बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व डीजीएम समेत 6 को ₹2.39 करोड़ धोखाधड़ी में 10 साल की सजा, ₹2.70 करोड़ जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
चेन्नई की एक स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व डिप्टी जनरल मैनेजर (डीजीएम) एन. वेंकटाचलम सहित छह दोषियों को ₹2.39 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने 20 अगस्त को फैसला सुनाते हुए सभी छह दोषियों पर संयुक्त रूप से ₹2.70 करोड़ का जुर्माना भी लगाया।
मुख्य दोषी और उनकी पहचान
सजा पाने वालों में बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व डीजीएम एन. वेंकटाचलम के अलावा शोलिंगनल्लूर तालुक ऑफिस के रिकॉर्ड क्लर्क एम. शिवकुमार; पझावंथंगल के तत्कालीन विलेज एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर टी. दशरथन; और तमिलनाडु सरकार के पूर्व विलेज एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर एम. मनिचावेलु शामिल हैं। दो निजी व्यक्ति — ओ.पी. थमारई पू और पी. थंडापानी — भी दोषी करार दिए गए।
धोखाधड़ी की साजिश कैसे रची गई
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने झूठे और जाली दस्तावेज जमा कर बैंक से कई प्रकार की क्रेडिट सुविधाएँ बेईमानी से हासिल कीं। जाँचकर्ताओं का आरोप था कि मुख्य आरोपी ई. मुथुस्वामी और अन्य ने बैंक अधिकारियों से मिलीभगत कर बैंक की धनराशि को अन्यत्र लगाने की साजिश रची। इन लेन-देन से बैंक ऑफ इंडिया को कथित तौर पर ₹238.97 लाख का नुकसान हुआ।
मामले का घटनाक्रम
बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत के आधार पर सीबीआई ने 19 मई 2010 को यह मामला दर्ज किया था। जाँच पूरी होने के बाद 28 दिसंबर 2011 को 12 आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की गई, जिनमें पाँच सरकारी कर्मचारी और सात निजी व्यक्ति शामिल थे। लैंड एंड सर्वे डिपार्टमेंट के निलंबित सीनियर ड्राफ्ट्समैन वी. उमापति के विरुद्ध कार्यवाही अलग कर दी गई और उन पर मामला संख्या सीसी 18/2016 में अलग से सुनवाई जारी है।
फैसले का महत्त्व
यह निर्णय 15 वर्षों से अधिक समय तक चले मुकदमे के बाद आया है, जो सरकारी तंत्र और बैंकिंग प्रणाली के बीच सांठगाँठ से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता को रेखांकित करता है। उल्लेखनीय है कि सीबीआई के बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन विशिष्ट धाराओं के तहत दोषसिद्धि हुई और धोखाधड़ी से जुड़े ऋण खातों एवं संपत्तियों का ब्यौरा भी साझा नहीं किया गया। आगे संभावित अपील की स्थिति में यह मामला उच्च न्यायालय के समक्ष आ सकता है।