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राम मंदिर चढ़ावा चोरी: VHP अध्यक्ष आलोक कुमार बोले — आरोपियों को जल्द सजा मिले, हिंदुओं की आस्था को गहरी ठेस

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राम मंदिर चढ़ावा चोरी: VHP अध्यक्ष आलोक कुमार बोले — आरोपियों को जल्द सजा मिले, हिंदुओं की आस्था को गहरी ठेस

सारांश

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में VHP अध्यक्ष आलोक कुमार ने SIT जांच पर भरोसा जताया, CBI ट्रांसफर और सर्वदलीय समिति की माँग खारिज की, और ₹2,000 करोड़ की चोरी के दावों को बिना सबूत का बताते हुए BNS की धारा 353 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी।

मुख्य बातें

VHP के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोपियों को शीघ्र कानूनी दंड मिलने पर ही हिंदू समाज को सुकून मिलेगा।
SIT को जांच के लिए 15 दिन का अतिरिक्त समय देने को उचित बताया; मामला CBI को सौंपने की माँग खारिज की।
सर्वोच्च न्यायालय के हवाले से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कानूनी सहायता हर आरोपी का मौलिक अधिकार है; बार एसोसिएशन का बहिष्कार प्रस्ताव असंवैधानिक।
चंपत राय द्वारा एफआईआर के दो दिन के भीतर महासचिव पद से इस्तीफे को सराहनीय कदम बताया।
₹2,000 करोड़ की चोरी के दावे करने वाले नेताओं पर BNS धारा 353 के तहत कार्रवाई की माँग; सर्वदलीय जांच समिति का प्रस्ताव भी खारिज।

विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने 1 जुलाई को कहा कि अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कानून के तहत शीघ्र दंड मिलने पर ही इस विवाद का वास्तविक समाधान संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस घटना ने देशभर के हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाई है और उनके दिलों में बेचैनी है।

एसआईटी जांच पर VHP का रुख

आलोक कुमार ने कहा कि स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को जांच पूरी करने के लिए 15 दिन का अतिरिक्त समय देना उचित है। उनके अनुसार, यदि जांच एजेंसी ने किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए अधिक समय माँगा है, तो इसे नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'जांच आगे बढ़ रही है और इसे बिना किसी अनावश्यक हस्तक्षेप के जारी रहने देना चाहिए।'

कुछ विपक्षी दलों की उस माँग को उन्होंने खारिज किया जिसमें मामले को सीबीआई को सौंपने की बात कही गई थी। उनका तर्क था कि जो दल उत्तर प्रदेश पुलिस पर सवाल उठाते हैं, वही दल केंद्रीय जांच एजेंसियों पर भी सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया और पूरा हिंदू समाज इस जांच पर नज़र रखे हुए है, इसलिए किसी भी गड़बड़ी को छुपाया नहीं जा सकता।

वकीलों के बहिष्कार और संवैधानिक अधिकार पर टिप्पणी

अयोध्या बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव पर — जिसमें कहा गया कि कोई वकील आरोपियों का पक्ष नहीं रखेगा — आलोक कुमार ने कहा कि यह बात उन्हें 'थोड़ी अजीब' लगी। उन्होंने स्वीकार किया कि आरोपियों के प्रति उनके मन में कोई सहानुभूति नहीं है, परंतु साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्देश का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कानूनी सहायता प्रत्येक आरोपी का मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक, कानूनी और नैतिक रूप से कोई भी बार एसोसिएशन ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती।

चंपत राय के इस्तीफे और प्रशासनिक जवाबदेही

मंदिर प्रशासन से जुड़े सवालों पर आलोक कुमार ने कहा कि गोपाल राव की औपचारिक नियुक्ति के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। जहाँ तक चंपत राय के महासचिव पद से इस्तीफे का सवाल है, उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के मात्र दो दिन के भीतर इस्तीफा देना सराहनीय कदम है क्योंकि इससे जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। उन्होंने सर्वदलीय समिति बनाने के सुझाव को भी यह कहते हुए अस्वीकार किया कि इसका अर्थ जांच को राजनेताओं के हाथों में सौंपना होगा।

