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असम के एक्वा टेक पार्क में बायोफ्लॉक और एक्वापोनिक्स से बदल रही मत्स्य पालन की तस्वीर

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असम के एक्वा टेक पार्क में बायोफ्लॉक और एक्वापोनिक्स से बदल रही मत्स्य पालन की तस्वीर

सारांश

तालाब और पोखरों से निकलकर अब मत्स्य पालन टेक-हब में प्रवेश कर चुका है। असम के सोनापुर में भारत का पहला एक्वा टेक पार्क बायोफ्लॉक और एक्वापोनिक्स से कम पानी में ज़्यादा मछली का रास्ता दिखा रहा है — और 60,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षित कर पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई उद्यमिता की दिशा में मोड़ रहा है।

मुख्य बातें

असम के सोनापुर स्थित भारत का पहला एक्वा टेक पार्क बायोफ्लॉक, एक्वापोनिक्स और सजावटी मछली पालन जैसी आधुनिक तकनीकें प्रदर्शित और सिखा रहा है।
पार्क का उद्घाटन 12 जुलाई 2025 को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने किया; इसकी नींव 10 जुलाई 2021 को एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल के रूप में पड़ी थी।
संस्था कालोंग-कोपिली ने अब तक 60,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण और 1 लाख से अधिक युवाओं व महिलाओं को आजीविका से जोड़ा।
3,050 से अधिक महिला SHG , 420 CRP , 350 से अधिक एक्वा उद्यमी और 4 FPO इस मॉडल से जुड़े हैं।
पार्क का काम असम के अलावा अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, बिहार और ओडिशा तक विस्तारित हो चुका है।
NABARD, ICAR-CIFA और असम सरकार का मत्स्य विभाग पार्क के विकास में सहयोगी हैं।

असम के सोनापुर स्थित भारत के पहले एक्वा टेक पार्क में आधुनिक तकनीकों के ज़रिए पारंपरिक मत्स्य पालन को एक नया रूप दिया जा रहा है। बागीबाड़ी में स्थित इस पार्क में बायोफ्लॉक, एक्वापोनिक्स और सजावटी मछली पालन जैसी उन्नत तकनीकों के ज़रिए कम पानी और सीमित संसाधनों में अधिक उत्पादन की संभावनाएँ विकसित की जा रही हैं। यह पार्क केवल प्रदर्शन केंद्र नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता का एकीकृत मंच बन रहा है।

क्या है एक्वा टेक पार्क की खासियत

पार्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ मत्स्य पालन को पारंपरिक तरीकों से आगे ले जाकर जल एवं संसाधन प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। बायोफ्लॉक तकनीक में सीमित पानी का पुनः उपयोग करते हुए अधिक मछली उत्पादन किया जाता है — यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जहाँ बड़े तालाब या पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। किसानों को इस तकनीक की कार्यप्रणाली समझाकर वास्तविक परिस्थितियों में अपनाने के लिए तैयार किया जा रहा है।

एक्वापोनिक्स में मछली पालन को पौधों की खेती के साथ एकीकृत किया गया है — एक ही प्रणाली में मछली और सब्ज़ियों का उत्पादन करने वाला यह मॉडल जल और संसाधनों के कुशल उपयोग का वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त पार्क में सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों को मत्स्य पालन से जोड़ने पर भी काम हो रहा है, जिससे उत्पादन लागत में कमी और टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिल सके।

कालोंग-कोपिली का 18 वर्षों का सफर

इस पार्क को विकसित करने वाली संस्था कालोंग-कोपिली वर्ष 2007 से असम और पूर्वोत्तर भारत में आधुनिक एवं जलवायु-अनुकूल मत्स्य पालन, प्राकृतिक खेती, सामुदायिक विकास और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रही है। संस्था के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ज्योतिष तालुकदार के अनुसार, अब तक 60,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण और 1 लाख से अधिक युवाओं एवं महिलाओं को आजीविका के अवसरों से जोड़ा जा चुका है।

संस्था का काम असम से आगे बढ़कर अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, बिहार और ओडिशा तक पहुँच चुका है। 3,050 से अधिक महिला स्वयं सहायता समूहों को इस पहल से जोड़ा गया है, 420 से अधिक सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRP) को विकसित किया गया है, 350 से अधिक एक्वा उद्यमी तैयार हुए हैं और 4 किसान उत्पादक संगठन (FPO) का गठन हुआ है।

