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भदेरवाह में लैवेंडर क्रांति: 2,500 किसान परिवारों ने छोड़ी मक्का-धान की खेती, बंजर ज़मीन बनी सोना

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भदेरवाह में लैवेंडर क्रांति: 2,500 किसान परिवारों ने छोड़ी मक्का-धान की खेती, बंजर ज़मीन बनी सोना

सारांश

मक्का और धान की जगह बैंगनी लैवेंडर — भदेरवाह के किसानों ने यह दांव खेला और जीते। 2010 में सीएसआईआर के कुछ पौधों से शुरू हुई यह यात्रा आज 2,500 से अधिक परिवारों की आजीविका बन चुकी है और बंजर ज़मीनें भी सोना उगल रही हैं।

मुख्य बातें

भदेरवाह (डोडा, जम्मू-कश्मीर) को 'भारत की लैवेंडर राजधानी' के रूप में मान्यता प्राप्त है।
2,500 से अधिक किसान परिवार लैवेंडर की खेती से जुड़े हैं; खेती की शुरुआत वर्ष 2010 में सीएसआईआर-आईआईआईएम के सहयोग से हुई।
किसान रोशन ने 2015 में 1 कनाल से शुरुआत की, आज 20 कनाल पर खेती और 200 किसान उनसे जुड़े।
लैवेंडर साल में दो बार कटाई योग्य होती है; पारंपरिक फसलों की तुलना में कम पानी और बेहतर आय।
लैवेंडर को एक जिला-एक उत्पाद योजना में शामिल किया गया है; फ्लोरीकल्चर विभाग सक्रिय सहयोग दे रहा है।
बंजर ज़मीनों पर भी खेती और किराये के मॉडल से भूमिहीन किसानों को भी रोज़गार मिल रहा है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र आज 'भारत की लैवेंडर राजधानी' के रूप में पहचाना जाता है, जहाँ 2,500 से अधिक किसान परिवारों ने मक्का और धान जैसी पारंपरिक फसलों को छोड़कर लैवेंडर की खेती को अपना लिया है। लेलरोट और टिपरी क्षेत्रों में इन दिनों लैवेंडर की कटाई जोरों पर है और बैंगनी फूलों की मनमोहक सुगंध पूरे इलाके में फैली हुई है।

लैवेंडर खेती की शुरुआत कैसे हुई

भदेरवाह में लैवेंडर की खेती की नींव लगभग वर्ष 2010 में पड़ी, जब सीएसआईआर-भारतीय एकीकृत चिकित्सा संस्थान (सीएसआईआर-आईआईआईएम) ने यहाँ के किसानों को पहली बार लैवेंडर के पौधे उपलब्ध कराए। इसके बाद सरकार समर्थित अरोमा मिशन के अंतर्गत किसानों को प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और लैवेंडर तेल निकालने के लिए आसवन इकाइयाँ प्रदान की गईं। यह ऐसे समय में आया जब पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक खेती की लाभप्रदता लगातार घट रही थी और किसान बेहतर विकल्प की तलाश में थे।

किसानों की बदली तकदीर

लैवेंडर किसान रोशन ने बताया, 'लेलरोट और टिपरी से लैवेंडर की खेती की शुरुआत हुई थी। यहाँ के किसानों की मेहनत की वजह से लैवेंडर को एक जिला-एक उत्पाद योजना में शामिल किया गया। मैंने वर्ष 2015 में एक कनाल (5,445 वर्ग फुट) भूमि पर लैवेंडर की खेती शुरू की थी। आज मैं 20 कनाल भूमि पर इसकी खेती कर रहा हूँ।' उन्होंने यह भी बताया कि आज उनके साथ 200 किसान जुड़े हुए हैं और जो ज़मीनें बंजर हो चुकी थीं, उन पर भी लैवेंडर उगाया जा रहा है।

एक अन्य किसान कुलदीप कुमार ने कहा, 'पहले हम मक्का, दाल और अन्य पारंपरिक फसलें उगाते थे, लेकिन उनसे ज़्यादा लाभ नहीं होता था, क्योंकि बंदर फसलों को नुकसान पहुँचा देते थे। पिछले 10-12 वर्षों से लैवेंडर की खेती कर रहे हैं और इससे काफी फायदा हो रहा है। यह फसल साल में दो बार कटाई के लिए तैयार हो जाती है।'

