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गीतांजलि आंग्मो: विरोध प्रदर्शन सरकार के लिए वेक-अप कॉल, शिक्षा सुधार अब ज़रूरी

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गीतांजलि आंग्मो: विरोध प्रदर्शन सरकार के लिए वेक-अप कॉल, शिक्षा सुधार अब ज़रूरी

सारांश

गीतांजलि आंग्मो का संदेश सीधा है — विरोध प्रदर्शन महज़ शोर नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत हैं। एनईपी को दस्तावेज़ से कक्षा तक लाना होगा, शिक्षकों को केंद्र में रखना होगा, और एक ऐसा स्वतंत्र आयोग चाहिए जो सरकारें बदलने पर भी सुधार न रोके।

मुख्य बातें

गीतांजलि आंग्मो ने 3 सितंबर को भुवनेश्वर में कहा कि विरोध प्रदर्शनों को सरकार को 'वेक-अप कॉल' मानना चाहिए।
उनके अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) दस्तावेज़ के रूप में अच्छी है, लेकिन असली चुनौती क्रियान्वयन की है।
शिक्षकों को समाज में उच्च दर्जा और बेहतर वेतन दिए बिना एनईपी की सफलता संभव नहीं।
कम से कम दसवीं तक हर बच्चे को — सरकारी या निजी स्कूल में — समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलनी चाहिए।
आंग्मो ने एक स्वतंत्र शिक्षा आयोग की वकालत की जो राजनीतिक बदलावों से प्रभावित न हो।
परीक्षा सुधार केवल पेपर लीक रोकने तक सीमित नहीं — बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को मापना होगा।

जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी और शिक्षाविद् गीतांजलि आंग्मो ने 3 सितंबर को भुवनेश्वर में एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि सरकार को जारी विरोध प्रदर्शनों को एक 'वेक-अप कॉल' के रूप में लेना चाहिए और परीक्षा तथा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार तत्काल लागू करने चाहिए। उनका मानना है कि यह मुद्दा किसी अलग-थलग घटना तक सीमित नहीं है — यदि समय रहते सार्थक बदलाव नहीं हुए तो यह भविष्य में बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति: दस्तावेज़ से ज़मीन तक

आंग्मो ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) एक दस्तावेज़ के रूप में उत्कृष्ट है, लेकिन इसकी असली कसौटी क्रियान्वयन है। उन्होंने प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति कोई निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि गुरु की केंद्रीय भूमिका थी — जो अपने आचरण और व्यक्तित्व से शिष्य के चरित्र का निर्माण करता था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आज शिक्षण अनेक बार 'अंतिम विकल्प' का पेशा बन गया है — जब कोई इंजीनियर, डॉक्टर या प्रशासनिक अधिकारी नहीं बन पाता, तब शिक्षक बनता है। उनके अनुसार इस मानसिकता को बदलना अनिवार्य है। एनईपी को सफल बनाने के लिए शिक्षकों को समाज में उच्च दर्जा और प्रतिस्पर्धी वेतन देना होगा, ताकि प्रतिभाशाली लोग स्वेच्छा से इस पेशे को चुनें।

समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: हर बच्चे का अधिकार

आंग्मो का दृढ़ मत है कि कम से कम दसवीं कक्षा तक हर बच्चे को — चाहे वह सरकारी स्कूल में पढ़े या निजी — समान और गुणवत्तापूर्ण बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि अनेक स्थानों पर सरकारी स्कूल या तो बंद हो रहे हैं या उनकी स्थिति बदतर है, और कई जगह बच्चों की पोषण जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

उन्होंने कहा, 'अगर हम विश्व नेतृत्व की बात करते हैं तो सबसे पहले अपने बच्चों को मज़बूत बनाना होगा।' उनके अनुसार शिक्षा केवल जानकारी याद करने और परीक्षा में लिखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए — बच्चे का शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास भी शिक्षा का अभिन्न अंग होना चाहिए।

परीक्षा प्रणाली में आमूल बदलाव की ज़रूरत

आंग्मो ने कहा कि अब तक ध्यान केवल परीक्षा को सुरक्षित बनाने और पेपर लीक रोकने तक केंद्रित रहा है, जबकि ज़रूरत इससे कहीं बड़े सुधार की है। उन्होंने सवाल उठाया कि परीक्षाएँ वास्तव में क्या जाँचती हैं — केवल याददाश्त, या बच्चे की समझ और ज्ञान के उपयोग की क्षमता? उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए, न कि महज़ सूचनाओं का भंडारण।

