छात्रों पर जबरन विषय थोपना तनाव की असली वजह: मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल
सारांश
मुख्य बातें
नीट-यूजी परीक्षा के दौर में छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के कोटा दौरे को लेकर देशभर के मनोचिकित्सकों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करते समय कोचिंग से इतर उन गहरे कारणों को भी समझना ज़रूरी है, जो परिवार और शिक्षा-तंत्र के भीतर से उपजते हैं।
तनाव की असली जड़: विषय-चयन में जबरदस्ती
कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल के अनुसार, छात्रों में अवसाद और तनाव के कई छिपे हुए कारण होते हैं। उन्होंने कहा, "कोचिंग संस्थानों को अलग रख दिया जाए तो सबसे बड़ी समस्या विषयों के चयन से जुड़ी होती है। कई बार माता-पिता बच्चों की रुचि और क्षमता को नजरअंदाज कर उन पर ऐसे विषय थोप देते हैं, जिनमें उनकी दिलचस्पी नहीं होती।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ मामलों में शिक्षक भी छात्रों को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और जब किसी छात्र की इच्छा के विरुद्ध निर्णय लिए जाते हैं, तभी से तनाव और मानसिक दबाव की शुरुआत हो जाती है।
राजनीतिक कार्यक्रमों पर विशेषज्ञों की राय
डॉ. अग्रवाल ने राहुल गांधी के कोटा दौरे और संवाद कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय राजनीति में यह एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है — विपक्ष सत्तारूढ़ दल की नीतियों का विरोध करता है और जब कोई दल सत्ता में होता है तो परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, लेकिन विपक्ष में आने के बाद वही मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा से ठीक पहले आयोजित होने वाले ऐसे कार्यक्रम छात्रों का ध्यान भटका सकते हैं और परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को ऐसे आयोजनों से दूर रहने की सलाह दी।
उद्देश्य पर निर्भर करती है प्रासंगिकता
दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. राजीव मेहता ने कहा कि किसी भी रैली या कार्यक्रम की प्रासंगिकता उसके उद्देश्य पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, यदि उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना है तो ऐसा किसी भी समय किया जा सकता है। हालांकि, यदि कार्यक्रम का मकसद परीक्षाओं को बाधित करना या रद्द कराने की मांग करना है, तो यह उचित नहीं है। दूसरी ओर, यदि इसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता के लिए सरकार पर दबाव बनाना है, तो इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है।
नीट-यूजी पुनर्परीक्षा और मानसिक दबाव
जयपुर के मनोचिकित्सक डॉ. शिव गौतम ने परीक्षा से पहले राजनीतिक सभाओं के आयोजन पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे समय में छात्रों का मनोबल गिरने नहीं देना चाहिए और राजनीतिक दलों को चुनावी हितों से ऊपर उठकर छात्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए। नीट-यूजी के दोबारा आयोजन पर उन्होंने माना कि इससे छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव अवश्य बढ़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस बार पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए अधिक मजबूत और सुरक्षित व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही है, जिससे छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है।
आगे की राह
विशेषज्ञों की सामूहिक राय यह है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को राजनीतिक बहस से अलग रखा जाना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब नीट-यूजी को लेकर पूरे देश में बहस तेज़ है और अभिभावकों, शिक्षकों तथा नीति-निर्माताओं — सभी की जवाबदेही तय करने की माँग उठ रही है।