26 अक्टूबर 2026
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जल संकट पर RSS के सुनील आम्बेकर: 'सरकारी योजनाएँ नहीं, समाज की सोच बदलनी होगी'

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जल संकट पर RSS के सुनील आम्बेकर: 'सरकारी योजनाएँ नहीं, समाज की सोच बदलनी होगी'

सारांश

RSS के सुनील आम्बेकर का संदेश स्पष्ट था — जल संकट तकनीक की नहीं, सोच की चुनौती है। लखनऊ में 'जल है तो कल है' विशेषांक विमोचन पर उन्होंने हिवरे बाजार और जखनी जैसे सामुदायिक मॉडलों को देशव्यापी अपनाने का आह्वान किया।

मुख्य बातें

RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने 25 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में जल संकट पर सामाजिक जागरूकता का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, समाज की सोच, संस्कार और जीवनशैली में बदलाव से संभव है।
बुंदेलखंड के जखनी और महाराष्ट्र के हिवरे बाजार को सामुदायिक जल संरक्षण के सफल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया।
पोपटराव पवार ने बताया कि चराईबंदी, कुल्हाड़बंदी और नशाबंदी जैसे सामूहिक प्रयासों ने हिवरे बाजार में सूखे की समस्या काफी हद तक घटाई।
कार्यक्रम में राष्ट्रधर्म पत्रिका के विशेषांक 'जल है तो कल है' और सुरेश सोनी की पुस्तक का विमोचन हुआ।
विशेषज्ञों ने हर ग्राम पंचायत में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण योजना बनाने पर जोर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने 25 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में कहा कि भारत के जल संकट का स्थायी समाधान केवल सरकारी योजनाओं और तकनीकी हस्तक्षेपों से नहीं निकलेगा — इसके लिए समाज की सोच, संस्कार और जीवनशैली में बुनियादी बदलाव अनिवार्य है। उन्होंने जल को एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सांस्कृतिक विरासत का आधार बताते हुए इसके संरक्षण को सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी घोषित किया।

विमोचन समारोह में उठा जल-चेतना का स्वर

लखनऊ के भागीदारी भवन में राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के विशेषांक 'जल है तो कल है' के विमोचन अवसर पर आम्बेकर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नदियों को माँ के समान पूजनीय और जल को जीवन का मूल आधार माना गया है। उन्होंने तर्क दिया कि इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को व्यावहारिक व्यवहार में उतारे बिना संकट का कोई दीर्घकालिक हल नहीं निकलेगा।

आम्बेकर ने यह भी रेखांकित किया कि जल संकट केवल पानी की भौतिक कमी का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति मनुष्य के व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व से सीधे जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार मनुष्य सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है।

बुंदेलखंड और हिवरे बाजार के सफल मॉडल

आम्बेकर ने बुंदेलखंड के जखनी गाँव और महाराष्ट्र के हिवरे बाजार के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि स्थानीय भागीदारी और निरंतर सामुदायिक प्रयासों से जल संकट का प्रभावी समाधान संभव है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसी पहल करें और सफल मॉडलों को दूसरे गाँवों तक पहुँचाएँ।

पद्मश्री डॉ. पोपटराव पवार ने हिवरे बाजार का उदाहरण विस्तार से साझा करते हुए बताया कि जल प्रबंधन, फसल नियोजन और सामुदायिक अनुशासन — जिसमें चराईबंदी, कुल्हाड़बंदी और नशाबंदी जैसे सामूहिक संकल्प शामिल रहे — ने सूखे की समस्या को काफी हद तक कम करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

अनियोजित शहरीकरण पर चिंता

आम्बेकर ने शहरी नियोजन पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि नगरों की योजना तैयार करते समय पानी की उपलब्धता, वर्षा, जनसंख्या घनत्व और प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य है। उनके अनुसार अनियोजित शहरीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने जल संकट को और गहरा किया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा और भावी पीढ़ियों के हितों को भी सुनिश्चित करना होगा। पानी को किसी एक राज्य, वर्ग या समुदाय का विषय न मानकर पूरे राष्ट्र की साझा चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए।

