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इंदौर नगर निगम फर्जी बिल घोटाला: ईडी ने ₹3.48 करोड़ की 9 संपत्तियाँ जब्त कीं, कुल कुर्की ₹59.18 करोड़ पहुँची

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इंदौर नगर निगम फर्जी बिल घोटाला: ईडी ने ₹3.48 करोड़ की 9 संपत्तियाँ जब्त कीं, कुल कुर्की ₹59.18 करोड़ पहुँची

सारांश

इंदौर नगर निगम फर्जी बिल घोटाले में ईडी की कार्रवाई तेज़ — ₹3.48 करोड़ की 9 नई संपत्तियाँ जब्त, कुल वसूली ₹59.18 करोड़ पहुँची। ₹103.62 करोड़ के गबन में ठेकेदारों और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत उजागर, तीन आरोपी पहले से न्यायिक हिरासत में।

मुख्य बातें

ईडी ने इंदौर नगर निगम (आईएमसी) फर्जी बिल घोटाले में ₹3.48 करोड़ मूल्य की 9 अचल संपत्तियाँ अस्थायी रूप से जब्त कीं।
जब्त संपत्तियाँ इंदौर और धार जिलों में स्थित आवासीय मकान, भूखंड, दुकानें और कृषि भूमि हैं।
जाँच में ₹103.62 करोड़ की सार्वजनिक धनराशि के गबन का खुलासा हुआ, जिसमें ठेकेदारों और आईएमसी अधिकारियों की मिलीभगत कथित है।
3 जुलाई 2025 की पूर्व कुर्की समेत इस मामले में कुल कुर्क अचल संपत्तियों का मूल्य ₹37.14 करोड़ और नकदी-सहित कुल कुर्की-जब्ती ₹59.18 करोड़ है।
अभय सिंह राठौर , मोहम्मद जाकिर और राहुल बदेरा को 1 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था और तीनों न्यायिक हिरासत में हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के इंदौर उप-क्षेत्रीय कार्यालय ने इंदौर नगर निगम (आईएमसी) फर्जी बिल घोटाले में धन शोधन जाँच के तहत ₹3.48 करोड़ मूल्य की 9 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया है। जब्त संपत्तियाँ मध्य प्रदेश के इंदौर और धार जिलों में स्थित आवासीय मकान, फ्लैट, भूखंड, व्यावसायिक दुकानें और कृषि भूमि हैं, जो आरोपी व्यक्तियों, लाभार्थियों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर दर्ज हैं।

घोटाले की पृष्ठभूमि

ईडी की जाँच इंदौर के एमजी रोड पुलिस स्टेशन में दर्ज कई प्राथमिकियों के आधार पर शुरू हुई, जिनमें आरोप था कि आईएमसी के खजाने से फर्जी बिल, जाली वर्क ऑर्डर, मनगढ़ंत माप पुस्तिकाएँ और अन्य कूट-रचित दस्तावेज़ों के ज़रिये सार्वजनिक धन की धोखाधड़ी से निकासी की गई। ये धोखाधड़ी उन कार्यों से जुड़ी थी जो या तो कभी निष्पादित ही नहीं हुए या पहले से पूरे हो चुके वर्क ऑर्डरों के लिए दोबारा भुगतान लिया गया।

गौरतलब है कि यह घोटाला नगर निगम स्तर पर ठेकेदारों और सरकारी अधिकारियों की कथित मिलीभगत का उजागर होना दर्शाता है — एक ऐसा पैटर्न जो देश के कई शहरी निकायों में पहले भी सामने आ चुका है।

₹103.62 करोड़ के गबन का खुलासा

ईडी की जाँच में सामने आया कि विभिन्न ठेकेदार कंपनियों ने आईएमसी के अधिकारियों और स्थानीय निधि लेखापरीक्षा/निवासी लेखापरीक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से जाली कार्य-आदेश फ़ाइलें और फर्जी बिल तैयार किए, जिसके परिणामस्वरूप आईएमसी के खजाने से ₹103.62 करोड़ की सार्वजनिक धनराशि का गबन हुआ।

जाँच के अनुसार, धोखाधड़ी से प्राप्त यह रकम नकद में निकाली गई, ठेकेदारों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लाभार्थियों में बाँटी गई, संबंधित संस्थाओं को हस्तांतरित की गई, अन्य निधियों के साथ मिलाई गई और संपत्ति अधिग्रहण तथा व्यक्तिगत खर्चों में लगाई गई।

