29 अक्टूबर 2026
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दिल्ली पुलिस ने बैंक धोखाधड़ी गिरोह का भंडाफोड़ किया, दो गिरफ्तार; ₹2.50 करोड़ की संपत्ति जब्त

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दिल्ली पुलिस ने बैंक धोखाधड़ी गिरोह का भंडाफोड़ किया, दो गिरफ्तार; ₹2.50 करोड़ की संपत्ति जब्त

सारांश

दिल्ली पुलिस ने एक संगठित बैंक धोखाधड़ी गिरोह का पर्दाफाश किया है जो फर्जी ईमेल, जाली लेटरहेड और सोशल इंजीनियरिंग से RTGS ट्रांसफर करवाता था। दो गिरफ्तार आरोपियों में एक सात साल से फरार 'घोषित अपराधी' भी शामिल है, और इस कार्रवाई से छह अन्य राज्यों के मामले भी सुलझे।

मुख्य बातें

दिल्ली पुलिस ने 29 अक्टूबर 2026 को फर्जी RTGS निर्देशों से बैंक धोखाधड़ी करने वाले गिरोह के दो सदस्यों को गिरफ्तार किया।
गिरफ्तार आरोपी हैं — विनय कुमार यादव (36) , गाजियाबाद और अनिल कुमार सहगल (65) , नोएडा।
₹2.50 करोड़ की संपत्ति जब्त — जिसमें 101 सोने के सिक्के , आभूषण, नकद और एक एसयूवी शामिल।
राजेंद्र प्लेस स्थित बैंक ऑफ इंडिया शाखा से ₹22,56,922 की ठगी की गई थी।
एक आरोपी सात वर्षों से अधिक समय से नकली नोट मामले में फरार 'घोषित अपराधी' था।
इन गिरफ्तारियों से गुरुग्राम, पलवल और दिल्ली के 6 अन्य धोखाधड़ी मामले सुलझे।

दिल्ली पुलिस ने 29 अक्टूबर 2026 को बैंक खाताधारकों का रूप धारण कर फर्जी RTGS (रियल-टाइम ग्रॉस सेटलमेंट) निर्देशों के ज़रिए ₹22.56 लाख की ठगी करने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार करते हुए ₹2.50 करोड़ से अधिक मूल्य की संपत्ति — जिसमें सोने के आभूषण, 101 सोने के सिक्के, नकद और एक एसयूवी शामिल हैं — जब्त की है।

मुख्य घटनाक्रम

यह मामला राजेंद्र प्लेस स्थित बैंक ऑफ इंडिया की शाखा से जुड़ा है। शाखा प्रबंधक की शिकायत के अनुसार, 5 अगस्त को एक अज्ञात व्यक्ति ने स्वयं को दीपक मल्होत्रा बताकर बैंक अधिकारियों से संपर्क किया। दीपक मल्होत्रा उन कई कंपनियों के निदेशक हैं जिनके खाते इसी शाखा में हैं।

आरोपी ने पहले ₹1 करोड़ की फिक्स्ड डिपॉजिट रिसिप्ट (FDR) बनवाने की बात करके बैंक अधिकारियों का विश्वास अर्जित किया। इसके बाद उसने दावा किया कि कंपनी को एक ज़रूरी भुगतान करना है, परंतु चेकबुक समाप्त हो गई है, इसलिए ईमेल के माध्यम से लेनदेन पूरा किया जाए।

ठगी का तरीका

आरोपी ने कंपनी के पंजीकृत ईमेल पते से मिलता-जुलता एक फर्जी ईमेल पता बनाया और उस पर कंपनी का जाली लेटरहेड लगाकर ₹22,56,922 किसी अन्य खाते में ट्रांसफर करने का निर्देश भेजा। जब बैंक अधिकारियों ने क्षतिपूर्ति (इंडेम्निटी) दस्तावेज़ माँगे, तो फोन करने वाले ने दबाव डालते हुए कहा कि पहले भी ऐसे लेनदेन हो चुके हैं और भुगतान अत्यंत ज़रूरी है। इस दबाव में आकर बैंक ने वह फर्जी RTGS ट्रांसफर कर दिया।

पुलिस जाँच में सामने आया कि ठगी की गई रकम पश्चिम बंगाल के बंधन बैंक में खोले गए एक 'म्यूल' खाते में भेजी गई थी। टेलीकॉम रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य और बातचीत के तकनीकी विश्लेषण की मदद से जाँचकर्ताओं ने दोनों संदिग्धों की पहचान की।

आरोपियों की पहचान और आपराधिक पृष्ठभूमि

गिरफ्तार आरोपियों में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद (लोनी) निवासी 36 वर्षीय विनय कुमार यादव और नोएडा निवासी 65 वर्षीय अनिल कुमार सहगल शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, इनकी जान-पहचान जेल में रहने के दौरान हुई थी।