तकनीक का चयन: स्थानीय ज़रूरत के अनुसार

फिशरी विशेषज्ञ अश्लेषा श्रबोर्नि ने बताया कि किसानों को उनके क्षेत्र की परिस्थितियों, उपलब्ध पानी, संसाधनों और स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर तकनीक चुनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। लक्ष्य किसी एक तकनीक को सर्वत्र थोपना नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करना है। यही दृष्टिकोण इस मॉडल को छोटे और सीमांत किसानों के लिए व्यावहारिक बनाता है।

शुरुआत और सरकारी समर्थन

इस पार्क की नींव 10 जुलाई 2021 को ICAR-CIFA और भारत सरकार की मान्यता प्राप्त एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल के रूप में पड़ी थी। समय के साथ इसे विस्तार देकर एक्वा टेक पार्क का स्वरूप दिया गया। पार्क का आधिकारिक उद्घाटन 12 जुलाई 2025 को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने किया। इसके विकास में नाबार्ड (NABARD), ICAR-CIFA, असम सरकार का मत्स्य विभाग और अन्य सहयोगी संस्थाओं की सक्रिय भूमिका रही है।

पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संभावनाएँ

असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों की आजीविका कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर टिकी है। ऐसे में यह पार्क महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ मछली पालन को पारंपरिक गतिविधि के बजाय तकनीक-आधारित ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित किया जा रहा है। यदि यह मॉडल व्यापक पैमाने पर किसानों तक पहुँचता है, तो कम पानी, सीमित ज़मीन और स्थानीय संसाधनों वाले युवाओं के लिए मत्स्य पालन एक व्यवहार्य स्वरोजगार विकल्प बन सकता है। सोनापुर का यह पार्क आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का एक सार्थक प्रयोग साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बायोफ्लॉक और एक्वापोनिक्स जैसी तकनीकें प्रदर्शन केंद्र की दीवारों से निकलकर वाकई छोटे और सीमांत किसानों की ज़मीन तक पहुँच पाएंगी। 60,000 प्रशिक्षित किसानों का आँकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि इनमें से कितनों ने इन तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर अपनाया और आय में वास्तविक बदलाव आया। पूर्वोत्तर में कोल्ड चेन, बाज़ार पहुँच और पूँजी तक सीमित पहुँच की समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं — जब तक इन पर ध्यान नहीं दिया जाता, तकनीकी प्रशिक्षण अधूरा साबित हो सकता है।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

असम का एक्वा टेक पार्क क्या है और यह कहाँ स्थित है?
असम के सोनापुर स्थित बागीबाड़ी में भारत का पहला एक्वा टेक पार्क है, जो बायोफ्लॉक, एक्वापोनिक्स और सजावटी मछली पालन जैसी आधुनिक तकनीकों के प्रदर्शन, प्रशिक्षण और उद्यमिता विकास का एकीकृत केंद्र है। इसका उद्घाटन 12 जुलाई 2025 को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने किया था।
बायोफ्लॉक तकनीक मत्स्य पालन में कैसे मदद करती है?
बायोफ्लॉक तकनीक में सीमित मात्रा में पानी का प्रबंधन और पुनः उपयोग करते हुए अधिक मछली उत्पादन किया जाता है। यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जहाँ बड़े तालाब या पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसान भी मत्स्य पालन शुरू कर सकते हैं।
कालोंग-कोपिली संस्था ने अब तक क्या हासिल किया है?
वर्ष 2007 से काम कर रही कालोंग-कोपिली संस्था ने अब तक 60,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया है और 1 लाख से अधिक युवाओं व महिलाओं को आजीविका के अवसरों से जोड़ा है। इसके अलावा 3,050 महिला SHG, 420 CRP, 350 से अधिक एक्वा उद्यमी और 4 FPO तैयार किए गए हैं।
एक्वा टेक पार्क के विकास में किन संस्थाओं की भूमिका रही है?
पार्क के विकास में नाबार्ड (NABARD), ICAR-CIFA, असम सरकार का मत्स्य विभाग और कालोंग-कोपिली संस्था की सक्रिय भूमिका रही है। इसकी नींव 10 जुलाई 2021 को ICAR-CIFA और भारत सरकार की मान्यता प्राप्त एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल के रूप में पड़ी थी।
यह पार्क पूर्वोत्तर के किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर हैं। यह पार्क मछली पालन को पारंपरिक गतिविधि से आगे ले जाकर तकनीक-आधारित ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जिससे कम संसाधनों वाले युवा भी स्वरोजगार की राह पकड़ सकते हैं।
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