दिशा सालियान केस: CBI को सौंपा जाएगा पेनड्राइव और डिजिटल साक्ष्य, वकील नीलेश ओझा का दावा
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई में दिशा सालियान केस में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की एफआईआर दर्ज होने के बाद दिशा के पिता सतीश सालियान के वकील नीलेश ओझा ने 15 सितंबर 2026 को दावा किया कि हाईकोर्ट के आदेश से ही इस मामले के करीब 80 प्रतिशत पहलू स्पष्ट हो चुके हैं। ओझा के अनुसार, एक प्रत्यक्षदर्शी से जुड़ा पेनड्राइव और अन्य डिजिटल साक्ष्य जल्द ही कवरिंग लेटर के साथ सीबीआई को सौंपे जाएंगे।
हाईकोर्ट के आदेश में उठे 10 बड़े सवाल
वकील नीलेश ओझा ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कुल 10 बिंदुओं का उल्लेख है, जिनसे पुलिस की पूर्व जांच रिपोर्ट पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि सतीश सालियान ने अपने बयान में कई महत्वपूर्ण तथ्य विस्तार से बताए हैं, जिनका उल्लेख एफआईआर में भी किया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ पूरक सामग्री भी मौजूद है, जिसे जांच एजेंसी को सौंपने की तैयारी चल रही है।
ओझा ने कहा कि यह डिजिटल साक्ष्य आदित्य ठाकरे और अन्य लोगों से जुड़े आरोपों की जांच में अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि सीबीआई के पास पहले से ही इस मामले से संबंधित पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।
प्रत्यक्षदर्शी और पुलिस भूमिका पर आरोप
ओझा ने दावा किया कि एक कथित प्रत्यक्षदर्शी ने शुरुआत से ही पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उस प्रत्यक्षदर्शी ने कथित तौर पर यह भी कहा था कि 'प्रभावशाली लोगों के खिलाफ लड़ना मुश्किल होगा।' ओझा ने पूर्व पुलिस अधिकारियों और पुलिस व्यवस्था से जुड़े कुछ लोगों पर भी गंभीर आरोप लगाए, हालांकि उन्होंने जांच प्रभावित होने की आशंका के चलते कई विवरण सार्वजनिक करने से परहेज किया।
ओझा ने दिशा के बचपन के दो मित्रों का भी जिक्र किया और कहा कि सतीश सालियान का उन दोनों से पारिवारिक जुड़ाव रहा है, क्योंकि वे बचपन से दिशा के घर आते-जाते थे।
सचिन वाझे और परमबीर सिंह का संदर्भ
वकील ने बताया कि सचिन वाझे की ओर से पहले भी गवाह बनने का प्रस्ताव आया था। वाझे ने कथित तौर पर दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत मामलों से जुड़ी जानकारी होने का दावा किया था। ओझा के अनुसार, 25 अगस्त को एनआईए कोर्ट में हुई कार्यवाही के दौरान वाझे से संबंधित कुछ तथ्य सामने आए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि वाझे ने पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के कथित निर्देशों का उल्लेख किया था।
गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले और दिशा सालियान केस को लेकर पहले से ही सार्वजनिक बहस चलती रही है, और सीबीआई की एफआईआर दर्ज होना इस दिशा में एक नया मोड़ माना जा रहा है।
जांच की पद्धति पर ओझा का सुझाव
ओझा ने जांच के तरीके पर अपनी राय रखते हुए कहा कि यदि वे जांच अधिकारी होते, तो घटनास्थल पर उपस्थित सभी व्यक्तियों और सुरक्षाकर्मियों से अलग-अलग पूछताछ करते। उनके अनुसार, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पुराने बयानों में विरोधाभास मिलने पर संबंधित व्यक्तियों से पूछा जाना चाहिए कि वे गवाह बनकर सच बताना चाहते हैं या आरोपी के रूप में जांच का सामना करना चाहते हैं।
ओझा ने अंत में जोर देते हुए कहा कि उपलब्ध सामग्री तत्काल सीबीआई को सौंपना ज़रूरी है ताकि एजेंसी स्वतंत्र रूप से और बिना किसी दबाव के जांच आगे बढ़ा सके। आने वाले दिनों में सीबीआई की कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा कि यह डिजिटल साक्ष्य मामले की दिशा को किस हद तक बदलते हैं।