उल्लेखनीय है कि इनमें से एक आरोपी 'घोषित अपराधी' की श्रेणी में है, जो नकली नोटों से जुड़े एक मामले में सात वर्षों से अधिक समय से फरार चल रहा था। दोनों आरोपी इससे पहले गाजियाबाद, सहारनपुर, अयोध्या और फरीदाबाद में वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में भी संलिप्त रहे हैं। पूर्व में ये 'मैजिक पेन' से चेक में हेरफेर करने की धोखाधड़ी में भी शामिल थे।

ठगी का नेटवर्क और जब्त संपत्ति

जाँच से पता चला है कि गिरोह कॉर्पोरेट बैंक लेनदेन को निशाना बनाने के लिए फर्जी कंपनी लेटरहेड, धोखेपूर्ण ईमेल पते, सोशल इंजीनियरिंग और म्यूल खातों का व्यवस्थित रूप से उपयोग करता था। ठगी की रकम को अन्य संपत्तियों में — विशेषतः पश्चिम बंगाल के एक जौहरी से खरीदे गए सोने में — निवेश कर दिया जाता था।

इन गिरफ्तारियों से गुरुग्राम, पलवल और दिल्ली में दर्ज छह अन्य धोखाधड़ी के मामलों को सुलझाने में भी मदद मिली है, जिनमें ₹16.65 लाख से लेकर ₹2.98 करोड़ तक की ठगी शामिल है। इसके अलावा ₹88 लाख की धोखाधड़ी की एक असफल कोशिश भी इन्हीं से जुड़ी पाई गई है।

आगे क्या होगा

दोनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और पुलिस गिरोह के अन्य संभावित सदस्यों की तलाश कर रही है। यह मामला उस बढ़ती प्रवृत्ति को रेखांकित करता है जिसमें संगठित साइबर ठग कॉर्पोरेट बैंकिंग प्रणाली की खामियों का फायदा उठाने के लिए परिष्कृत सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों का सहारा लेते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो परंपरागत चेक फर्जीवाड़े से कहीं अधिक परिष्कृत है। सात राज्यों और शहरों में फैले मामले बताते हैं कि यह एकल घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ऑपरेशन था। असली सवाल यह है कि बैंकों के पास ईमेल-आधारित भुगतान अनुरोधों के सत्यापन के लिए पर्याप्त द्वि-स्तरीय प्रमाणीकरण क्यों नहीं था — और इस कमज़ोरी का कितने और मामलों में दुरुपयोग हो चुका है।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली पुलिस ने किस गिरोह का पर्दाफाश किया है?
दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का भंडाफोड़ किया है जो फर्जी ईमेल, जाली कंपनी लेटरहेड और सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए बैंकों से RTGS ट्रांसफर करवाता था। राजेंद्र प्लेस स्थित बैंक ऑफ इंडिया शाखा से ₹22.56 लाख की ठगी इसी तरीके से की गई थी।
गिरफ्तार आरोपी कौन हैं और इनकी पृष्ठभूमि क्या है?
गिरफ्तार आरोपियों में गाजियाबाद (लोनी) निवासी 36 वर्षीय विनय कुमार यादव और नोएडा निवासी 65 वर्षीय अनिल कुमार सहगल शामिल हैं। पुलिस के अनुसार दोनों की जान-पहचान जेल में हुई थी और इनमें से एक नकली नोट मामले में सात वर्षों से अधिक समय से फरार 'घोषित अपराधी' था।
इस बैंक धोखाधड़ी में क्या तरीका अपनाया गया था?
आरोपी कंपनी के असली ईमेल पते से मिलता-जुलता फर्जी ईमेल पता बनाकर, उस पर जाली कंपनी लेटरहेड का इस्तेमाल कर बैंक को RTGS ट्रांसफर के लिए निर्देश भेजते थे। इसके साथ सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए बैंक अधिकारियों पर दबाव डाला जाता था और ठगी की रकम म्यूल खातों में भेजकर सोने में निवेश कर दी जाती थी।
जब्त की गई संपत्ति में क्या-क्या शामिल है?
पुलिस ने कुल ₹2.50 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त की है, जिसमें सोने के आभूषण, 101 सोने के सिक्के, नकद राशि और एक एसयूवी शामिल हैं। यह सोना पश्चिम बंगाल के एक जौहरी से खरीदा गया था।
इन गिरफ्तारियों से कितने अन्य मामले सुलझे हैं?
इन दो गिरफ्तारियों से गुरुग्राम, पलवल और दिल्ली में दर्ज छह अन्य धोखाधड़ी के मामले सुलझाने में मदद मिली है। इन मामलों में ₹16.65 लाख से ₹2.98 करोड़ तक की ठगी और ₹88 लाख की ठगी की एक असफल कोशिश भी शामिल है।
राष्ट्र प्रेस
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