स्वतंत्र शिक्षा आयोग: राजनीतिक चक्र से मुक्ति

आंग्मो ने एक स्वतंत्र शिक्षा आयोग की स्थापना की वकालत की, जो सरकारें बदलने के बावजूद शिक्षा सुधारों को निरंतर आगे बढ़ाता रहे। उन्होंने फिनलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ शिक्षा सुधार में दशकों का निरंतर प्रयास लगा। उनके अनुसार शिक्षा पाँच साल की परियोजना नहीं है — यह दशकों का संस्थागत प्रयास है जिसे राजनीतिक उठापटक से सुरक्षित रखना होगा।

सरकार के लिए चेतावनी और अवसर

आंग्मो ने कहा कि यदि माता-पिता, छात्र और युवा यह महसूस करने लगें कि व्यवस्था उन्हें उचित अवसर और शिक्षा नहीं दे रही, तो सामाजिक दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह बड़े आंदोलन की प्रतीक्षा करने के बजाय अभी कदम उठाए। उनके शब्दों में, एनईपी को 'अलमारी में रख दिया जाने वाला दस्तावेज़' नहीं बनने देना चाहिए — इसे स्कूलों, कक्षाओं और बच्चों के जीवन में उतारना होगा। गौरतलब है कि शिक्षा और स्वास्थ्य उस 'सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर' का हिस्सा हैं जिसकी किसी भी देश को भौतिक बुनियादी ढाँचे जितनी ही ज़रूरत होती है — और इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना अब टाला नहीं जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन वहाँ शिक्षक-प्रशिक्षण में निवेश और सामाजिक सहमति दोनों थे — भारत में दोनों की कमी है। जब तक शिक्षकों की भर्ती, प्रशिक्षण और मूल्यांकन की प्रणाली नहीं बदलती, तब तक एनईपी की भाषा कितनी भी उत्कृष्ट हो, कक्षाओं में बदलाव नहीं आएगा।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीतांजलि आंग्मो ने विरोध प्रदर्शनों के बारे में क्या कहा?
गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि सरकार को जारी विरोध प्रदर्शनों को 'वेक-अप कॉल' के रूप में लेना चाहिए और परीक्षा व शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार तत्काल लागू करने चाहिए। उनके अनुसार यदि समय रहते बदलाव नहीं हुए तो भविष्य में बड़ा सामाजिक आंदोलन खड़ा हो सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के क्रियान्वयन पर उनका क्या मत है?
आंग्मो के अनुसार एनईपी दस्तावेज़ के रूप में उत्कृष्ट है, लेकिन केवल दस्तावेज़ बना देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदलती। इसके लिए वर्षों तक जमीनी स्तर पर निरंतर काम करना होगा और शिक्षा सुधार को राजनीतिक चक्र से अलग रखना होगा।
स्वतंत्र शिक्षा आयोग की माँग क्यों की जा रही है?
आंग्मो का मानना है कि शिक्षा 20-30 साल का दीर्घकालिक विषय है और हर बार सरकार बदलने पर सुधार रुक जाते हैं। एक स्वतंत्र शिक्षा आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक बदलाव सुधारों की निरंतरता को बाधित न करें।
परीक्षा सुधार के बारे में उन्होंने क्या कहा?
उनके अनुसार अब तक ध्यान केवल पेपर लीक रोकने पर रहा है, जबकि ज़रूरत इससे कहीं बड़े सुधार की है। परीक्षाओं को बच्चे की याददाश्त नहीं, बल्कि उसकी समझ, ज्ञान के उपयोग की क्षमता और संपूर्ण व्यक्तित्व को परखना चाहिए।
शिक्षकों की भूमिका पर आंग्मो का क्या दृष्टिकोण है?
आंग्मो ने कहा कि शिक्षकों को समाज में उच्च दर्जा और बेहतर वेतन देना होगा ताकि प्रतिभाशाली लोग स्वेच्छा से इस पेशे को चुनें। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए सबसे पहले शिक्षक को केंद्र में रखना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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