जनसांख्यिकीय परिवर्तन समिति अवैध घुसपैठियों के निर्वासन कानूनों पर देगी सिफारिशें: न्यायमूर्ति नावलेकर
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 27 मई को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) ने स्पष्ट किया कि 'जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्च स्तरीय समिति' अवैध घुसपैठियों की हिरासत और निर्वासन के लिए उपयुक्त कानूनी ढाँचे पर सरकार को सिफारिशें देगी। न्यायमूर्ति नावलेकर को इस सात सदस्यीय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में होगा।
समिति का कार्यक्षेत्र
न्यायमूर्ति नावलेकर ने बताया कि समिति पूरे देश की जनसंख्या जनसांख्यिकी — विशेष रूप से सीमावर्ती जिलों, शहरों और आदिवासी क्षेत्रों — में हो रहे परिवर्तनों का गहन अध्ययन करेगी। उन्होंने कहा, 'यही हमारा कार्यक्षेत्र होगा।' समिति केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रव्यापी जनसांख्यिकीय रुझानों का समग्र मूल्यांकन करेगी।
उन्होंने आगे स्पष्ट किया, 'इसके बाद हम जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारणों की पहचान करेंगे।' समिति किसी भी केंद्रीय मंत्रालय, राज्य सरकार या सरकारी एजेंसी से आवश्यक जानकारी और डेटा माँगने का अधिकार रखती है।
निर्वासन कानूनों पर सिफारिशें
न्यायमूर्ति नावलेकर ने कहा, 'हम अवैध आप्रवासन, अवैध घुसपैठियों की हिरासत और निर्वासन के लिए एक उचित प्रणाली का सुझाव देंगे। हम इस बात पर विचार करेंगे कि ऐसे घुसपैठियों के निर्वासन के लिए किस प्रकार और कौन से कानून बनाए जाएं।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि समिति की भूमिका केवल सलाहकारी है — अंतिम निर्णय सरकार और संसद का होगा।
उन्होंने कहा, 'समिति सिफारिशों पर फैसला करेगी। समिति की रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी। सरकार समिति की रिपोर्ट का कितना हिस्सा लागू करती है, यह सरकार पर निर्भर करेगा।' साथ ही उन्होंने जोड़ा, 'संसद द्वारा पारित होने के बाद सरकार कानून बनाएगी।'
समिति का गठन और समयसीमा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार, 27 मई को इस उच्च स्तरीय समिति के गठन की घोषणा की थी। समिति का उद्देश्य देश में अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन उत्पन्न करने वाली घुसपैठ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए नीतिगत रोडमैप तैयार करना है।
न्यायमूर्ति नावलेकर ने बताया कि समिति को एक वर्ष के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। यदि रिपोर्ट छह महीने में नहीं आती, तो समयसीमा अतिरिक्त छह महीने के लिए बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल समिति में सात सदस्य हैं।
व्यापक संदर्भ
यह समिति ऐसे समय में गठित की गई है जब सीमावर्ती राज्यों में अवैध प्रवासन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन की प्रक्रिया भारत में दशकों से कानूनी और प्रशासनिक जटिलताओं से घिरी रही है। समिति की सिफारिशें इस दिशा में एक ठोस नीतिगत आधार प्रदान कर सकती हैं।
आगे की राह
समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने के बाद केंद्र सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर संसद में नए कानून या संशोधन लाए जा सकते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समिति की सिफारिशें किस हद तक मौजूदा संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप होती हैं।