भीलवाड़ा एमजी अस्पताल में जुलाई में 7 प्रसूता मौतें: नॉर्मल डिलीवरी के बाद रक्तस्राव से दो और महिलाओं की जान गई
सारांश
मुख्य बातें
भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल (एमजीएच) में 31 जुलाई 2026 की देर रात दो और प्रसूताओं की मृत्यु हो जाने से राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार दोनों महिलाओं की डिलीवरी सामान्य हुई थी और उन्हें 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था, फिर भी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव ने उनकी जान ले ली। इन दो मौतों के साथ जुलाई माह में इस अस्पताल में प्रसूता मृत्यु की कुल संख्या सात हो गई है।
मृत महिलाओं का विवरण
पहली पीड़ित, कोटड़ी निवासी सुगना मोहन बैरवा (22 वर्ष) को नॉर्मल डिलीवरी के बाद जटिलताएँ उत्पन्न होने पर शाहपुरा से एमजी अस्पताल रेफर किया गया था। परिवार के अनुसार बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उनका रक्तचाप तेज़ी से गिर गया। उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती किया गया, जहाँ बाद में उनकी मृत्यु हो गई। प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव से सुगना का हीमोग्लोबिन स्तर तेज़ी से गिरा, जिससे उनकी मृत्यु हुई।
दूसरी पीड़ित भीलवाड़ा शहर के पटेल नगर की रानी भूरा बंजारा (18 वर्ष) की भी एमजी अस्पताल में ही नॉर्मल डिलीवरी हुई थी। डॉक्टरों के अनुसार प्रसव के बाद अचानक अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। सामान्यतः ऐसी स्थिति में पहले दवाएँ दी जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर गर्भाशय निकालने की आपातकालीन शल्यक्रिया की जाती है, किंतु उनकी हालत इतनी तेज़ी से बिगड़ी कि यह जीवनरक्षक प्रक्रिया अपनाने का अवसर ही नहीं मिला।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और जाँच
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि प्रसवपूर्व देखभाल (एंटीनेटल केयर) के दौरान किसी भी महिला को 'हाई-रिस्क' श्रेणी में नहीं रखा गया था और दोनों में जटिलताएँ प्रसव के बाद अचानक उत्पन्न हुईं। उन्होंने कहा कि यह जाँच शुरू कर दी गई है कि निगरानी और आपातकालीन उपचार की सुविधाएँ उपलब्ध होने के बावजूद मौतें क्यों हुईं। जाँच अधिकारी मरीज़ों की मेडिकल हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, उपचार के रिकॉर्ड और मृत्यु के वास्तविक कारणों की समीक्षा करेंगे।
स्क्रीनिंग अभियान और हाई-रिस्क गर्भावस्था
गौरतलब है कि हाल ही में भीलवाड़ा जिले में एक सप्ताह तक चले स्क्रीनिंग अभियान के दौरान स्वास्थ्य अधिकारियों ने 2,210 गर्भवती महिलाओं की जाँच की। इनमें से 500 महिलाओं (लगभग 23 प्रतिशत) में 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की पहचान की गई। जोखिम कारकों में गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और गुर्दे की बीमारियाँ, पूर्व सिजेरियन डिलीवरी, जुड़वाँ गर्भावस्था और अन्य चिकित्सीय जटिलताएँ शामिल थीं। हालाँकि अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि हाल की कई मातृ मृत्युओं में वे महिलाएँ शामिल थीं जिन्हें 'हाई-रिस्क' नहीं माना गया था — जो स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की सीमाओं पर सवाल उठाता है।
राजस्थान में मातृ मृत्यु का चिंताजनक क्रम
यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। मई 2026 में कोटा में प्रसव के बाद पाँच महिलाओं की मृत्यु हुई थी। जून 2026 में बीकानेर में सिजेरियन डिलीवरी के बाद छह महिलाओं को किडनी फेलियर की समस्या हुई, जिनमें से दो की बाद में मृत्यु हो गई। जुलाई 2026 में भीलवाड़ा में सात और बांसवाड़ा में दो और प्रसूताओं की मृत्यु दर्ज की गई है। यह तीसरी बड़ी घटना है जो मात्र तीन महीनों में अलग-अलग जिलों में हुई है, जो राज्य की प्रसूति आपातकालीन देखभाल प्रणाली की व्यापक विफलता की ओर संकेत करती है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों का कहना है कि 'हाई-रिस्क' श्रेणी में न होने वाली महिलाओं में भी प्रसव के बाद रक्तस्राव (पोस्टपार्टम हेमरेज) जानलेवा हो सकता है और इसके लिए हर प्रसव कक्ष में तत्काल हस्तक्षेप की क्षमता अनिवार्य है। जाँच के नतीजों और राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और परिजनों की नज़रें टिकी हैं।