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हुमायूं कबीर के गाय-कुर्बानी बयान पर एसटी हसन का पलटवार: 'ऐसे लोग देशद्रोही, सौहार्द को खतरा'

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हुमायूं कबीर के गाय-कुर्बानी बयान पर एसटी हसन का पलटवार: 'ऐसे लोग देशद्रोही, सौहार्द को खतरा'

सारांश

समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने हुमायूं कबीर के गाय-कुर्बानी बयान को 'देशद्रोही' बताया और कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें कबीर की याचिका खारिज हुई। हसन ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की भी माँग उठाई।

मुख्य बातें

एसटी हसन (सपा पूर्व सांसद) ने हुमायूं कबीर के गाय-कुर्बानी बयान को सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरनाक बताया।
हसन ने ऐसे बयान देने वालों को 'देशद्रोही' करार दिया।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हुमायूं कबीर की याचिका खारिज करते हुए कहा कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य नहीं ।
पश्चिम बंगाल सरकार ने बकरीद पर खुले स्थानों पर पशु वध और बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के गाय-भैंस के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है।
हसन ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की।
अदालती फैसले के बावजूद हुमायूं कबीर ने कथित तौर पर गाय की कुर्बानी देने का इरादा दोहराया है।

समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने मुरादाबाद में 23 मई को पूर्व तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता व विधायक हुमायूं कबीर के बकरीद पर गाय की कुर्बानी देने के बयान की कड़े शब्दों में निंदा की। हसन ने स्पष्ट कहा कि ऐसे बयान समाज में नफरत की आग भड़काते हैं और देश के सांप्रदायिक सौहार्द की जड़ें कमज़ोर करते हैं। उनके अनुसार, जो लोग हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच खाई पैदा करने की कोशिश करते हैं, वे 'देशद्रोही' की श्रेणी में आते हैं।

कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को बताया सही

डॉ. हसन ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हुमायूं कबीर की याचिका को खारिज करके एक न्यायसंगत निर्णय दिया है। उन्होंने रेखांकित किया कि करोड़ों हिंदू भाइयों की गाय में गहरी धार्मिक आस्था है और उस आस्था का सम्मान हर नागरिक का दायित्व है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम में कहीं यह अनिवार्य नहीं बताया गया कि बकरीद पर केवल गाय की ही कुर्बानी दी जाए — मुसलमान अन्य पशुओं की कुर्बानी भी दे सकते हैं।

आपसी सम्मान पर जोर

हसन ने कहा, 'हमारा मानना है कि हर धर्म की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। अगर हम एक-दूसरे की आस्था को समझेंगे और उसका आदर करेंगे, तभी देश में प्यार-मोहब्बत और सांप्रदायिक सौहार्द बना रहेगा।' उन्होंने किसी भी समुदाय को जिद या उकसावे वाली राजनीति से दूर रहने की सलाह दी।

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग

डॉ. हसन ने यह भी कहा कि गाय का मुद्दा कोई नया नहीं है। उन्होंने माना कि गाय का मांस खाना किसी के लिए निजी मामला हो सकता है, लेकिन देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं और आस्था का सम्मान करना भी उतना ही ज़रूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने माँग उठाई कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए ताकि उसकी गरिमा को संवैधानिक मज़बूती मिल सके।

पश्चिम बंगाल सरकार की गाइडलाइन और हुमायूं कबीर का रुख

पश्चिम बंगाल सरकार ने बकरीद से पहले दिशानिर्देश जारी करते हुए खुले सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी पशु के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। साथ ही बिना अनिवार्य फिटनेस प्रमाण-पत्र के गाय, भैंस, बैल या बछड़े के वध की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसी गाइडलाइन को चुनौती देते हुए हुमायूं कबीर ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य नहीं है। हालाँकि इस फैसले के बावजूद हुमायूं कबीर ने कथित तौर पर कहा है कि वे गाय की ही कुर्बानी देंगे।

आगे क्या होगा

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश में बकरीद से पहले सांप्रदायिक संवेदनशीलता को लेकर प्रशासनिक सतर्कता बढ़ी हुई है। राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और व्यापक बहस का केंद्र बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस राजनीतिक धारा से आई है जो परंपरागत रूप से अल्पसंख्यक हितों की पैरवी करती है। यह दर्शाता है कि हुमायूं कबीर का बयान व्यापक राजनीतिक स्पेक्ट्रम में असहजता पैदा कर रहा है। हालाँकि 'देशद्रोही' जैसे शब्दों का राजनीतिक संदर्भ में दुरुपयोग का इतिहास रहा है, इसलिए इस भाषा की तीव्रता पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। असली सवाल यह है कि क्या कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी कबीर का रुख कानूनी चुनौती बनेगा — और प्रशासन इसे किस तरह संभालता है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हुमायूं कबीर ने बकरीद पर गाय की कुर्बानी को लेकर क्या कहा था?
पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेता व विधायक हुमायूं कबीर ने बकरीद पर गाय की कुर्बानी देने का इरादा ज़ाहिर किया था और पश्चिम बंगाल सरकार की गाइडलाइन को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। अदालत ने याचिका खारिज करने के बाद भी कथित तौर पर उन्होंने अपना रुख नहीं बदला।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने हुमायूं कबीर की याचिका पर क्या फैसला दिया?
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हुमायूं कबीर की याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य नहीं है। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार की उस गाइडलाइन को बरकरार रखा जो खुले सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पर रोक लगाती है।
पश्चिम बंगाल सरकार की बकरीद गाइडलाइन में क्या है?
पश्चिम बंगाल सरकार ने बकरीद के लिए जारी दिशानिर्देशों में खुले सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी पशु के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। इसके अलावा बिना अनिवार्य फिटनेस प्रमाण-पत्र के गाय, भैंस, बैल या बछड़े के वध की अनुमति नहीं होगी।
डॉ. एसटी हसन ने गाय को लेकर क्या माँग की?
डॉ. एसटी हसन ने माँग की कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए ताकि उसकी गरिमा और सम्मान को संवैधानिक मज़बूती मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम में केवल गाय की कुर्बानी अनिवार्य नहीं है और मुसलमान अन्य पशुओं की कुर्बानी दे सकते हैं।
एसटी हसन का यह बयान राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
डॉ. एसटी हसन समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ मुस्लिम नेता हैं, इसलिए उनका हुमायूं कबीर के बयान के खिलाफ खड़े होना राजनीतिक रूप से उल्लेखनीय है। यह दर्शाता है कि इस विवाद पर आलोचना केवल एक राजनीतिक खेमे तक सीमित नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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