जल संकट पर RSS के सुनील आम्बेकर: 'सरकारी योजनाएँ नहीं, समाज की सोच बदलनी होगी'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने 25 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में कहा कि भारत के जल संकट का स्थायी समाधान केवल सरकारी योजनाओं और तकनीकी हस्तक्षेपों से नहीं निकलेगा — इसके लिए समाज की सोच, संस्कार और जीवनशैली में बुनियादी बदलाव अनिवार्य है। उन्होंने जल को एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सांस्कृतिक विरासत का आधार बताते हुए इसके संरक्षण को सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी घोषित किया।
विमोचन समारोह में उठा जल-चेतना का स्वर
लखनऊ के भागीदारी भवन में राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के विशेषांक 'जल है तो कल है' के विमोचन अवसर पर आम्बेकर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नदियों को माँ के समान पूजनीय और जल को जीवन का मूल आधार माना गया है। उन्होंने तर्क दिया कि इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को व्यावहारिक व्यवहार में उतारे बिना संकट का कोई दीर्घकालिक हल नहीं निकलेगा।
आम्बेकर ने यह भी रेखांकित किया कि जल संकट केवल पानी की भौतिक कमी का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति मनुष्य के व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व से सीधे जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार मनुष्य सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है।
बुंदेलखंड और हिवरे बाजार के सफल मॉडल
आम्बेकर ने बुंदेलखंड के जखनी गाँव और महाराष्ट्र के हिवरे बाजार के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि स्थानीय भागीदारी और निरंतर सामुदायिक प्रयासों से जल संकट का प्रभावी समाधान संभव है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसी पहल करें और सफल मॉडलों को दूसरे गाँवों तक पहुँचाएँ।
पद्मश्री डॉ. पोपटराव पवार ने हिवरे बाजार का उदाहरण विस्तार से साझा करते हुए बताया कि जल प्रबंधन, फसल नियोजन और सामुदायिक अनुशासन — जिसमें चराईबंदी, कुल्हाड़बंदी और नशाबंदी जैसे सामूहिक संकल्प शामिल रहे — ने सूखे की समस्या को काफी हद तक कम करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
अनियोजित शहरीकरण पर चिंता
आम्बेकर ने शहरी नियोजन पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि नगरों की योजना तैयार करते समय पानी की उपलब्धता, वर्षा, जनसंख्या घनत्व और प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य है। उनके अनुसार अनियोजित शहरीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने जल संकट को और गहरा किया है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा और भावी पीढ़ियों के हितों को भी सुनिश्चित करना होगा। पानी को किसी एक राज्य, वर्ग या समुदाय का विषय न मानकर पूरे राष्ट्र की साझा चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों और वक्ताओं के विचार
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने कहा कि जल संरक्षण का कार्य केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता — समाज को आगे आकर सामूहिक जिम्मेदारी उठानी होगी। उन्होंने पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और इस विषय के साहित्य को गाँवों, ग्राम पंचायतों तथा आम जनता तक पहुँचाने की आवश्यकता बताई।
राष्ट्रधर्म के संपादक अशोक वाजपेयी ने बताया कि RSS के पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय है और जल संरक्षण उसका अभिन्न हिस्सा है। इसी उद्देश्य से यह विशेषांक तैयार किया गया है, जिसमें जल से जुड़े धार्मिक व सांस्कृतिक विचारों, पारंपरिक प्रणालियों और देश के विभिन्न हिस्सों में किए गए सफल प्रयोगों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है।
आगे की राह
इस अवसर पर RSS की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेश सोनी की पुस्तक 'हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के मूल स्रोत' का भी विमोचन किया गया। डॉ. पवार ने प्रत्येक ग्राम पंचायत में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण योजना तैयार करने और ग्रामसभा की सक्रिय भागीदारी से उसे लागू करने पर बल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि सामुदायिक स्तर पर इस तरह की जागरूकता और ठोस कार्ययोजना ही जल संकट के दीर्घकालिक समाधान की नींव रख सकती है।