बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाएं: यूनिसेफ के 5 कारगर तरीके जो हर माता-पिता को जानने चाहिए

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बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाएं: यूनिसेफ के 5 कारगर तरीके जो हर माता-पिता को जानने चाहिए

सारांश

इंटरनेट बच्चों के लिए जितना उपयोगी है, उतना ही जोखिम भरा भी। यूनिसेफ के 5 सुझाव — स्पष्ट नियम, तकनीकी सुरक्षा, साझा ऑनलाइन समय, अच्छा उदाहरण और ऑफलाइन संतुलन — हर माता-पिता के लिए एक व्यावहारिक रोडमैप हैं।

मुख्य बातें

यूनिसेफ ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए 5 व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं।
बच्चों के साथ डिजिटल नियम तय करें — समय, स्थान और साझा की जाने वाली जानकारी के बारे में खुलकर बात करें।
छोटे बच्चों के लिए पेरेंटल कंट्रोल और सेफ सर्च का उपयोग करें; प्राइवेसी सेटिंग्स हमेशा चालू रखें।
बच्चों के साथ ऑनलाइन समय बिताएं ताकि झूठी खबरों और नकारात्मक कंटेंट की पहचान सिखाई जा सके।
माता-पिता स्वयं अच्छी डिजिटल आदतें अपनाकर बच्चों के लिए बेहतर उदाहरण पेश करें।
ऑनलाइन और ऑफलाइन जीवन के बीच संतुलन बनाए रखें; स्कूल की डिजिटल नीति और साइबर हेल्पलाइन की जानकारी रखें।

आज के डिजिटल युग में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा हर माता-पिता की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन चुकी है। स्कूली पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, बच्चे अपने दिन का बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर बिताते हैं — और जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती है, यह समय और भी बढ़ता जाता है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने 5 व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं जो बच्चों को साइबर खतरों से बचाने और उन्हें एक स्वस्थ डिजिटल जीवनशैली अपनाने में मदद कर सकते हैं।

स्पष्ट डिजिटल नियम बनाएं

बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करना सबसे पहला और ज़रूरी कदम है। उनसे पूछें कि वे ऑनलाइन किससे बात करते हैं, क्या साझा करते हैं और उनकी पोस्ट कौन देख सकता है। बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि इंटरनेट पर साझा की गई हर चीज़ — चाहे वह फोटो, वीडियो या कमेंट हो — एक स्थायी 'डिजिटल फुटप्रिंट' छोड़ती है।

बच्चों को यह भी सिखाएं कि भेदभावपूर्ण, अपमानजनक या दूसरों को ठेस पहुँचाने वाली बातें ऑनलाइन कभी न करें। गैजेट्स के उपयोग का समय, स्थान और तरीका — तीनों के लिए घर में स्पष्ट नियम होने चाहिए, और बच्चों को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि किसी भी असहजता या डर की स्थिति में वे तुरंत माता-पिता को बताएं।

तकनीक को सुरक्षा का हथियार बनाएं

यूनिसेफ के अनुसार, बच्चे के फोन या टैबलेट को हमेशा अपडेट रखें और प्राइवेसी सेटिंग्स चालू रखें ताकि अनजान लोग उनकी जानकारी न देख सकें। वेबकैम का उपयोग न होने पर उसे ढककर रखना भी एक सरल लेकिन प्रभावी उपाय है।

छोटे बच्चों के लिए पेरेंटल कंट्रोल और सेफ सर्च फीचर का उपयोग करें। बच्चों को यह भी सिखाएं कि अपना नाम, पता, फोटो या स्कूल की जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ कभी साझा न करें। मुफ्त ऐप्स और ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग करते समय विशेष सावधानी बरतना ज़रूरी है।

बच्चों के साथ ऑनलाइन समय बिताएं

बच्चों के साथ बैठकर गेम खेलना, वीडियो देखना और ऑनलाइन गतिविधियों में हिस्सा लेना माता-पिता को उनकी डिजिटल दुनिया से जोड़ता है। यह न केवल बच्चों पर नज़र रखने का तरीका है, बल्कि उन्हें झूठी खबरों, भ्रामक विज्ञापनों और नकारात्मक कंटेंट की पहचान करना सिखाने का अवसर भी है। उम्र के अनुसार सही ऐप्स और गेम्स चुनने में बच्चों की मदद करें।

खुद बनें बेहतर डिजिटल उदाहरण

बच्चे घर के बड़ों को देखकर सीखते हैं — यह डिजिटल व्यवहार पर भी लागू होता है। माता-पिता को स्वयं अच्छी ऑनलाइन आदतें अपनानी चाहिए। बच्चों की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते समय सावधानी बरतें। बच्चों को विनम्रता, सम्मान और सकारात्मक संवाद के लिए प्रोत्साहित करें।