मीडिया ट्रायल और अफवाहों पर चेतावनी

आलोक कुमार ने कुछ नेताओं द्वारा ₹2,000 करोड़ की चोरी के दावों पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पुलिस को ऐसे नेताओं को बुलाकर उनके पास उपलब्ध साक्ष्य के बारे में पूछताछ करनी चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि बिना सबूत के ऐसे बयान देना और अफवाहें फैलाना, जिनसे सनसनी, असंतोष या हिंसा भड़क सकती है, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 के तहत दंडनीय अपराध है। जांच से जुड़ी जानकारी मीडिया में लीक होने पर उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितनी खबरें तथ्यात्मक हैं और कितनी राजनीति से प्रेरित।

अंतिम फैसला न्यायालय का

आलोक कुमार ने जोर देकर कहा कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय केवल न्यायालय का होता है। उन्होंने माना कि कुछ लोगों को सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियाँ करते देखा गया है और कुछ ने स्वीकारोक्ति भी की है, लेकिन भारत की न्यायिक व्यवस्था में दोष सिद्ध होने तक कोई भी आरोपी नहीं माना जाता। उन्होंने कहा कि इस मामले में शीघ्र और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया ही आहत हिंदू समाज को वास्तविक संतोष दे सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन साथ ही संस्थागत प्रक्रिया में विश्वास की वकालत करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि VHP जैसा संगठन, जो सामान्यतः आक्रामक सार्वजनिक रुख अपनाता है, इस बार न्यायिक अनुशासन की भाषा बोल रहा है — यह संभवतः इसलिए क्योंकि मामले में भाजपा-संबद्ध ट्रस्ट के नाम भी उलझे हुए हैं। ₹2,000 करोड़ के दावों पर BNS धारा 353 का हवाला देना एक कानूनी हथियार की तरह प्रतीत होता है जो विपक्षी आवाज़ों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है — यह पहलू मुख्यधारा की कवरेज में अनदेखा रह गया है। असली सवाल यह है कि क्या SIT की जांच इतनी पारदर्शी होगी कि वह उन लोगों को भी संतुष्ट कर सके जो मंदिर प्रशासन से जुड़े बड़े नामों पर सवाल उठा रहे हैं।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला क्या है?
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की राशि की कथित चोरी का यह मामला है जिसमें कई आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है और SIT जांच कर रही है। CCTV फुटेज और कुछ आरोपियों की स्वीकारोक्ति को प्रमुख साक्ष्य बताया जा रहा है।
VHP ने SIT जांच पर क्या कहा?
VHP के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने SIT को 15 दिन का अतिरिक्त समय देने को उचित बताया और कहा कि जांच बारीकी से हो रही है। उन्होंने मामले को CBI को सौंपने या सर्वदलीय समिति बनाने की माँग को खारिज किया।
अयोध्या बार एसोसिएशन के बहिष्कार प्रस्ताव पर सर्वोच्च न्यायालय का क्या रुख है?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कानूनी सहायता प्रत्येक आरोपी का मौलिक अधिकार है। इस आधार पर न्यायालय ने कहा कि कोई भी बार एसोसिएशन ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती और न ही कोई वकील केस लेने से इनकार कर सकता है।
चंपत राय ने महासचिव पद से इस्तीफा क्यों दिया?
एफआईआर दर्ज होने के दो दिन के भीतर चंपत राय ने महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। आलोक कुमार ने इसे सराहनीय कदम बताया क्योंकि इससे जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित होती है और गवाहों पर दबाव या सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका कम होती है।
₹2,000 करोड़ की चोरी के दावों पर VHP का क्या कहना है?
आलोक कुमार ने इन दावों को बिना सबूत का बताया और कहा कि पुलिस को ऐसे दावे करने वाले नेताओं से साक्ष्य माँगने चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना सबूत के सनसनीखेज बयान देना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 के तहत दंडनीय हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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