11 अगस्त 2026
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मध्य प्रदेश डेयरी घोटाला: दलित-आदिवासियों की सब्सिडी दबंगों ने हड़पी, उमंग सिंघार का बड़ा आरोप

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मध्य प्रदेश डेयरी घोटाला: दलित-आदिवासियों की सब्सिडी दबंगों ने हड़पी, उमंग सिंघार का बड़ा आरोप

सारांश

मध्य प्रदेश में दलित-आदिवासियों के नाम पर डेयरी सब्सिडी की लूट का आरोप — नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के मुताबिक भैंसें लाभार्थियों के घर नहीं, दबंगों के यहाँ मिलीं। पशुपालन मंत्री के क्षेत्र में हुई कथित गड़बड़ी ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

मुख्य बातें

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 20 जून को मध्य प्रदेश में डेयरी घोटाले का आरोप लगाया।
मुख्यमंत्री डेयरी योजना में SC/ST हितग्राहियों को प्रति यूनिट ₹2.23 लाख सब्सिडी मिलती है, जो सामान्य वर्ग से ₹74,000 अधिक है।
आरोप है कि लाभार्थियों के नाम पर सब्सिडी ली गई, लेकिन भैंसें दबंगों के यहाँ मिलीं।
कई मामलों में लाभार्थी को अपनी डेयरी की जानकारी तक नहीं; सूची में ऐसे नाम जो गाँव में रहते ही नहीं।
कथित घोटाला पशुपालन मंत्री लखन पटेल के विधानसभा क्षेत्र में होने का आरोप।
राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं।

मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 20 जून को राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री डेयरी योजना के तहत दलितों और आदिवासियों के नाम पर आवंटित सब्सिडी का असली फायदा प्रभावशाली दबंगों ने उठाया है। उनके अनुसार यह कोई छिटपुट गड़बड़ी नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के हितग्राहियों के अधिकारों की सुनियोजित लूट है।

घोटाले की संरचना

मुख्यमंत्री डेयरी योजना के अंतर्गत दो भैंसों की एक यूनिट पर अनुसूचित जाति और जनजाति के हितग्राहियों को करीब ₹2.23 लाख की सब्सिडी मिलती है, जबकि सामान्य वर्ग को मात्र ₹1.49 लाख। इस प्रकार प्रति यूनिट लगभग ₹74,000 की अतिरिक्त सब्सिडी का प्रावधान है, जो विशेष रूप से वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए रखी गई है।

सिंघार के आरोपों के अनुसार, कई मामलों में दलित-आदिवासी लाभार्थियों के नाम पर सब्सिडी तो ले ली गई, किंतु भैंसें उनके घरों में नहीं, बल्कि रसूखदार व्यक्तियों के यहाँ मिलीं।

ज़मीनी हकीकत के चौंकाने वाले उदाहरण

नेता प्रतिपक्ष ने कई विशिष्ट स्थितियों का हवाला दिया। कहीं लाभार्थी मजदूरी कर रहा है और उसे अपनी डेयरी की कमाई का कोई ज्ञान नहीं। कहीं घर में पशु रखने की बुनियादी व्यवस्था तक नहीं है। कहीं पत्नी को यह भी नहीं पता कि उसके पति के नाम पर भैंस खरीदी गई। और कहीं लाभार्थी सूची में ऐसे नाम दर्ज हैं जो उस गाँव में रहते ही नहीं।

सिंघार ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि यह सब कथित तौर पर राज्य के पशुपालन मंत्री लखन पटेल के विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है, जिससे मामले की राजनीतिक संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।

सरकार पर सवाल

सिंघार ने कहा कि असली सवाल केवल यह नहीं है कि भैंसें कहाँ गईं, बल्कि यह है कि दलित-आदिवासियों के नाम पर करोड़ों की सब्सिडी हड़पने वालों को संरक्षण कौन दे रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में गरीब केवल कागज़ों में मालिक है, जबकि असली लाभ प्रभावशाली लोग उठा रहे हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। गौरतलब है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारें वंचित वर्गों के लिए पशुपालन को आजीविका का प्रमुख साधन बताती हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ज़मीनी निगरानी तंत्र की कमज़ोरी ऐसे फर्जीवाड़े को पनपने देती है।

आगे क्या होगा

सिंघार ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह आरोप सार्वजनिक किए हैं और राज्य सरकार से जवाब माँगा है। अभी तक राज्य सरकार या पशुपालन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस मामले में विधानसभा में भी जवाबदेही की माँग उठने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जब सत्यापन तंत्र कागज़ी हो, तो यही अतिरिक्त राशि फर्जीवाड़े का प्रलोभन बन जाती है। मामले का केंद्र पशुपालन मंत्री के अपने क्षेत्र में होना राजनीतिक जवाबदेही का सीधा सवाल खड़ा करता है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर आरोप तक सीमित रहती है, लेकिन असली जाँच यह होनी चाहिए कि क्या विभाग के पास फील्ड-वेरिफिकेशन का कोई स्वतंत्र ढाँचा है — और यदि नहीं, तो यह घटना अकेली नहीं होगी।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश डेयरी घोटाला क्या है?
आरोप है कि मुख्यमंत्री डेयरी योजना के तहत दलित और आदिवासी हितग्राहियों के नाम पर सब्सिडी ली गई, लेकिन भैंसें उनके घरों में नहीं, बल्कि प्रभावशाली दबंगों के यहाँ मिलीं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इसे अनुसूचित जाति-जनजाति के अधिकारों की सुनियोजित लूट बताया है।
मुख्यमंत्री डेयरी योजना में SC/ST को कितनी सब्सिडी मिलती है?
योजना के अंतर्गत दो भैंसों की एक यूनिट पर अनुसूचित जाति और जनजाति के हितग्राहियों को करीब ₹2.23 लाख की सब्सिडी मिलती है, जबकि सामान्य वर्ग को ₹1.49 लाख। यह अंतर प्रति यूनिट लगभग ₹74,000 का है।
उमंग सिंघार ने यह आरोप कब और कहाँ लगाए?
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 20 जून को सोशल मीडिया के माध्यम से यह आरोप सार्वजनिक किए। उन्होंने विशेष रूप से पशुपालन मंत्री लखन पटेल के विधानसभा क्षेत्र में हुई कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया।
इस कथित घोटाले से कौन प्रभावित हुआ है?
इस कथित फर्जीवाड़े से सीधे तौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति के वे गरीब परिवार प्रभावित हुए हैं जिनके नाम पर सब्सिडी ली गई, लेकिन उन्हें न पशु मिले, न आजीविका का लाभ। कई मामलों में लाभार्थियों को अपने नाम पर हुए आवंटन की जानकारी तक नहीं थी।
राज्य सरकार ने इन आरोपों पर क्या कहा?
अब तक मध्य प्रदेश सरकार या पशुपालन विभाग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मामले की जाँच और विधानसभा में जवाबदेही की माँग उठने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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