21 जुलाई 2026
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कावेरी जल बंटवारे पर ईपीएस का तमिलनाडु सरकार को अल्टीमेटम, 22 जुलाई की CWMA बैठक से पहले बढ़ा दबाव

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कावेरी जल बंटवारे पर ईपीएस का तमिलनाडु सरकार को अल्टीमेटम, 22 जुलाई की CWMA बैठक से पहले बढ़ा दबाव

सारांश

22 जुलाई की CWMA बैठक से ठीक पहले AIADMK के पलानीस्वामी ने तमिलनाडु सरकार को घेरा — जून में 9.19 TMC फीट के मुकाबले केवल 2.91 TMC फीट पानी मिला, जुलाई का 31.24 TMC फीट भी लटका है, और कुरुवाई फसल खतरे में है। कावेरी विवाद एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में।

मुख्य बातें

AIADMK महासचिव एडप्पाडी के.
पलानीस्वामी ने 20 जुलाई को तमिलनाडु सरकार से 22 जुलाई की CWMA बैठक में कर्नाटक पर कड़ा दबाव बनाने की माँग की।
जून में देय 9.19 TMC फीट में से केवल 2.91 TMC फीट पानी छोड़ा गया; जुलाई का 31.24 TMC फीट भी लंबित है।
कर्नाटक पर प्रतिवर्ष 177.25 TMC फीट पानी छोड़ने का दायित्व है — सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार।
पलानीस्वामी ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के 'जलाशय भरने के बाद पानी देने' वाले बयान को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विपरीत बताया।
कावेरी डेल्टा के 20 से अधिक जिलों की पेयजल आपूर्ति और कुरुवाई फसल के हजारों किसान परिवार प्रभावित।

अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) के महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने 20 जुलाई को तमिलनाडु सरकार से आग्रह किया कि वह 22 जुलाई को होने वाली कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की बैठक में कर्नाटक पर कड़ा दबाव बनाए, ताकि राज्य को जून और जुलाई दोनों महीनों का कावेरी नदी का पूरा जल-हिस्सा मिल सके। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ सरकार किसानों के हितों और राज्य के जल अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है।

जल आवंटन में भारी कमी

पलानीस्वामी ने अपने बयान में आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कर्नाटक पर प्रतिवर्ष तमिलनाडु को 177.25 हजार मिलियन घन फुट (TMC फीट) पानी छोड़ने का दायित्व है। उन्होंने दावा किया कि जून में देय 9.19 TMC फीट में से केवल 2.91 TMC फीट पानी ही छोड़ा गया — यानी तय मात्रा का एक-तिहाई से भी कम। इसके अतिरिक्त, जुलाई में 31.24 TMC फीट पानी छोड़ा जाना था, लेकिन जून की कमी और जुलाई का आवंटन दोनों ही काफी हद तक लंबित हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी का आरोप

पलानीस्वामी ने कहा कि CWMA और कावेरी जल विनियमन समिति का गठन सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत इसीलिए किया गया था ताकि कर्नाटक निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हर महीने तमिलनाडु को पानी छोड़े। उन्होंने आरोप लगाया कि यद्यपि प्राधिकरण ने पिछले महीने कर्नाटक को मासिक आवंटन जारी करने का निर्देश दिया था, न तो प्राधिकरण ने उस आदेश का पालन कराया और न ही तमिलनाडु सरकार ने इसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त दबाव बनाया।

उन्होंने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस हालिया बयान की भी कड़ी आलोचना की, जिसमें उन्होंने कहा था कि कर्नाटक के जलाशयों के भर जाने के बाद ही पानी छोड़ा जाएगा। पलानीस्वामी ने इस रुख को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और अंतर-राज्यीय जल बंटवारे को नियंत्रित करने वाले स्थापित दिशानिर्देशों के विपरीत बताया और कहा कि ऐसा दृष्टिकोण कानून के शासन को कमजोर करता है।

किसानों और आम जनता पर असर

AIADMK नेता ने रेखांकित किया कि कावेरी डेल्टा के किसानों की आजीविका और 20 से अधिक जिलों में लाखों लोगों की पेयजल आवश्यकताएँ इस नदी पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी और देरी से कुरुवाई की खेती और हजारों किसान परिवारों तथा कृषि श्रमिकों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित होगी। गौरतलब है कि कुरुवाई तमिलनाडु की एक प्रमुख अल्पकालिक धान फसल है, जो जून-जुलाई में बोई जाती है और जल-आपूर्ति पर पूरी तरह निर्भर रहती है।