यदि बच्चा ऑनलाइन किसी बात को छिपाने लगे या परेशान दिखे, तो बिना दबाव के उससे खुलकर बात करें और उसे यह विश्वास दिलाएं कि वह बिना किसी डर के अपनी समस्या साझा कर सकता है।

रचनात्मकता और ऑफलाइन संतुलन ज़रूरी

इंटरनेट बच्चों के लिए सीखने, रचनात्मकता और आत्म-अभिव्यक्ति का एक शक्तिशाली माध्यम है। उन्हें ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर प्रोत्साहित करें जहाँ वे अपनी रुचि के अनुसार नई चीज़ें सीख सकें — जैसे ऑनलाइन एक्सरसाइज वीडियो या सक्रिय गेम्स। हालाँकि, ऑनलाइन और ऑफलाइन जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही ज़रूरी है। पारिवारिक समय और मैदानी खेलकूद को प्राथमिकता देना बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है।

इसके अलावा, माता-पिता को अपने बच्चे के स्कूल की डिजिटल नीतियों और स्थानीय साइबर हेल्पलाइन की जानकारी रखनी चाहिए। साइबरबुलिंग या आपत्तिजनक कंटेंट की शिकायत कहाँ और कैसे करें — यह भी बच्चों को सिखाना ज़रूरी है। डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, और माता-पिता की सक्रिय भागीदारी इसकी सबसे मज़बूत नींव है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती यह है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में माता-पिता की डिजिटल साक्षरता अभी भी सीमित है — जहाँ स्मार्टफोन की पहुँच तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन पेरेंटल कंट्रोल जैसे उपकरणों की जानकारी नहीं। भारत में साइबरबुलिंग और ऑनलाइन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं, फिर भी स्कूल स्तर पर डिजिटल सुरक्षा पाठ्यक्रम अभी भी अधूरा है। जब तक सरकार, स्कूल और अभिभावक मिलकर एक समन्वित ढाँचा नहीं बनाते, तब तक ये सुझाव केवल जागरूकता तक सीमित रहेंगे — व्यापक बदलाव के लिए नीतिगत हस्तक्षेप ज़रूरी है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए सबसे पहला कदम क्या होना चाहिए?
यूनिसेफ के अनुसार, सबसे पहला कदम है बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करना और स्पष्ट डिजिटल नियम बनाना। इसमें यह तय करना शामिल है कि वे ऑनलाइन किससे बात कर सकते हैं, क्या साझा कर सकते हैं और गैजेट्स का उपयोग कब और कहाँ करना उचित है।
पेरेंटल कंट्रोल क्या होता है और यह कैसे काम करता है?
पेरेंटल कंट्रोल एक तकनीकी सुविधा है जो माता-पिता को बच्चों के डिवाइस पर अनुचित वेबसाइट, ऐप्स और कंटेंट को ब्लॉक करने की अनुमति देती है। यह स्क्रीन टाइम सीमित करने और बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखने में भी मदद करता है। अधिकांश स्मार्टफोन और टैबलेट में यह सुविधा अंतर्निहित होती है।
साइबरबुलिंग क्या है और बच्चे इससे कैसे बचें?
साइबरबुलिंग तब होती है जब कोई बच्चे को ऑनलाइन माध्यम से परेशान करे, डराए या अपमानित करे। बच्चों को सिखाएं कि ऐसे किसी भी व्यवहार की सूचना तुरंत माता-पिता या स्कूल को दें और संबंधित प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करें। भारत में साइबर अपराध की शिकायत के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 उपलब्ध है।
बच्चों के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन समय का सही संतुलन क्या होना चाहिए?
यूनिसेफ का सुझाव है कि ऑनलाइन गतिविधियों के साथ-साथ बच्चों के लिए मैदानी खेलकूद और पारिवारिक समय भी उतना ही ज़रूरी है। स्क्रीन टाइम की एक निश्चित सीमा तय करें और सोने से पहले डिवाइस का उपयोग बंद करने की आदत डालें।
अगर बच्चा ऑनलाइन किसी परेशानी में हो तो माता-पिता क्या करें?
यदि बच्चा ऑनलाइन किसी बात को छिपाने लगे, घबराया हुआ दिखे या डिवाइस का उपयोग अचानक बंद कर दे, तो बिना दबाव बनाए उससे शांति से बात करें। उसे यह भरोसा दिलाएं कि कोई भी समस्या होने पर वह बिना डरे बता सकता है, और ज़रूरत पड़ने पर स्कूल काउंसलर या साइबर हेल्पलाइन से मदद लें।
राष्ट्र प्रेस
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