कुर्की और जब्ती का विवरण

इससे पहले ईडी ने 3 जुलाई 2025 को अंतरिम कुर्की आदेश जारी करते हुए इस मामले में ₹33.65 करोड़ मूल्य की 43 अचल संपत्तियाँ अस्थायी रूप से कुर्क की थीं। ताज़ा कुर्की के बाद इस मामले में कुर्क अचल संपत्तियों का कुल मूल्य ₹37.14 करोड़ हो गया है।

इसके अतिरिक्त, ईडी ने पीएमएलए, 2002 की धारा 17 के तहत आरोपियों और संबंधित संस्थाओं के परिसरों पर तलाशी अभियान भी चलाया, जिसमें ₹22.04 करोड़ की नकदी, कीमती सामान और अन्य परिसंपत्तियाँ जब्त या फ्रीज़ की गईं। इस प्रकार इस मामले में कुल कुर्की और जब्ती ₹59.18 करोड़ तक पहुँच गई है।

तीन प्रमुख आरोपी न्यायिक हिरासत में

ईडी ने पीएमएलए, 2002 की धारा 19 के तहत 1 जून 2026 को तीन प्रमुख आरोपियों — अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बदेरा — को गिरफ्तार किया था। तीनों अभी भी न्यायिक हिरासत में हैं और आगे की जाँच जारी है।

यह मामला शहरी निकायों में वित्तीय अनुशासन और तृतीय पक्ष लेखापरीक्षा की ज़रूरत को एक बार फिर रेखांकित करता है — विशेष रूप से ऐसे समय में जब केंद्र और राज्य सरकारें स्मार्ट सिटी और शहरी विकास परियोजनाओं पर अरबों रुपये खर्च कर रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि लेखापरीक्षा विभाग की कथित मिलीभगत के बावजूद इतने वर्षों तक यह धोखाधड़ी कैसे चलती रही। ईडी की कार्रवाई सराहनीय है, परंतु अब तक केवल वित्तीय परिसंपत्तियाँ ही जब्त हुई हैं — उन वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही अभी स्पष्ट नहीं है जिनके अनुमोदन के बिना इतने बड़े पैमाने पर फर्जी बिल पास होना संभव नहीं था। देश के शहरी निकायों में यह पैटर्न बार-बार दोहराया जाता है — केवल ठेकेदारों को पकड़ना पर्याप्त नहीं, जब तक व्यवस्थागत खामियाँ नहीं सुधरतीं।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंदौर नगर निगम फर्जी बिल घोटाला क्या है?
यह घोटाला आईएमसी के खजाने से फर्जी बिल, जाली वर्क ऑर्डर और मनगढ़ंत दस्तावेज़ों के ज़रिये ₹103.62 करोड़ की सार्वजनिक धनराशि की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा है। ईडी के अनुसार, ठेकेदार कंपनियों ने आईएमसी और लेखापरीक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से यह गबन किया।
ईडी ने इस मामले में अब तक कितनी संपत्तियाँ जब्त की हैं?
ताज़ा कार्रवाई में ₹3.48 करोड़ की 9 संपत्तियाँ जब्त की गई हैं। इससे पहले 3 जुलाई 2025 को ₹33.65 करोड़ की 43 संपत्तियाँ कुर्क हुई थीं। नकदी और कीमती सामान समेत इस मामले में कुल कुर्की-जब्ती अब ₹59.18 करोड़ है।
इस मामले में किसे गिरफ्तार किया गया है?
ईडी ने 1 जून 2026 को पीएमएलए, 2002 की धारा 19 के तहत अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बदेरा को गिरफ्तार किया था। तीनों अभी न्यायिक हिरासत में हैं।
जब्त संपत्तियाँ किन जिलों में हैं और किनके नाम पर हैं?
जब्त संपत्तियाँ मध्य प्रदेश के इंदौर और धार जिलों में स्थित हैं। ये आरोपी व्यक्तियों, लाभार्थियों और उनके परिवार के सदस्यों या सह-मालिकों के नाम पर दर्ज हैं।
आगे की जाँच में क्या हो सकता है?
ईडी के अनुसार जाँच अभी जारी है, जिससे और कुर्की या गिरफ्तारियाँ संभव हैं। इस मामले में ठेकेदारों के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जाँच भी की जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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