31 जुलाई 2026
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भीलवाड़ा एमजी अस्पताल में जुलाई में 7 प्रसूता मौतें: नॉर्मल डिलीवरी के बाद रक्तस्राव से दो और महिलाओं की जान गई

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भीलवाड़ा एमजी अस्पताल में जुलाई में 7 प्रसूता मौतें: नॉर्मल डिलीवरी के बाद रक्तस्राव से दो और महिलाओं की जान गई

सारांश

भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में जुलाई में प्रसूता मृत्यु की संख्या सात तक पहुँच गई है — और ये सभी 'हाई-रिस्क' नहीं मानी गई महिलाएँ थीं। मई में कोटा, जून में बीकानेर और अब जुलाई में भीलवाड़ा व बांसवाड़ा — राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु का यह सिलसिला प्रसूति आपातकालीन देखभाल पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है।

मुख्य बातें

भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में 31 जुलाई 2026 की रात दो और प्रसूताओं की मृत्यु, जुलाई में कुल मातृ मृत्यु संख्या 7 हुई।
मृत महिलाओं में सुगना मोहन बैरवा (22 वर्ष) , कोटड़ी और रानी भूरा बंजारा (18 वर्ष) , पटेल नगर भीलवाड़ा शामिल हैं — दोनों की नॉर्मल डिलीवरी हुई थी।
दोनों को प्रसवपूर्व जाँच में 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था; मृत्यु का कारण प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव बताया गया।
हाल के स्क्रीनिंग अभियान में 2,210 में से 500 (23%) गर्भवती महिलाओं में हाई-रिस्क गर्भावस्था की पहचान हुई।
मई में कोटा में 5 , जून में बीकानेर में 2 और जुलाई में बांसवाड़ा में 2 अतिरिक्त मातृ मृत्यु — राज्य में तीन महीनों में व्यापक संकट।
संजीव शर्मा ने जाँच के आदेश दिए; मेडिकल हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट और उपचार रिकॉर्ड की समीक्षा होगी।

भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल (एमजीएच) में 31 जुलाई 2026 की देर रात दो और प्रसूताओं की मृत्यु हो जाने से राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार दोनों महिलाओं की डिलीवरी सामान्य हुई थी और उन्हें 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था, फिर भी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव ने उनकी जान ले ली। इन दो मौतों के साथ जुलाई माह में इस अस्पताल में प्रसूता मृत्यु की कुल संख्या सात हो गई है।

मृत महिलाओं का विवरण

पहली पीड़ित, कोटड़ी निवासी सुगना मोहन बैरवा (22 वर्ष) को नॉर्मल डिलीवरी के बाद जटिलताएँ उत्पन्न होने पर शाहपुरा से एमजी अस्पताल रेफर किया गया था। परिवार के अनुसार बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उनका रक्तचाप तेज़ी से गिर गया। उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती किया गया, जहाँ बाद में उनकी मृत्यु हो गई। प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव से सुगना का हीमोग्लोबिन स्तर तेज़ी से गिरा, जिससे उनकी मृत्यु हुई।

दूसरी पीड़ित भीलवाड़ा शहर के पटेल नगर की रानी भूरा बंजारा (18 वर्ष) की भी एमजी अस्पताल में ही नॉर्मल डिलीवरी हुई थी। डॉक्टरों के अनुसार प्रसव के बाद अचानक अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। सामान्यतः ऐसी स्थिति में पहले दवाएँ दी जाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर गर्भाशय निकालने की आपातकालीन शल्यक्रिया की जाती है, किंतु उनकी हालत इतनी तेज़ी से बिगड़ी कि यह जीवनरक्षक प्रक्रिया अपनाने का अवसर ही नहीं मिला।

प्रशासन की प्रतिक्रिया और जाँच

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि प्रसवपूर्व देखभाल (एंटीनेटल केयर) के दौरान किसी भी महिला को 'हाई-रिस्क' श्रेणी में नहीं रखा गया था और दोनों में जटिलताएँ प्रसव के बाद अचानक उत्पन्न हुईं। उन्होंने कहा कि यह जाँच शुरू कर दी गई है कि निगरानी और आपातकालीन उपचार की सुविधाएँ उपलब्ध होने के बावजूद मौतें क्यों हुईं। जाँच अधिकारी मरीज़ों की मेडिकल हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, उपचार के रिकॉर्ड और मृत्यु के वास्तविक कारणों की समीक्षा करेंगे।

स्क्रीनिंग अभियान और हाई-रिस्क गर्भावस्था

गौरतलब है कि हाल ही में भीलवाड़ा जिले में एक सप्ताह तक चले स्क्रीनिंग अभियान के दौरान स्वास्थ्य अधिकारियों ने 2,210 गर्भवती महिलाओं की जाँच की। इनमें से 500 महिलाओं (लगभग 23 प्रतिशत) में 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की पहचान की गई। जोखिम कारकों में गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और गुर्दे की बीमारियाँ, पूर्व सिजेरियन डिलीवरी, जुड़वाँ गर्भावस्था और अन्य चिकित्सीय जटिलताएँ शामिल थीं। हालाँकि अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि हाल की कई मातृ मृत्युओं में वे महिलाएँ शामिल थीं जिन्हें 'हाई-रिस्क' नहीं माना गया था — जो स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की सीमाओं पर सवाल उठाता है।

