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झारखंड: IFS अधिकारी राजीव लोचन बख्शी पर ₹10 करोड़ से अधिक गबन के आरोप, मरांडी ने SIT जांच की मांग की

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झारखंड: IFS अधिकारी राजीव लोचन बख्शी पर ₹10 करोड़ से अधिक गबन के आरोप, मरांडी ने SIT जांच की मांग की

सारांश

झारखंड में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने IFS अधिकारी राजीव लोचन बख्शी पर 2013-18 के बीच रांची वन प्रमंडल में ₹10 करोड़ से अधिक की वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए CM हेमंत सोरेन से SIT जांच, FIR और फॉरेंसिक ऑडिट की माँग की है — AG की ऑडिट रिपोर्ट में कई अनियमितताएँ दर्ज हैं।

मुख्य बातें

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 20 जुलाई को CM हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर IFS अधिकारी राजीव लोचन बख्शी के विरुद्ध SIT जांच की माँग की।
आरोप है कि बख्शी ने 2013 से 2018 के बीच रांची वन प्रमंडल में DFO रहते हुए राज्य को करोड़ों रुपए की क्षति पहुँचाई।
AG ऑडिट रिपोर्ट में 95 मस्टर रोल की जांच में ₹1.03 करोड़ के कथित फर्जी भुगतान और रिकॉर्ड में व्हाइटनर से छेड़छाड़ का उल्लेख।
कैंपा मद के ₹8.53 करोड़ अग्रिम का हिसाब नहीं; ₹1.80 करोड़ की खरीद के वाउचर ऑडिट में अनुपलब्ध।
7.35 हेक्टेयर वन भूमि उपयोग से राज्य को करीब ₹46 लाख की संभावित क्षति का दावा।
मरांडी पहले राज्यपाल और ACB को भी इस मामले की जानकारी दे चुके हैं।

झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 20 जुलाई को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर झारखंड कैडर के भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी राजीव लोचन बख्शी के विरुद्ध कथित करोड़ों रुपए की वित्तीय अनियमितताओं की उच्चस्तरीय SIT जांच की मांग की है। मरांडी ने मामले में तत्काल FIR दर्ज करने, स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट कराने और जांच पूरी होने तक बख्शी को प्रशासनिक दायित्वों से अलग रखने की भी मांग की है।

मुख्य आरोप क्या हैं

मरांडी के पत्र के अनुसार, राजीव लोचन बख्शी ने 2013 से 2018 के बीच रांची वन प्रमंडल में DFO (जिला वन अधिकारी) के पद पर रहते हुए अपने पद का कथित दुरुपयोग किया और राज्य को करोड़ों रुपए की क्षति पहुँचाई। नेता प्रतिपक्ष ने बताया कि इस मामले में प्रधान महालेखाकार (AG) की ऑडिट रिपोर्ट में कई गंभीर वित्तीय अनियमितताएँ दर्ज की गई हैं।

ऑडिट रिपोर्ट के हवाले से मरांडी ने बताया कि अप्रैल 2016 से मार्च 2019 के बीच 95 मस्टर रोल की जांच में करीब ₹1.03 करोड़ के कथित फर्जी भुगतान का मामला सामने आया है। आरोप है कि कई भुगतानों में मजदूरों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान अनुपस्थित थे और सरकारी रिकॉर्ड में व्हाइटनर व इरेजर का उपयोग कर बदलाव किए गए।

अन्य वित्तीय अनियमितताओं के आरोप

मरांडी ने पत्र में यह भी आरोप लगाया कि 2013-14 में ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के प्रस्तावों को जान-बूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर नियामक नियमों से बचने की कोशिश की गई। इसके अतिरिक्त, 7.35 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की अनुमति देने से राज्य को करीब ₹46 लाख की संभावित क्षति होने का दावा किया गया है।

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि कैंपा (CAMPA) मद के ₹8.53 करोड़ के अग्रिम भुगतान का हिसाब नहीं मिला है और ₹1.80 करोड़ की सामग्री खरीद से जुड़े वाउचर ऑडिट के दौरान उपलब्ध नहीं कराए गए। उनका कहना है कि दस्तावेजों के अभाव में संबंधित मजदूरी भुगतान भी संदेह के दायरे में आता है।

