आरा: कथित फर्जी एनकाउंटर पर अश्विनी चौबे ने भरत भूषण तिवारी परिवार से मिलकर माँगी उच्चस्तरीय जाँच
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने 20 जून को आरा में कथित फर्जी एनकाउंटर में मारे गए भारत भूषण तिवारी के परिवार से मुलाकात की और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया। इस दौरान चौबे ने घटना को 'अत्यंत दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय' बताते हुए मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जाँच की माँग की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी की भूमिका दोषी पाई जाती है तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
मुख्य घटनाक्रम
मीडिया से बातचीत में चौबे ने कहा कि एक होनहार नौजवान की जिस तरह से हत्या हुई है, उसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम है। उन्होंने माँग की कि संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए और उसकी तत्काल गिरफ्तारी हो। उनके अनुसार, भारत भूषण तिवारी गरीबों, अनुसूचित वर्ग, शोषितों, पीड़ितों, वंचितों तथा बाढ़ प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहे थे।
चौबे ने यह भी दावा किया कि मृतक के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं था। उन्होंने कहा, 'उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह मामला वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि फर्जी मुठभेड़ प्रतीत होता है।' उन्होंने मृतक के मोबाइल फोन की जाँच पर जोर दिया, जिससे कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
जाँच और मुआवजे की माँग
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने माँग की कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जाँच तीन महीने के भीतर पूरी की जाए और जाँच रिपोर्ट जल्द से जल्द सार्वजनिक की जाए। उन्होंने पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दिए जाने की भी माँग की। साथ ही, यदि परिवार के खिलाफ कोई झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हैं तो उन्हें वापस लिया जाना चाहिए।
चौबे ने कहा कि एनडीए सरकार जनता के विश्वास और कड़ी मेहनत से बनी है, इसलिए किसी भी दोषी पुलिसकर्मी को बख्शा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि सरकार इस मामले में कानूनी कार्रवाई करेगी।
केंद्रीय मंत्री मांझी के बयान पर प्रतिक्रिया
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बयान पर टिप्पणी करते हुए चौबे ने कहा कि पुलिस की इस कार्रवाई को किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे बहादुरी या उपलब्धि नहीं कहा जा सकता और यदि ऐसा कोई बयान दिया गया है तो वह गलत है।
आगे क्या होगा
यह मामला बिहार में पुलिस की जवाबदेही और न्यायिक पारदर्शिता के सवालों को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। गौरतलब है कि फर्जी एनकाउंटर के आरोप गंभीर संवैधानिक और मानवाधिकार प्रश्न उठाते हैं। पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा या नहीं, यह उच्चस्तरीय जाँच की निष्पक्षता और समयबद्धता पर निर्भर करेगा।