1 अक्टूबर 2026
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ईडी ने कोलकाता से सोहेल अख्तर को गिरफ्तार किया, ₹7 करोड़ के डिजिटल अरेस्ट मामले में तीसरा आरोपी दबोचा

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ईडी ने कोलकाता से सोहेल अख्तर को गिरफ्तार किया, ₹7 करोड़ के डिजिटल अरेस्ट मामले में तीसरा आरोपी दबोचा

सारांश

सीबीआई अधिकारी और जज का रूप धरकर ₹7 करोड़ ठगने वाले गिरोह का एक और सदस्य ईडी के शिकंजे में। कोलकाता से सोहेल अख्तर की गिरफ्तारी के साथ इस अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क में तीसरा आरोपी दबोचा गया, जो नेपाल, कंबोडिया और वियतनाम तक फैला था।

मुख्य बातें

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 1 अक्टूबर 2026 को कोलकाता से सोहेल अख्तर उर्फ राजू को गिरफ्तार किया — यह इस मामले में तीसरी गिरफ्तारी है।
मामला लुधियाना के एसपी ओसवाल के साथ हुए ₹7 करोड़ के 'डिजिटल अरेस्ट' से जुड़ा है, जिसमें गिरोह ने सीबीआई अधिकारी और जज बनकर ठगी की।
इससे पहले रूमी कलिता ( 23 दिसंबर 2025 ) और अर्पित राठौर ( 31 दिसंबर 2025 ) गिरफ्तार हो चुके हैं।
अख्तर को 6 अक्टूबर 2026 तक ईडी की हिरासत में भेजा गया है।
₹1.76 करोड़ की अपराध से हुई कमाई के विरुद्ध 14 फरवरी 2026 को प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी हुआ; 19 फरवरी 2026 को चार्जशीट दाखिल।
गिरोह ने नेपाल, कंबोडिया और वियतनाम में साथियों के साथ मिलकर क्रिप्टोकरेंसी और म्यूल बैंक खातों के ज़रिए धन शोधन किया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 1 अक्टूबर 2026 को कोलकाता से साइबर अपराधी सोहेल अख्तर उर्फ राजू को गिरफ्तार किया — यह पंजाब के लुधियाना निवासी एसपी ओसवाल के साथ हुए ₹7 करोड़ के 'डिजिटल अरेस्ट' मामले में दर्ज तीसरी गिरफ्तारी है। गिरोह ने सीबीआई अधिकारी और न्यायाधीश का रूप धरकर पीड़ित को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखा और करोड़ों रुपए ऐंठ लिए।

गिरफ्तारी और तलाशी अभियान

ईडी के जालंधर जोनल ऑफिस ने 28 सितंबर 2026 को पश्चिम बंगाल में तीन स्थानों पर 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002' के प्रावधानों के तहत छापेमारी की। इसी अभियान के दौरान अख्तर को हिरासत में लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उसे जालंधर के अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश के समक्ष पेश किया गया, जिन्होंने उसे 6 अक्टूबर 2026 तक ईडी की हिरासत में भेज दिया।

मुख्य घटनाक्रम: कैसे हुई ₹7 करोड़ की ठगी

ईडी के अनुसार, धोखाधड़ी करने वालों ने सीबीआई और न्यायपालिका के अधिकारी बनकर पीड़ित एसपी ओसवाल को 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर मनोवैज्ञानिक रूप से बंधक बनाए रखा और ₹7 करोड़ की रकम अपने खातों में ट्रांसफर करा ली। अपराध से मिली यह रकम शुरुआत में 'रिग्लो वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड' और 'फ्रोजनमैन वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स' कंपनियों के बैंक खातों में जमा की गई।

रकम को तेज़ी से इधर-उधर भेजने के लिए 'एएमएम फॉरवर्ड' नाम के एपीके एप्लिकेशन का उपयोग किया गया। इन खातों से जुड़े सिम कार्ड ऐसे मोबाइल फोन में डाले गए, जिनमें पहले से एपीके फाइलें डाउनलोड थीं — जिससे नेपाल में मौजूद विदेशी साथियों को ओटीपी और एसएमएस संदेश सीधे मिल सके।

म्यूल अकाउंट नेटवर्क और क्रिप्टोकरेंसी की भूमिका

ईडी की जांच में सामने आया कि अख्तर रिग्लो वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खातों को नियंत्रित और संचालित करता था। वह आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को लोन दिलाने या नौकरी देने का झूठा वादा करके उनके नाम पर 'म्यूल बैंक अकाउंट' खुलवाने का काम करता था।

अपराध से प्राप्त रकम को ₹2 लाख से ₹5 लाख तक की छोटी-छोटी किश्तों में अलग-अलग म्यूल खातों में ट्रांसफर कर तुरंत नकद निकाल लिया जाता था। यह नकद वर्चुअल डिजिटल एसेट (क्रिप्टोकरेंसी) खरीदने में लगाया जाता था और कमीशन काटकर विदेशी नागरिकों के बाइनेंस (Binance) अकाउंट में जमा किया जाता था। विदेश में साथियों से संपर्क के लिए एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मोबाइल मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल होता था।