राजस्थान में मातृ मृत्यु का चिंताजनक क्रम

यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। मई 2026 में कोटा में प्रसव के बाद पाँच महिलाओं की मृत्यु हुई थी। जून 2026 में बीकानेर में सिजेरियन डिलीवरी के बाद छह महिलाओं को किडनी फेलियर की समस्या हुई, जिनमें से दो की बाद में मृत्यु हो गई। जुलाई 2026 में भीलवाड़ा में सात और बांसवाड़ा में दो और प्रसूताओं की मृत्यु दर्ज की गई है। यह तीसरी बड़ी घटना है जो मात्र तीन महीनों में अलग-अलग जिलों में हुई है, जो राज्य की प्रसूति आपातकालीन देखभाल प्रणाली की व्यापक विफलता की ओर संकेत करती है।

आगे क्या होगा

विशेषज्ञों का कहना है कि 'हाई-रिस्क' श्रेणी में न होने वाली महिलाओं में भी प्रसव के बाद रक्तस्राव (पोस्टपार्टम हेमरेज) जानलेवा हो सकता है और इसके लिए हर प्रसव कक्ष में तत्काल हस्तक्षेप की क्षमता अनिवार्य है। जाँच के नतीजों और राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और परिजनों की नज़रें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

कोटा, बीकानेर और बांसवाड़ा — तीन महीनों में राजस्थान के चार ज़िलों में एक के बाद एक मातृ मृत्युएँ यह संकेत देती हैं कि यह किसी एक अस्पताल की विफलता नहीं, बल्कि प्रणालीगत कमज़ोरी है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि मृत महिलाओं में से अधिकांश को 'हाई-रिस्क' नहीं माना गया था — जो बताता है कि स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल पर्याप्त नहीं हैं या प्रसव के बाद की निगरानी में गंभीर खामियाँ हैं। पोस्टपार्टम हेमरेज विश्वभर में मातृ मृत्यु का प्रमुख कारण है और इसे समय पर हस्तक्षेप से रोका जा सकता है — फिर भी बार-बार यही कारण सामने आ रहा है। जाँच के आदेश हर बार दिए जाते हैं, लेकिन घटनाएँ रुकती नहीं — यही वह सवाल है जिसका जवाब राज्य सरकार को देना होगा।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भीलवाड़ा एमजी अस्पताल में जुलाई 2026 में कितनी प्रसूताओं की मृत्यु हुई?
जुलाई 2026 में भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में कुल सात प्रसूताओं की मृत्यु हुई। इनमें से दो मौतें 31 जुलाई की देर रात हुईं, जब नॉर्मल डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव से दो महिलाओं की जान चली गई।
सुगना मोहन बैरवा और रानी भूरा बंजारा की मृत्यु कैसे हुई?
कोटड़ी निवासी सुगना मोहन बैरवा (22 वर्ष) को नॉर्मल डिलीवरी के बाद शाहपुरा से एमजी अस्पताल रेफर किया गया था, जहाँ प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव और हीमोग्लोबिन गिरने से उनकी मृत्यु हुई। पटेल नगर भीलवाड़ा की रानी भूरा बंजारा (18 वर्ष) की भी नॉर्मल डिलीवरी के बाद अचानक अत्यधिक रक्तस्राव से हालत इतनी तेज़ी से बिगड़ी कि जीवनरक्षक शल्यक्रिया का अवसर नहीं मिला।
क्या इन महिलाओं को पहले से हाई-रिस्क माना गया था?
नहीं। सीएमएचओ डॉ. संजीव शर्मा के अनुसार प्रसवपूर्व जाँच के दौरान किसी भी महिला को 'हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी' की श्रेणी में नहीं रखा गया था। जटिलताएँ प्रसव के बाद अचानक उत्पन्न हुईं, जो मौजूदा स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की सीमाओं पर सवाल उठाती है।
राजस्थान में पिछले तीन महीनों में मातृ मृत्यु की क्या स्थिति रही है?
मई 2026 में कोटा में पाँच, जून 2026 में बीकानेर में सिजेरियन के बाद दो, जुलाई 2026 में भीलवाड़ा में सात और बांसवाड़ा में दो प्रसूताओं की मृत्यु हुई। यह क्रम राज्य के सरकारी अस्पतालों में प्रसूति आपातकालीन देखभाल की प्रणालीगत कमज़ोरी की ओर संकेत करता है।
अब आगे क्या कार्रवाई होगी?
सीएमएचओ डॉ. संजीव शर्मा ने जाँच के आदेश दिए हैं जिसमें मृत महिलाओं की मेडिकल हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, उपचार रिकॉर्ड और मृत्यु के वास्तविक कारणों की समीक्षा की जाएगी। जाँच के नतीजों के आधार पर आगे की कार्रवाई अपेक्षित है।
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