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छात्रों पर जबरन विषय थोपना तनाव की असली वजह: मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल

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छात्रों पर जबरन विषय थोपना तनाव की असली वजह: मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल

सारांश

कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल का साफ़ कहना है — असली तनाव कोचिंग नहीं, माता-पिता और शिक्षकों द्वारा जबरन थोपे गए विषय हैं। नीट-यूजी विवाद के बीच तीन राज्यों के विशेषज्ञों ने राजनीतिक कार्यक्रमों को परीक्षा काल में छात्रों के लिए ध्यान-भटकाव बताया।

मुख्य बातें

एमएल अग्रवाल (कोटा) के अनुसार, माता-पिता द्वारा बच्चों पर जबरन विषय थोपना छात्रों में अवसाद और तनाव की सबसे बड़ी वजह है।
परीक्षा से पहले राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ये छात्रों का ध्यान भटका सकते हैं।
राजीव मेहता (दिल्ली) ने कहा कि राजनीतिक आयोजन की प्रासंगिकता उसके उद्देश्य पर निर्भर करती है — विरोध और व्यवधान में फ़र्क है।
शिव गौतम (जयपुर) ने माना कि नीट-यूजी पुनर्परीक्षा ने छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव बढ़ाया है।
विशेषज्ञों ने राजनीतिक दलों से अपील की कि वे छात्रों के हितों को चुनावी हितों से ऊपर रखें।

नीट-यूजी परीक्षा के दौर में छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के कोटा दौरे को लेकर देशभर के मनोचिकित्सकों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करते समय कोचिंग से इतर उन गहरे कारणों को भी समझना ज़रूरी है, जो परिवार और शिक्षा-तंत्र के भीतर से उपजते हैं।

तनाव की असली जड़: विषय-चयन में जबरदस्ती

कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल के अनुसार, छात्रों में अवसाद और तनाव के कई छिपे हुए कारण होते हैं। उन्होंने कहा, "कोचिंग संस्थानों को अलग रख दिया जाए तो सबसे बड़ी समस्या विषयों के चयन से जुड़ी होती है। कई बार माता-पिता बच्चों की रुचि और क्षमता को नजरअंदाज कर उन पर ऐसे विषय थोप देते हैं, जिनमें उनकी दिलचस्पी नहीं होती।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ मामलों में शिक्षक भी छात्रों को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और जब किसी छात्र की इच्छा के विरुद्ध निर्णय लिए जाते हैं, तभी से तनाव और मानसिक दबाव की शुरुआत हो जाती है।

राजनीतिक कार्यक्रमों पर विशेषज्ञों की राय

डॉ. अग्रवाल ने राहुल गांधी के कोटा दौरे और संवाद कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय राजनीति में यह एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है — विपक्ष सत्तारूढ़ दल की नीतियों का विरोध करता है और जब कोई दल सत्ता में होता है तो परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, लेकिन विपक्ष में आने के बाद वही मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा से ठीक पहले आयोजित होने वाले ऐसे कार्यक्रम छात्रों का ध्यान भटका सकते हैं और परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को ऐसे आयोजनों से दूर रहने की सलाह दी।

उद्देश्य पर निर्भर करती है प्रासंगिकता

दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. राजीव मेहता ने कहा कि किसी भी रैली या कार्यक्रम की प्रासंगिकता उसके उद्देश्य पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, यदि उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना है तो ऐसा किसी भी समय किया जा सकता है। हालांकि, यदि कार्यक्रम का मकसद परीक्षाओं को बाधित करना या रद्द कराने की मांग करना है, तो यह उचित नहीं है। दूसरी ओर, यदि इसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता के लिए सरकार पर दबाव बनाना है, तो इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है।

नीट-यूजी पुनर्परीक्षा और मानसिक दबाव

जयपुर के मनोचिकित्सक डॉ. शिव गौतम ने परीक्षा से पहले राजनीतिक सभाओं के आयोजन पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे समय में छात्रों का मनोबल गिरने नहीं देना चाहिए और राजनीतिक दलों को चुनावी हितों से ऊपर उठकर छात्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए। नीट-यूजी के दोबारा आयोजन पर उन्होंने माना कि इससे छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव अवश्य बढ़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस बार पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए अधिक मजबूत और सुरक्षित व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही है, जिससे छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है।

आगे की राह

विशेषज्ञों की सामूहिक राय यह है कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को राजनीतिक बहस से अलग रखा जाना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब नीट-यूजी को लेकर पूरे देश में बहस तेज़ है और अभिभावकों, शिक्षकों तथा नीति-निर्माताओं — सभी की जवाबदेही तय करने की माँग उठ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक गहरा विरोधाभास छिपा है — जिस शिक्षा-तंत्र ने नीट जैसी एकल प्रवेश परीक्षा को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया, उसी में माता-पिता को 'दोषी' ठहराना अधूरा विश्लेषण है। राहुल गांधी के कोटा दौरे पर विशेषज्ञों की 'ध्यान-भटकाव' वाली चिंता तब और पेचीदा हो जाती है जब नीट पेपर लीक जैसी व्यवस्थागत विफलताएं खुद छात्रों का मनोबल तोड़ रही हों। असली सवाल यह है कि क्या मनोवैज्ञानिक परामर्श और राजनीतिक दबाव — दोनों एक साथ काम कर सकते हैं, या एक-दूसरे को कमज़ोर करते हैं।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छात्रों में तनाव और अवसाद की असली वजह क्या है?
कोटा के मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल के अनुसार, छात्रों में तनाव की सबसे बड़ी वजह कोचिंग नहीं, बल्कि माता-पिता और शिक्षकों द्वारा बच्चों पर उनकी रुचि के विरुद्ध विषय थोपना है। जब छात्र की इच्छा के खिलाफ निर्णय लिए जाते हैं, तभी से मानसिक दबाव शुरू होता है।
राहुल गांधी के कोटा दौरे पर मनोचिकित्सकों की क्या राय है?
मनोचिकित्सकों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि परीक्षा से पहले ऐसे कार्यक्रम छात्रों का ध्यान भटका सकते हैं और उन्होंने परीक्षार्थियों को इनसे दूर रहने की सलाह दी। वहीं डॉ. राजीव मेहता ने कहा कि यदि उद्देश्य शिक्षा सुधार के लिए दबाव बनाना है, तो इसे सकारात्मक पहल माना जा सकता है।
नीट-यूजी पुनर्परीक्षा का छात्रों पर क्या असर पड़ा है?
जयपुर के मनोचिकित्सक डॉ. शिव गौतम के अनुसार, नीट-यूजी के दोबारा आयोजन से छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव बढ़ा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार इस बार पेपर लीक रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही है, जिससे राहत की उम्मीद है।
परीक्षा काल में राजनीतिक सभाओं का आयोजन उचित है?
डॉ. शिव गौतम ने परीक्षा से पहले राजनीतिक सभाओं के आयोजन पर चिंता जताई और कहा कि राजनीतिक दलों को छात्रों के हितों को चुनावी हितों से ऊपर रखना चाहिए। डॉ. मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि आयोजन का मकसद परीक्षा बाधित करना है, तो वह उचित नहीं है।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेषज्ञ क्या सुझाव देते हैं?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि अभिभावक बच्चों की रुचि और क्षमता को समझें और उन पर विषय न थोपें। परीक्षार्थियों को राजनीतिक आयोजनों से दूरी बनाए रखनी चाहिए और शिक्षा-तंत्र को भी व्यवस्थागत सुधार की दिशा में काम करना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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