सोमवती अमावस्या पर महाकाल का भांग से दिव्य शृंगार, मस्तक पर श्रीगणेश और त्रिनेत्र से सजे बाबा
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवती अमावस्या, 15 जून को बाबा महाकाल की भस्म आरती अत्यंत भव्यता के साथ संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर हजारों श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए उमड़ पड़े और भगवान महाकाल को भांग से विशेष रूप से सजाया गया — मस्तक पर श्रीगणेश की आकृति और त्रिनेत्र से विभूषित कर भस्म रमाने से पूर्व यह अनूठा शृंगार किया गया।
कपाट खुलने से गूंजा 'जय श्री महाकाल'
सोमवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। जैसे ही दिव्य शृंगार और भस्म आरती के बाद श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हुए, 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरा मंदिर परिसर गूंज उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की त्रिवेणी ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
जलाभिषेक और पूजन विधि
मंदिर के पट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक दूध, दही, घी, शक्कर, पंचामृत और फलों के रस से किया गया। पूजन के दौरान प्रथम घंटानाद के साथ 'हरि ओम' का जल अर्पित किया गया। महाआरती मंदिर के पुजारी द्वारा विधिवत संपन्न कराई गई।
रात से ही लगी श्रद्धालुओं की कतार
बाबा के दर्शन की चाह में शनिवार देर रात से ही श्रद्धालु मंदिर के बाहर कतारबद्ध होने लगे थे। सोमवती अमावस्या के पुण्य संयोग ने इस बार दर्शनार्थियों की संख्या को और अधिक बढ़ा दिया। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुगम व्यवस्था सुनिश्चित की।
पुजारी ने बताया सोमवती अमावस्या का महत्व
महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने बताया, 'धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने पंचांग में एक अतिरिक्त मास की व्यवस्था की, जिसे अधिक मास कहा जाता है। यह सामान्य बारह महीनों के अतिरिक्त माना जाता है। मान्यता है कि इसी काल में भगवान नरसिंह ने अवतार लिया और उस राक्षस का विनाश किया जो सनातन धर्म में विश्वास नहीं करता था।'
उन्होंने आगे बताया कि सोमवती और शनिश्चरी अमावस्या पर अवंतिका (उज्जैन) का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। सोमवती अमावस्या पर बाबा महाकाल के दर्शन तथा शनिश्चरी अमावस्या पर शनि मंदिरों में दर्शन के लिए हजारों भक्त उज्जैन पहुँचते हैं।
ज्येष्ठ मास का समापन और आगे का पर्व
पुजारी महेश शर्मा के अनुसार, धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में पुण्य कर्म, दान और भगवान विष्णु की आराधना से विशेष फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमावस्या से अमावस्या तक की अवधि को ज्येष्ठ मास माना जाता है और सोमवती अमावस्या के साथ इसका समापन होता है। इस दिन नदियों में स्नान, देवस्थलों पर दर्शन और शिवालयों में पूजन का विशेष विधान है। आने वाले दिनों में भी उज्जैन में धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला जारी रहेगी।