अंडमान आइडियाज समिट 2026: एलजी डी.के. जोशी का आह्वान — परियोजनाओं से आगे 'अंडमान के विचार' में निवेश करें
सारांश
मुख्य बातें
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल एडमिरल (सेवानिवृत्त) डी.के. जोशी ने 23 जून 2026 को अंडमान आइडियाज समिट 2026 को संबोधित करते हुए उद्योग जगत से सिर्फ परियोजनाओं में नहीं, बल्कि 'अंडमान के विचार' में निवेश करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि उद्योग, नीति-निर्माता और नागरिक समाज को मिलकर इस द्वीपसमूह को भारत की आर्थिक और रणनीतिक मुख्यधारा में उसका उचित स्थान दिलाना होगा।
सम्मेलन का संदर्भ और महत्व
इस शिखर सम्मेलन में पर्यटन, आतिथ्य, बुनियादी ढाँचा, व्यापार, सरकार और नीति-निर्माण से जुड़े प्रमुख प्रतिनिधि एकत्रित हुए। जोशी ने इसे निवेशकों की एक महत्वपूर्ण बैठक बताते हुए कहा कि यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भारत के विकास और रणनीतिक एजेंडे में तेज़ी से अहम भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया, 'हम चाहते हैं कि उद्योग जगत यहाँ निवेश करे, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे अंडमान को राष्ट्रीय विमर्श की मुख्यधारा में उसका उचित स्थान दिलाने के विचार से जुड़ें।'
भूगोल बनाम विकास: उपराज्यपाल की दलील
जोशी ने ज़ोर देकर कहा कि भौगोलिक स्थिति किसी क्षेत्र को प्राकृतिक लाभ अवश्य देती है, किंतु केवल भूगोल के बल पर आर्थिक समृद्धि या रणनीतिक शक्ति अर्जित नहीं की जा सकती। उनके शब्दों में, 'भूगोल आपको एक लाभ देता है, लेकिन यदि उसे विकसित न किया जाए तो वह अपने आप रणनीतिक या आर्थिक ताकत में नहीं बदलता।'
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संभावनाओं को ठोस परिणामों में रूपांतरित करने के लिए बुनियादी ढाँचे, संपर्क व्यवस्था, उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों में सुनियोजित निवेश अनिवार्य है।
द्वीपसमूह का वास्तविक आकार और भू-रणनीतिक महत्व
उपराज्यपाल ने बताया कि अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में कुल 836 द्वीप हैं, जो उत्तर से दक्षिण तक लगभग 750 किलोमीटर की लंबाई में फैले हैं। यह केंद्र शासित प्रदेश भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का लगभग एक-तिहाई और देश की कुल समुद्री तटरेखा का करीब एक-चौथाई हिस्सा समेटे हुए है।
जोशी ने यह भी रेखांकित किया कि यह द्वीपसमूह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है — हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक, जिससे प्रतिवर्ष लगभग एक लाख जहाज़ गुज़रते हैं। उन्होंने कहा, 'यही तथ्य इन द्वीपों की भू-रणनीतिक महत्ता को स्पष्ट करता है।'
तुलनात्मक संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि मालदीव, सेशेल्स और मॉरीशस — तीनों हिंद महासागरीय द्वीपीय देशों — का संयुक्त भू-भाग भी अंडमान एवं निकोबार से काफी छोटा है। इसके बावजूद मुख्यभूमि के अनेक नागरिक इस द्वीपसमूह के वास्तविक आकार और सामरिक महत्व से अनजान हैं।
बुनियादी ढाँचे में बदलाव और प्रमुख परियोजनाएँ
जोशी ने स्वीकार किया कि स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक सीमित बुनियादी ढाँचे और संपर्क सुविधाओं के कारण द्वीपों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। हालाँकि पिछले एक दशक में स्थिति तेज़ी से बदली है।
उन्होंने चेन्नई-अंडमान सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल, हवाई अड्डों के विस्तार, प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, बंदरगाह-आधारित विकास परियोजनाओं और अंतर-द्वीपीय संपर्क सुधार जैसी पहलों का उल्लेख किया। उनके अनुसार ये केवल विकास परियोजनाएँ नहीं हैं, बल्कि भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और इंडो-पैसिफिक रणनीति से द्वीपों को गहराई से जोड़ने का सुचिंतित प्रयास हैं।
निजी क्षेत्र की भागीदारी पर ज़ोर
उपराज्यपाल ने कहा कि अंडमान एवं निकोबार को अब देश की दूरस्थ सीमा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसकी आर्थिक, समुद्री और भू-राजनीतिक भूमिका निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने उद्योग जगत से स्पष्ट शब्दों में कहा, 'अंडमान के विचार में निवेश कीजिए। द्वीपों का भविष्य केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि उद्योगों और निवेशकों की साझेदारी से भी तय होगा।'
गौरतलब है कि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को लगातार मज़बूत कर रहा है, और ऐसे में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की भूमिका आने वाले वर्षों में और अधिक निर्णायक होने की संभावना है।