गौरतलब है कि इस गिरोह से कंबोडिया और वियतनाम में रहने वाले लोग भी जुड़े थे, जो म्यूल खाते संचालित करते थे — यह भारतीय साइबर अपराध के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ाव का एक और उदाहरण है।

पहले के आरोपी और कानूनी कार्रवाई

इस मामले में अख्तर से पहले दो आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं — गुवाहाटी के रूमी कलिता को 23 दिसंबर 2025 को और कानपुर के अर्पित राठौर को 31 दिसंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। रिग्लो वेंचर्स और फ्रोजनमैन वेयरहाउसिंग के खातों को क्रमशः कलिता और राठौर नियंत्रित करते थे।

14 फरवरी 2026 को ₹1.76 करोड़ की अपराध से हुई कमाई के विरुद्ध एक प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया गया। 19 फरवरी 2026 को कलिता, राठौर, आनंद चौधरी, अतानु चौधरी और फ्रोजनमैन वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

ईडी की जांच का आधार लुधियाना के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत दर्ज एफआईआर है। जांच के दायरे में इसी गिरोह से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के नौ अतिरिक्त मामले भी शामिल हैं।

आगे क्या होगा

अख्तर 6 अक्टूबर 2026 तक ईडी की न्यायिक हिरासत में रहेगा, जिसके बाद अदालत अगली कार्रवाई तय करेगी। ईडी के अनुसार जांच अभी जारी है और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संदिग्धों की पहचान की प्रक्रिया चल रही है। यह मामला डिजिटल अरेस्ट की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ एजेंसियों की सक्रियता को दर्शाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

कंबोडिया और वियतनाम तक फैली हैं और क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिए रकम सीमाओं के पार भेजी गई — जो पारंपरिक वित्तीय निगरानी की सीमाओं को उजागर करता है। ₹1.76 करोड़ की संपत्ति कुर्क होना ₹7 करोड़ की ठगी के मुकाबले बेहद कम है, जो यह सवाल उठाता है कि बाकी रकम की वसूली कब और कैसे होगी। जब तक म्यूल अकाउंट भर्ती और क्रिप्टो-आधारित लेनदेन पर कड़ा कानूनी ढाँचा नहीं बनता, ऐसे गिरोह नए नेटवर्क बनाते रहेंगे।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है और एसपी ओसवाल के साथ क्या हुआ?
डिजिटल अरेस्ट एक साइबर ठगी का तरीका है जिसमें अपराधी पुलिस, सीबीआई या न्यायाधीश बनकर पीड़ित को वीडियो कॉल या फोन पर मनोवैज्ञानिक दबाव में रखते हैं और धमकाकर पैसे ट्रांसफर कराते हैं। लुधियाना के एसपी ओसवाल के मामले में गिरोह ने इसी तरीके से ₹7 करोड़ की रकम ठग ली।
सोहेल अख्तर को ईडी ने क्यों गिरफ्तार किया?
ईडी की जांच में पाया गया कि सोहेल अख्तर 'रिग्लो वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड' के बैंक खातों को नियंत्रित करता था और लोगों को झूठे वादे देकर म्यूल बैंक अकाउंट खुलवाने में मुख्य भूमिका निभाता था। वह अपराध से प्राप्त धन को क्रिप्टोकरेंसी के रूप में विदेशी साथियों तक पहुँचाता था।
इस मामले में अब तक कितने आरोपी गिरफ्तार हुए हैं?
अब तक तीन आरोपी गिरफ्तार हुए हैं — रूमी कलिता (23 दिसंबर 2025), अर्पित राठौर (31 दिसंबर 2025), और सोहेल अख्तर (1 अक्टूबर 2026)। इसके अलावा 19 फरवरी 2026 को आनंद चौधरी, अतानु चौधरी और फ्रोजनमैन वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स के खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।
ईडी ने इस मामले में कितनी संपत्ति कुर्क की है?
ईडी ने 14 फरवरी 2026 को ₹1.76 करोड़ की अपराध से हुई कमाई के विरुद्ध प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया है। यह रकम मूल ₹7 करोड़ की ठगी के मुकाबले अभी आंशिक है और जांच अभी जारी है।
इस साइबर ठगी में क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल कैसे हुआ?
ठगी की रकम को पहले म्यूल बैंक खातों में ₹2 लाख से ₹5 लाख की छोटी किश्तों में भेजा जाता था, फिर नकद निकालकर वर्चुअल डिजिटल एसेट (क्रिप्टोकरेंसी) खरीदी जाती थी। यह क्रिप्टोकरेंसी कमीशन काटकर कंबोडिया और वियतनाम में रहने वाले विदेशी साथियों के बाइनेंस अकाउंट में जमा कर दी जाती थी।
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