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झारखंड हाईकोर्ट ने सीएम हेमंत सोरेन के खिलाफ 2014 की आचार संहिता उल्लंघन एफआईआर रद्द की

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झारखंड हाईकोर्ट ने सीएम हेमंत सोरेन के खिलाफ 2014 की आचार संहिता उल्लंघन एफआईआर रद्द की

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ करीब एक दशक पुरानी आचार संहिता उल्लंघन की एफआईआर रद्द कर दी। न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने पाया कि मामले को बनाए रखने का पर्याप्त आधार नहीं है — और इस तरह 2014 से चली आ रही एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हुआ।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 25 जून 2025 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ दर्ज एफआईआर संख्या 418/2014 निरस्त की।
यह एफआईआर 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान कथित आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में सरायकेला-खरसावां के आदित्यपुर थाना में दर्ज हुई थी।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामला बनाए रखने का आधार नहीं पाया।
सोरेन की ओर से अधिवक्ता प्रदीप चंद्रा ने पैरवी की और आपराधिक रिट याचिका दायर की थी।
इस आदेश के साथ ही इस मामले में सोरेन के विरुद्ध चल रही सभी न्यायिक कार्यवाहियाँ समाप्त हो गई हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को झारखंड हाईकोर्ट ने 25 जून 2025 को बड़ी कानूनी राहत दी, जब अदालत ने 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान कथित आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में दर्ज एफआईआर संख्या 418/2014 को निरस्त कर दिया। इस आदेश के साथ ही इस मामले में उनके विरुद्ध चल रही समस्त न्यायिक कार्यवाहियाँ भी समाप्त हो गई हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह प्राथमिकी सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना में दर्ज की गई थी। आरोप था कि 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान सोरेन ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया। मामला कई वर्षों तक हाईकोर्ट में लंबित रहा, जिस दौरान अदालत ने निचली अदालत की कार्यवाही पर अंतरिम रोक भी लगाई थी।

अदालत का निर्णय

न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें, दस्तावेज़ और कानूनी पहलुओं की विस्तृत जाँच के बाद निष्कर्ष निकाला कि इस मामले को बनाए रखने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके बाद मुख्यमंत्री की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर निरस्त कर दी गई। मुख्यमंत्री की पैरवी अधिवक्ता प्रदीप चंद्रा ने की।

राजनीतिक और कानूनी महत्व

यह ऐसे समय में आया है जब हेमंत सोरेन पहले से ही कई कानूनी मोर्चों पर सक्रिय रहे हैं। गौरतलब है कि यह उनके विरुद्ध चुनाव-संबंधी एक पुराने मामले का अंत है, जो करीब एक दशक से न्यायिक प्रक्रिया में उलझा हुआ था। इस फैसले से उनकी राजनीतिक स्थिति को अल्पकालिक राहत मिलने की संभावना है।

आगे की स्थिति

अदालत के इस आदेश के बाद अब इस विशेष मामले में किसी भी पक्ष द्वारा उच्चतर न्यायालय में अपील का विकल्प खुला है। फिलहाल, झारखंड हाईकोर्ट के इस निर्णय से सोरेन को इस एफआईआर से जुड़ी सभी कानूनी बाधाओं से मुक्ति मिल गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह व्यापक सवाल उठाता है कि चुनाव-संबंधी आचार संहिता मामले अदालतों में इतने लंबे समय तक क्यों लंबित रहते हैं। एक दशक पुरानी एफआईआर का यूँ समाप्त होना चुनाव आयोग की शिकायत-निपटान प्रणाली की सीमाओं को भी उजागर करता है। आलोचकों का कहना है कि राजनेताओं के विरुद्ध चुनावी उल्लंघन के मामले अक्सर तब तक खिंचते रहते हैं जब तक उनकी प्रासंगिकता ही समाप्त न हो जाए। यह फैसला सोरेन की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को मज़बूती दे सकता है, पर जवाबदेही की व्यापक बहस को यह अनुत्तरित छोड़ देता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सोरेन की एफआईआर क्यों रद्द की?
न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने सभी पक्षों की दलीलें, दस्तावेज़ और कानूनी पहलुओं की जाँच के बाद पाया कि मामले को बनाए रखने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके बाद आपराधिक रिट याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर निरस्त कर दी गई।
2014 की आचार संहिता उल्लंघन एफआईआर क्या थी?
यह एफआईआर 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान कथित आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना में कांड संख्या 418/2014 के तहत दर्ज की गई थी। हेमंत सोरेन ने इसे कानूनन असंगत बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
इस फैसले से हेमंत सोरेन पर क्या असर पड़ेगा?
इस आदेश के बाद इस विशेष मामले में सोरेन के विरुद्ध सभी न्यायिक कार्यवाहियाँ समाप्त हो गई हैं। यह उनकी राजनीतिक स्थिति को अल्पकालिक राहत देता है, हालाँकि किसी भी पक्ष के पास उच्चतर न्यायालय में अपील का विकल्प अभी भी उपलब्ध है।
यह मामला हाईकोर्ट में कितने समय से लंबित था?
यह मामला 2014 से लगभग एक दशक तक हाईकोर्ट में लंबित रहा। सुनवाई के दौरान अदालत ने निचली अदालत की कार्यवाही पर अंतरिम रोक भी लगाई थी, जिसके बाद मुख्य याचिका पर नियमित सुनवाई जारी रही।
हेमंत सोरेन की ओर से अदालत में किसने पैरवी की?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से अधिवक्ता प्रदीप चंद्रा ने झारखंड हाईकोर्ट में पक्ष रखा और आपराधिक रिट याचिका दायर की थी।
राष्ट्र प्रेस
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