रांची में झारखंड आंदोलनकारियों का सीएम आवास घेराव प्रयास, पुलिस ने रोका; 17 भूख हड़ताल पर
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के सैकड़ों सदस्यों ने बुधवार, 10 जून को रांची में मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें सिदो-कान्हो पार्क के निकट बैरिकेड लगाकर रोक दिया। राज्य के विभिन्न जिलों से आए ये आंदोलनकारी राजकीय मान्यता, सम्मानजनक पेंशन, मुआवजा और आश्रितों के लिए सरकारी रोजगार की माँग को लेकर सड़क पर उतरे थे। पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद 17 आंदोलनकारी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए।
मुख्य घटनाक्रम
ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक मांदर की थाप के साथ मोरहाबादी मैदान से निकले प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च किया। पुलिस ने सिदो-कान्हो पार्क के पास बैरिकेडिंग कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया, जिसके बाद आंदोलनकारी सड़क पर धरने पर बैठ गए। कुछ समय के लिए प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई।
आंदोलनकारियों की माँगें
मोर्चा के प्रधान सचिव पुष्कर महतो के नेतृत्व में आयोजित इस प्रदर्शन में आंदोलनकारियों ने कहा कि अलग झारखंड राज्य के निर्माण के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाले हजारों लोगों को राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी अपेक्षित सम्मान और अधिकार नहीं मिले हैं। उनकी प्रमुख माँगों में राजकीय मान्यता, सम्मानजनक पेंशन, मुआवजा तथा आश्रितों के लिए सरकारी नौकरी शामिल हैं।
प्रशासन पर आरोप
आंदोलनकारी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार उनकी माँगों को लंबे समय से नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य के विभिन्न जिलों से रांची आने वाले कुछ लोगों को रास्ते में रोका गया और कुछ को कथित तौर पर हिरासत में लिया गया। हालाँकि, प्रशासन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भूख हड़ताल और आगे की चेतावनी
आंदोलन को और तेज करने के लिए 17 आंदोलनकारी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी माँगों पर जल्द सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि अपने योगदान की आधिकारिक पहचान और सम्मान की माँग कर रहे हैं।
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड राज्य अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर चुका है और आंदोलनकारियों की पुरानी माँगें अभी भी अनसुनी हैं। गौरतलब है कि राज्य निर्माण में योगदान देने वाले लोगों के पुनर्वास और मान्यता का मुद्दा वर्षों से झारखंड की राजनीति में उठता रहा है। यदि सरकार ने भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारियों की माँगों पर शीघ्र संज्ञान नहीं लिया, तो आंदोलन के और विस्तार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।