विशेषज्ञों और वक्ताओं के विचार

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने कहा कि जल संरक्षण का कार्य केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता — समाज को आगे आकर सामूहिक जिम्मेदारी उठानी होगी। उन्होंने पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और इस विषय के साहित्य को गाँवों, ग्राम पंचायतों तथा आम जनता तक पहुँचाने की आवश्यकता बताई।

राष्ट्रधर्म के संपादक अशोक वाजपेयी ने बताया कि RSS के पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय है और जल संरक्षण उसका अभिन्न हिस्सा है। इसी उद्देश्य से यह विशेषांक तैयार किया गया है, जिसमें जल से जुड़े धार्मिक व सांस्कृतिक विचारों, पारंपरिक प्रणालियों और देश के विभिन्न हिस्सों में किए गए सफल प्रयोगों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है।

आगे की राह

इस अवसर पर RSS की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेश सोनी की पुस्तक 'हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के मूल स्रोत' का भी विमोचन किया गया। डॉ. पवार ने प्रत्येक ग्राम पंचायत में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण योजना तैयार करने और ग्रामसभा की सक्रिय भागीदारी से उसे लागू करने पर बल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि सामुदायिक स्तर पर इस तरह की जागरूकता और ठोस कार्ययोजना ही जल संकट के दीर्घकालिक समाधान की नींव रख सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

ठोस नीतिगत ढाँचे और जवाबदेही तंत्र के बिना कितना कारगर होगा। हिवरे बाजार जैसे मॉडल प्रेरणादायक हैं, लेकिन वे असाधारण नेतृत्व की उपज हैं — उन्हें स्केल करने के लिए संस्थागत समर्थन और राज्य की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है, जिसकी चर्चा इस मंच पर अपेक्षाकृत कम रही।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुनील आम्बेकर ने जल संकट पर क्या कहा?
RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने 25 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में कहा कि जल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं या तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि समाज की सोच, संस्कार और जीवनशैली में बुनियादी बदलाव से निकलेगा। उन्होंने जल को जीवन और संस्कृति का आधार बताते हुए इसके संरक्षण को सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी कहा।
'जल है तो कल है' विशेषांक क्या है?
यह राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका का एक विशेष अंक है जिसे 25 अक्टूबर 2026 को लखनऊ के भागीदारी भवन में विमोचित किया गया। इसमें जल से जुड़े धार्मिक व सांस्कृतिक विचारों, पारंपरिक संरक्षण प्रणालियों, मौजूदा चुनौतियों और देश में किए गए सफल प्रयोगों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है।
हिवरे बाजार जल प्रबंधन मॉडल क्या है?
महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव में जल प्रबंधन, फसल नियोजन, चराईबंदी, कुल्हाड़बंदी और नशाबंदी जैसे सामूहिक प्रयासों के जरिए सूखे की समस्या को काफी हद तक कम किया गया। पद्मश्री डॉ. पोपटराव पवार ने इस मॉडल को देशभर में अपनाने योग्य बताया और कहा कि सामुदायिक अनुशासन इसकी कुंजी है।
RSS का पंच परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण क्या संबंध है?
राष्ट्रधर्म के संपादक अशोक वाजपेयी के अनुसार RSS के पंच परिवर्तन में पर्यावरण संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय है और जल संरक्षण उसका अभिन्न हिस्सा है। 'जल है तो कल है' विशेषांक इसी उद्देश्य से देशव्यापी चर्चा को प्रोत्साहित करने के लिए तैयार किया गया।
जल संकट के समाधान में ग्राम पंचायतों की क्या भूमिका बताई गई?
डॉ. पोपटराव पवार और अन्य वक्ताओं ने जोर दिया कि प्रत्येक ग्राम पंचायत को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण योजना तैयार करनी चाहिए और ग्रामसभा की सक्रिय भागीदारी से उसे लागू करना चाहिए। पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करना और जागरूकता साहित्य को गाँवों तक पहुँचाना इसका हिस्सा है।
राष्ट्र प्रेस
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