्साह से भर उठे और जयकारे लगाने लगे। इसके बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, तत्पश्चात ठंडे जल और दूध, दही, घी, शहद तथा शक्कर से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ।
राजा के रूप में सजे बाबा महाकाल
गुरुवार के विशेष शृंगार में बाबा का रूप अत्यंत मनोहारी था। बाबा के मस्तक पर चंद्रमा और त्रिनेत्र सजाए गए। भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से सुसज्जित कर उन्हें राजा के रूप में तैयार किया गया, जिसे देखकर भक्त भावविभोर हो उठे। इसके बाद महानिर्वाणी द्वारा बाबा को भस्म अर्पित की गई।
भस्म आरती का आध्यात्मिक महत्व
भस्म आरती के दौरान शंख, डमरू और घंटियों की गूंज से पूरा वातावरण दिव्य और आध्यात्मिक हो गया। बाबा महाकाल की यह दैनिक भस्म आरती सृष्टि के विनाश और पुनर्जन्म के चक्र — मृत्युलोक — के प्रतीक के रूप में की जाती है, जिसमें भस्म अर्पित कर जीवन की क्षणभंगुरता का संदेश दिया जाता है। आरती में उपयोग होने वाली भस्म गाय के गोबर से बने कंडों को जलाकर तैयार की जाती है। गौरतलब है कि पूर्व में श्मशान की चिता की राख का उपयोग होता था, किंतु अब यह भस्म प्रतीकात्मक रूप से तैयार की जाती है।
आगे का आयोजन
अधिकमास की शेष तिथियों पर भी महाकालेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला जारी रहने की संभावना है। प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।