पूर्व में भी उठाया था मामला

मरांडी ने बताया कि इस मामले में वह पहले राज्यपाल और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को भी जानकारी दे चुके हैं। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में वन विभाग की कार्यप्रणाली और आदिवासी क्षेत्रों में वन भूमि के उपयोग को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। गौरतलब है कि कैंपा फंड का उद्देश्य वन क्षरण की भरपाई करना है और इसके कथित दुरुपयोग को गंभीरता से लिया जाता है।

मरांडी की माँगें

नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से चार स्पष्ट माँगें रखी हैं — पूरे प्रकरण की SIT जांच, स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट, राजीव लोचन बख्शी के विरुद्ध FIR दर्ज करना, और जांच पूरी होने तक उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग रखना। उन्होंने कहा कि राज्यहित में सरकार को इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करनी चाहिए।

सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह

अभी तक मुख्यमंत्री कार्यालय या राज्य सरकार की ओर से इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह मामला झारखंड की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है, क्योंकि विपक्ष सत्तारूढ़ गठबंधन पर वन विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर लगातार दबाव बनाए हुए है।

संपादकीय दृष्टिकोण

व्हाइटनर से छेड़छाड़, और करोड़ों के बेहिसाब अग्रिम — केवल एक अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड के वन प्रशासन में प्रणालीगत निगरानी की विफलता की ओर इशारा करते हैं। सवाल यह है कि AG रिपोर्ट में ये तथ्य दर्ज होने के बावजूद अब तक FIR क्यों नहीं हुई। कैंपा फंड — जो आदिवासी वन क्षेत्रों की पारिस्थितिक बहाली के लिए है — के कथित दुरुपयोग का राजनीतिक और पर्यावरणीय दोनों आयाम हैं, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। सत्तारूढ़ सरकार की चुप्पी खुद एक जवाब है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजीव लोचन बख्शी पर क्या आरोप हैं?
राजीव लोचन बख्शी, जो 2013 से 2018 के बीच रांची वन प्रमंडल में DFO थे, पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर राज्य को करोड़ों रुपए की वित्तीय क्षति पहुँचाई। AG की ऑडिट रिपोर्ट में फर्जी मस्टर रोल भुगतान, रिकॉर्ड में छेड़छाड़ और कैंपा मद के बेहिसाब अग्रिम जैसी अनियमितताएँ दर्ज हैं।
बाबूलाल मरांडी ने SIT जांच की माँग क्यों की?
मरांडी का कहना है कि AG ऑडिट रिपोर्ट में गंभीर वित्तीय अनियमितताएँ सामने आने के बावजूद मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने पहले राज्यपाल और ACB को भी जानकारी दी थी, लेकिन जांच न होने पर अब CM हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर SIT, FIR और फॉरेंसिक ऑडिट की माँग की है।
AG ऑडिट रिपोर्ट में कितनी राशि की अनियमितता पाई गई?
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2016 से मार्च 2019 के बीच 95 मस्टर रोल में करीब ₹1.03 करोड़ के कथित फर्जी भुगतान का मामला है। इसके अलावा कैंपा मद के ₹8.53 करोड़ के अग्रिम का हिसाब नहीं मिला और ₹1.80 करोड़ की सामग्री खरीद के वाउचर ऑडिट में अनुपलब्ध रहे।
कैंपा फंड क्या है और इसके दुरुपयोग का क्या मतलब है?
CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) वह फंड है जो वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की भरपाई के लिए एकत्र किया जाता है और वन पुनरुद्धार पर खर्च होना चाहिए। इस मद के ₹8.53 करोड़ के अग्रिम का हिसाब न मिलना गंभीर माना जाता है क्योंकि यह पैसा मुख्यतः आदिवासी वन क्षेत्रों की पारिस्थितिक बहाली के लिए होता है।
इस मामले में अब आगे क्या होगा?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कार्यालय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यदि सरकार SIT गठन या FIR दर्ज करती है तो मामला आगे बढ़ेगा; अन्यथा मरांडी ने संकेत दिया है कि वे इसे और आगे उठाएँगे।
राष्ट्र प्रेस
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