सरकार पर राजनीतिक हमला

पलानीस्वामी ने तमिलनाडु की सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि उसने सत्ता संभालने के बाद सहकारी कृषि ऋण माफी के अपने चुनावी वादे को कमजोर कर दिया — घोषित राहत को सीमित करके, जिससे कई किसान असंतुष्ट हैं। उनके अनुसार, लंबित जल निकासी के लिए कर्नाटक पर दबाव न डालना डेल्टा क्षेत्र के किसानों के साथ विश्वासघात है।

आगे क्या होगा

22 जुलाई को होने वाली CWMA की बैठक इस विवाद में एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगी। पलानीस्वामी ने राज्य सरकार से माँग की है कि वह इस बैठक में कर्नाटक पर कड़ा दबाव बनाए और जून तथा जुलाई दोनों महीनों का बकाया जल-हिस्सा सुनिश्चित करे। यह ऐसे समय में आया है जब कावेरी जल विवाद दशकों से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है, और सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार के हस्तक्षेप के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अनुपालन अधूरा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यानी 68% की कमी। असली सवाल यह है कि CWMA जैसे संस्थागत तंत्र के बावजूद अनुपालन इतना कमजोर क्यों है। सर्वोच्च न्यायालय के दशकों के हस्तक्षेप और स्थायी प्राधिकरण के गठन के बाद भी यदि मासिक जल-आवंटन लागू नहीं हो पा रहा, तो समस्या केवल कर्नाटक की राजनीतिक इच्छाशक्ति में नहीं — बल्कि प्रवर्तन तंत्र की संरचनात्मक कमजोरी में भी है। तमिलनाडु सरकार की चुप्पी पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी देखना होगा कि 22 जुलाई की बैठक में राज्य किस ठोस माँग के साथ जाता है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) क्या है और इसकी बैठक क्यों महत्वपूर्ण है?
CWMA एक स्थायी संस्था है जिसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत यह सुनिश्चित करने के लिए गठित किया गया था कि कर्नाटक निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हर महीने तमिलनाडु को कावेरी का पानी छोड़े। 22 जुलाई की बैठक इसलिए अहम है क्योंकि जून और जुलाई दोनों महीनों का जल-आवंटन बड़े पैमाने पर लंबित है।
कर्नाटक ने तमिलनाडु को कितना कावेरी जल दिया है?
AIADMK नेता पलानीस्वामी के दावे के अनुसार, जून में देय 9.19 TMC फीट में से केवल 2.91 TMC फीट पानी ही छोड़ा गया। जुलाई में 31.24 TMC फीट छोड़ा जाना था, लेकिन जून की कमी के साथ यह भी काफी हद तक लंबित बताया जा रहा है।
कावेरी जल की कमी से तमिलनाडु के किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
पलानीस्वामी के अनुसार, कावेरी डेल्टा के 20 से अधिक जिलों में पेयजल आपूर्ति और कुरुवाई धान की फसल सीधे तौर पर प्रभावित होगी। कुरुवाई जून-जुलाई में बोई जाने वाली अल्पकालिक फसल है, और जल की कमी से हजारों किसान परिवारों और कृषि श्रमिकों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।
सिद्धारमैया के बयान पर पलानीस्वामी ने आपत्ति क्यों जताई?
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि कर्नाटक के जलाशय भरने के बाद ही तमिलनाडु को पानी दिया जाएगा। पलानीस्वामी ने इस रुख को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और अंतर-राज्यीय जल बंटवारे के स्थापित दिशानिर्देशों के विपरीत बताते हुए कहा कि यह कानून के शासन को कमजोर करता है।
AIADMK ने तमिलनाडु की DMK सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
पलानीस्वामी ने आरोप लगाया कि DMK सरकार ने न तो कर्नाटक पर लंबित जल निकासी के लिए पर्याप्त दबाव बनाया और न ही CWMA के आदेश का पालन कराया। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सहकारी कृषि ऋण माफी के अपने चुनावी वादे को सीमित राहत देकर कमजोर कर दिया।
राष्ट्र प्रेस
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