असमिया भाषा बोलने पर कोई पाबंदी नहीं, अवैध प्रवासियों पर कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी: अतुल बोरा
सारांश
मुख्य बातें
असम सरकार के मंत्री और असम गण परिषद (एजीपी) के अध्यक्ष अतुल बोरा ने 8 जुलाई को गुवाहाटी में स्पष्ट किया कि असम में कोई भी व्यक्ति असमिया भाषा बोल सकता है और भाषा के आधार पर किसी को परेशान करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अवैध विदेशी नागरिकों के विरुद्ध कार्रवाई कानून के दायरे में अलग से जारी रहेगी।
मंत्री का स्पष्टीकरण
असम विधानसभा के बजट सत्र के दौरान पत्रकारों से बातचीत में अतुल बोरा ने कहा, 'यह आरोप पूरी तरह गलत है कि भाषा के नाम पर लोगों को परेशान किया जा रहा है। असम में रहने वाला कोई भी व्यक्ति असमिया बोल सकता है। किसी भी व्यक्ति के लिए असमिया बोलना प्रतिबंधित नहीं है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि राज्य सरकार असमिया भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को निरंतर बढ़ावा दे रही है।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि भाषा के मुद्दे का इस्तेमाल समुदायों के बीच अनावश्यक विभाजन पैदा करने के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
अवैध प्रवासियों पर सरकार का रुख
अवैध प्रवासियों के सवाल पर अतुल बोरा ने दो-टूक कहा, 'विदेशी, विदेशी ही होते हैं। इस मामले में मेरे मन में कोई भ्रम नहीं है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति कौन सी भाषा बोलता है, इससे उसके कानूनी दर्जे पर कोई फर्क नहीं पड़ता — अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके विरुद्ध कार्रवाई संविधान तथा मौजूदा कानूनों के तहत ही की जाएगी।
गौरतलब है कि असम सरकार ने हाल के दिनों में घुसपैठ-विरोधी अभियान तेज किया है। सरकार का कहना है कि सत्यापन प्रक्रिया से वास्तविक भारतीय नागरिकों को डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
एजीपी नेता का यह बयान ऐसे समय आया है जब असम में भाषाई पहचान और कथित बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो रही है। आलोचकों का कहना है कि घुसपैठ-विरोधी अभियानों के दौरान भाषा को अनौपचारिक पहचान-कसौटी की तरह इस्तेमाल किए जाने की आशंका बनी रहती है — जिसे बोरा के इस बयान से सीधे नकारने की कोशिश की गई है।
यह ऐसे समय में आया है जब असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) की प्रक्रिया और विदेशी न्यायाधिकरणों के फैसलों को लेकर कानूनी और सामाजिक बहसें जारी हैं।
भाषा और कानून: दो अलग मुद्दे
राज्य सरकार की स्थिति यह है कि असमिया भाषा को राज्य की सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कार्रवाई इससे बिल्कुल अलग — कानूनी — प्रक्रिया के तहत होती है। अतुल बोरा ने इन दोनों मुद्दों को एक-दूसरे से स्पष्ट रूप से अलग करते हुए कहा कि इन्हें आपस में मिलाना भ्रामक है।
आने वाले दिनों में विधानसभा सत्र में इस विषय पर और बहस की संभावना है, क्योंकि विपक्षी दल भाषा और नागरिकता के मुद्दे को एक साथ उठाते रहे हैं।