बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन की श्रद्धांजलि, बोले — 'धरती आबा' सामाजिक न्याय का मार्ग दिखाते रहेंगे
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने 9 जून 2026 को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि 'धरती आबा' की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सामाजिक न्याय और आत्म-सम्मान की प्रेरणा बनी रहेगी। उपराष्ट्रपति ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर अपनी भावनाएँ साझा कीं।
उपराष्ट्रपति का संदेश
राधाकृष्णन ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा, 'भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर मैं सम्मानित 'धरती आबा' को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिनका जीवन साहस, आत्म-सम्मान और न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था। ऐतिहासिक 'उलगुलान' के माध्यम से उन्होंने दमन के खिलाफ प्रतिरोध की भावना जगाई और आदिवासी समुदायों को अपने अधिकारों, पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरित किया।'
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें झारखंड के राज्यपाल के रूप में पदभार संभालने के पहले ही दिन और बाद में उपराष्ट्रपति के रूप में बिरसा मुंडा के पवित्र जन्मस्थान 'उलिहातू' पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर मिला, जो उनके लिए गहरे व्यक्तिगत सम्मान की बात है।
बिरसा मुंडा: संघर्ष और विरासत
बिरसा मुंडा का जन्म 1875 में आज के झारखंड में हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और आदिवासी समुदायों पर थोपी गई शोषणकारी भूमि नीतियों के विरुद्ध ऐतिहासिक 'उलगुलान' यानी 'महान विद्रोह' का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के जरिए उन्होंने हजारों आदिवासियों को उनके अधिकारों, पहचान और पारंपरिक भूमि के मालिकाना हक के लिए एकजुट किया। 9 जून 1900 को मात्र 25 वर्ष की आयु में ब्रिटिश हिरासत में उनका निधन हो गया।
असम और अन्य राज्यों पर प्रभाव
यद्यपि बिरसा मुंडा का आंदोलन मुख्यतः छोटानागपुर क्षेत्र तक सीमित था, किंतु उनकी विरासत का प्रभाव असम सहित कई राज्यों में आज भी महसूस किया जाता है। असम में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी और 'टी ट्राइब' — यानी चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी समुदाय — के लोग रहते हैं, जिनके पूर्वज औपनिवेशिक काल में छोटानागपुर पठार से वहाँ जाकर बसे थे। ये समुदाय आज भी बिरसा मुंडा को प्रतिरोध, सम्मान और सशक्तिकरण का प्रतीक मानते हैं।
जनजातीय गौरव दिवस और राष्ट्रीय मान्यता
केंद्र सरकार ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को सम्मान देने और भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत का उत्सव मनाने के लिए बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को 'जनजातीय गौरव दिवस' घोषित किया है। असम भर के राजनीतिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और आदिवासी समूहों ने भी इस अवसर पर इस महान नेता को श्रद्धांजलि दी और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों की लड़ाई में उनकी अमिट भूमिका को याद किया।
आगे की राह
गौरतलब है कि हाल के वर्षों में आदिवासी अधिकारों के लिए बिरसा मुंडा के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती पहचान मिल रही है। उनकी स्मृति और संघर्ष की गाथा न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश में जनजातीय समुदायों की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना को आकार देती रहेगी।