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झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन की सख्त गाइडलाइन, वकीलों की 'रीलबाजी' पर लगेगी लगाम

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झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन की सख्त गाइडलाइन, वकीलों की 'रीलबाजी' पर लगेगी लगाम

सारांश

रांची के झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने वकीलों की सोशल मीडिया 'रीलबाजी' पर लगाम लगाने के लिए सख्त गाइडलाइन जारी की है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और बार काउंसिल नियम 36 का हवाला देते हुए एसोसिएशन ने उल्लंघन पर झारखंड राज्य बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की चेतावनी दी है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने 1 नवंबर 2026 को वकीलों की सोशल मीडिया 'रीलबाजी' पर सख्त गाइडलाइन जारी की।
हाईकोर्ट परिसर में फिल्मी गानों पर रील बनाना, बनावटी बहस के वीडियो और फीस का सार्वजनिक प्रचार — सभी पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध।
यह आचरण अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 का उल्लंघन घोषित।
उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा सीधे झारखंड राज्य बार काउंसिल को की जाएगी।
सभी संबंधित सदस्यों को ऐसी सामग्री सोशल मीडिया से तत्काल हटाने का निर्देश दिया गया।

झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने 1 नवंबर 2026 को उन अधिवक्ताओं के विरुद्ध कड़ी गाइडलाइन जारी की है, जो रांची स्थित हाईकोर्ट परिसर की पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया रील्स बनाकर अपलोड करते हैं। एसोसिएशन ने इस प्रवृत्ति को वकालत के पेशे की गरिमा के प्रतिकूल और अधिवक्ता अधिनियम, 1961 तथा बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 का उल्लंघन घोषित किया है। गाइडलाइन का उल्लंघन करने पर सीधे झारखंड राज्य बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की जाएगी।

क्या है मामला

एसोसिएशन के संज्ञान में यह बात गंभीर रूप से आई है कि कुछ युवा अधिवक्ता हाईकोर्ट परिसर की पृष्ठभूमि में फिल्मी गानों पर रील्स बनाकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर रहे हैं। इसके अलावा, अदालत कक्ष के भीतर बनावटी बहस की मुद्रा में फोटो खींचना और अपनी फीस के पैकेट या दरों का सार्वजनिक प्रचार कर मुवक्किलों को आकर्षित करने की शिकायतें भी मिली हैं।

एसोसिएशन की आधिकारिक गाइडलाइन

जारी गाइडलाइन में स्पष्ट किया गया है कि रील्स बनाना, बनावटी बहस के वीडियो अपलोड करना और सोशल मीडिया के ज़रिए मुवक्किलों को रिझाना — ये सभी गतिविधियाँ पेशेवर आचरण के खिलाफ हैं। एसोसिएशन ने कहा है कि वकालत कोई व्यवसाय या मनोरंजन का मंच नहीं, बल्कि समाज को न्याय दिलाने का एक पवित्र और गरिमामयी पेशा है। सभी संबंधित सदस्यों को तत्काल प्रभाव से ऐसे वीडियो और प्रचार सामग्री सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिया गया है।

कानूनी आधार

एसोसिएशन के अनुसार, इस तरह का आत्म-प्रचार अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 का खुला उल्लंघन है। गौरतलब है कि नियम 36 के तहत अधिवक्ताओं को किसी भी माध्यम से अपनी सेवाओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष विज्ञापन करना वर्जित है। यह नियम दशकों पुराना है, लेकिन सोशल मीडिया के उभार के बाद इसकी प्रासंगिकता नए रूप में सामने आई है।

उल्लंघन पर क्या होगी कार्रवाई

एसोसिएशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी सदस्य ने इस आदेश की अनदेखी की, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा सीधे झारखंड राज्य बार काउंसिल को की जाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर के कई बार एसोसिएशन सोशल मीडिया के अनियंत्रित उपयोग से न्यायपालिका की छवि पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं।

व्यापक संदर्भ

न्यायिक परिसरों में मर्यादित आचरण की यह माँग केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वकीलों की बढ़ती उपस्थिति मुवक्किलों में अदालत की गंभीर छवि को धूमिल करती है और पेशे के प्रति अविश्वास को जन्म देती है। एसोसिएशन की यह पहल न्यायिक मर्यादा की रक्षा के लिए एक संस्थागत प्रयास के रूप में देखी जा रही है, और आने वाले समय में अन्य हाईकोर्ट बार एसोसिएशन भी इसी तरह के दिशानिर्देश जारी कर सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या एसोसिएशन के पास इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने की क्षमता है। सोशल मीडिया की निगरानी और साक्ष्य संग्रह एक जटिल प्रक्रिया है, और बिना स्पष्ट तंत्र के यह आदेश महज़ 'कागज़ी शेर' बनकर रह सकता है। यह भी विचारणीय है कि वकीलों द्वारा सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाना और 'रीलबाजी' के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए — एसोसिएशन की गाइडलाइन इस बारीकी को स्पष्ट नहीं करती। राष्ट्रीय स्तर पर जब डिजिटल उपस्थिति हर पेशे की ज़रूरत बन रही है, तो न्यायिक मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच यह तनाव केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने किस पर प्रतिबंध लगाया है?
एसोसिएशन ने वकीलों द्वारा हाईकोर्ट परिसर में फिल्मी गानों पर रील बनाना, बनावटी बहस के वीडियो अपलोड करना और सोशल मीडिया पर अपनी फीस का प्रचार कर मुवक्किलों को आकर्षित करने पर प्रतिबंध लगाया है। इसे पेशेवर आचरण के विरुद्ध और अधिवक्ता अधिनियम, 1961 का उल्लंघन घोषित किया गया है।
नियम का उल्लंघन करने वाले वकीलों पर क्या कार्रवाई होगी?
यदि कोई सदस्य गाइडलाइन की अनदेखी करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा सीधे झारखंड राज्य बार काउंसिल को की जाएगी। एसोसिएशन ने सभी सदस्यों को तत्काल प्रभाव से ऐसी सामग्री डिलीट करने का भी निर्देश दिया है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया का नियम 36 क्या कहता है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 के तहत अधिवक्ताओं को किसी भी माध्यम से अपनी कानूनी सेवाओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष विज्ञापन करना वर्जित है। सोशल मीडिया पर रील और फीस प्रचार इसी नियम के दायरे में आता है।
यह गाइडलाइन क्यों जारी की गई?
एसोसिएशन के अनुसार, हाल के दिनों में कुछ युवा अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक परिसर की पृष्ठभूमि में रील बनाने और फीस का सार्वजनिक प्रचार करने की शिकायतें बढ़ी हैं। इससे न केवल न्यायपालिका की मर्यादा प्रभावित हो रही है, बल्कि मुवक्किलों के बीच अदालत की गंभीर छवि भी धूमिल होती है।
क्या यह केवल झारखंड हाईकोर्ट पर लागू होता है?
यह गाइडलाइन फिलहाल झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के सदस्यों पर लागू है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर वकीलों के आचरण को लेकर यह मुद्दा देशभर के बार एसोसिएशनों में चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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