लैवेंडर से बनने वाले उत्पाद और बाज़ार

किसानों द्वारा सावधानीपूर्वक काटे गए लैवेंडर के फूलों का उपयोग आवश्यक तेल, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। पारंपरिक फसलों की तुलना में लैवेंडर को कम पानी की आवश्यकता होती है, जो पहाड़ी भूगोल के लिए विशेष रूप से अनुकूल है। गौरतलब है कि इस खेती के लिए फ्लोरीकल्चर विभाग किसानों को पूरा सहयोग दे रहा है।

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

लैवेंडर की खेती ने न केवल किसानों की आय बढ़ाई है, बल्कि बेरोज़गार युवाओं और भूमिहीन मज़दूरों के लिए भी रोज़गार के नए अवसर खोले हैं। जो किसान स्वयं खेती नहीं करना चाहते, उनसे ज़मीन किराये पर लेकर लैवेंडर उगाया जा रहा है — एक ऐसा मॉडल जो भूमि उपयोग को अधिकतम करता है। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र कृषि पर्यटन के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।

आगे की राह

भदेरवाह की लैवेंडर सफलता की कहानी अब जम्मू-कश्मीर के अन्य पहाड़ी जिलों के लिए एक मॉडल बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इसी तरह सरकारी सहयोग और बाज़ार संपर्क बना रहा, तो आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र से लैवेंडर उत्पादों का निर्यात और बढ़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके पीछे एक ज़रूरी सवाल भी छिपा है — क्या यह मॉडल तब भी टिकाऊ रहेगा जब हज़ारों और किसान इसमें आएँगे और बाज़ार में लैवेंडर तेल की आपूर्ति बढ़ेगी? एकल-फसल पर अत्यधिक निर्भरता — जैसा मक्का और धान के साथ हुआ — एक नई कमज़ोरी बन सकती है। सरकार का अरोमा मिशन और फ्लोरीकल्चर सहयोग सराहनीय है, पर मूल्य-संवर्धन श्रृंखला और निर्यात बाज़ार तक किसानों की सीधी पहुँच सुनिश्चित किए बिना, मुनाफे का बड़ा हिस्सा बिचौलियों के पास जाने का जोखिम बना रहेगा।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भदेरवाह को 'भारत की लैवेंडर राजधानी' क्यों कहा जाता है?
जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र देश में लैवेंडर उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है, जहाँ 2,500 से अधिक किसान परिवार इसकी खेती करते हैं। लेलरोट और टिपरी जैसे उप-क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लैवेंडर के खेत हैं और यहाँ का लैवेंडर 'एक जिला-एक उत्पाद' योजना में भी शामिल है।
भदेरवाह में लैवेंडर की खेती कब और कैसे शुरू हुई?
लैवेंडर की खेती की शुरुआत वर्ष 2010 में हुई, जब सीएसआईआर-आईआईआईएम ने किसानों को पहले पौधे उपलब्ध कराए। इसके बाद सरकार के अरोमा मिशन के तहत प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और आसवन इकाइयाँ दी गईं, जिससे यह खेती धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई।
लैवेंडर की खेती पारंपरिक फसलों से बेहतर क्यों मानी जाती है?
लैवेंडर साल में दो बार कटाई के लिए तैयार होती है और इसे मक्का या धान की तुलना में कम पानी की ज़रूरत होती है। इसके अलावा बंदरों जैसे जानवरों से फसल को नुकसान नहीं होता और आवश्यक तेल, इत्र व सौंदर्य उत्पादों की माँग के कारण इसका बाज़ार मूल्य भी अधिक मिलता है।
लैवेंडर से कौन-से उत्पाद बनाए जाते हैं?
भदेरवाह में उगाए गए लैवेंडर के फूलों का उपयोग मुख्यतः आवश्यक तेल, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में होता है। आसवन इकाइयों के ज़रिए किसान सीधे तेल निकाल सकते हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है।
क्या छोटे और भूमिहीन किसान भी लैवेंडर खेती से जुड़ सकते हैं?
हाँ, भदेरवाह में एक किराया-मॉडल प्रचलित है जिसमें जो किसान स्वयं खेती नहीं करना चाहते, वे अपनी ज़मीन किराये पर देते हैं और उस पर लैवेंडर उगाया जाता है। बंजर पड़ी ज़मीनों पर भी खेती हो रही है, जिससे भूमिहीन और छोटे किसानों को भी रोज़गार के अवसर मिल रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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